समाचार पत्र दिवस : सूचना की लोकतांत्रिकता और गिरती विश्वसनीयता का संकट

— जयसिंह रावत
आज से लगभग 246 वर्ष पूर्व, 29 जनवरी 1780 को जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने ‘हिक्कीज़ बंगाल गजट’ के प्रकाशन के साथ भारतीय पत्रकारिता की नींव रखी। यह महज़ एक अख़बार नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक सत्ता की निरंकुशता के विरुद्ध प्रतिरोध की पहली छपी हुई आवाज़ थी। हिक्की को जेल और आर्थिक दमन झेलना पड़ा, पर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि पत्रकारिता का मूल स्वभाव सत्ता से प्रश्न करना है, न कि उसका प्रवक्ता बनना। लेकिन बाजारीकरण के इस दौर में पत्रकारिता की विश्वसनीयता बाजार में बिक रही है। इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया तो पत्रकारिता को सरे बाजार बेच ही रहे है लेकिन प्रिंट मीडिया का बड़ा हिस्सा भी बाज़ारू होता जा रहा है। हिंदी के “उदंत मार्तण्ड” जैसे अखबारों ने भी ‘सत्य और उद्देश्यपरक पत्रकारिता’ की जो मशाल जलाई थी वह बहुत कुन्द हो गयी।
उत्तराखंड का पहला समाचार पत्र भी औपनिवेशिक दौर में ही प्रकाशित हुआ। मसूरी से जॉन मैकनन द्वारा निकाला गया ‘द हिल्स’ न केवल पर्वतीय समाज की समस्याओं को सामने लाने वाला पहला मंच था, बल्कि इस क्षेत्र में आधुनिक जनमत निर्माण की शुरुआत भी थी। यह संयोग नहीं कि पहाड़ों में पत्रकारिता की शुरुआत भी सत्ता, जंगल, भूमि और अधिकार जैसे मुद्दों से जुड़ी रही। आज उत्तराखंड में हजारों अख़बार हो गये जो विज्ञापनों से सरकार का हर साल सेकड़ों करोड़ रुपया डकार रहे हैं। उनमे से केवल् दर्जनभर ही दीखते है। कभी वक्त था जब कहा जाता था कि, “जब तोप मुकाबल हो तो अख़बार निकलो”। लेकिन आज वक्त बदल गया। ” जब रोजगार न हो या जब स्वार्थ सिद्धि करनी हो या अपना प्रचार करना हो या फिर बचने की आड़ चाहिए हो तो अख़बार निकलो, चैनल चलाओ”

आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा समाचार पत्र बाज़ार है। हज़ारों दैनिक अख़बार, करोड़ों पाठक और विशाल विज्ञापन उद्योग—लेकिन सवाल यह है कि क्या यह संख्यात्मक विस्तार वैचारिक और नैतिक मजबूती में भी तब्दील हुआ है? या फिर हम एक ऐसे दौर में पहुँच गए हैं, जहाँ विश्वसनीयता सबसे बड़ा संकट बन चुकी है।
सत्ता का ‘वॉचडॉग’ या ‘कठपुतली’?
पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ इसलिए कहा गया, क्योंकि उसका दायित्व विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—तीनों पर निगरानी रखना था। लेकिन बीते वर्षों में ‘पेड न्यूज़’, कॉरपोरेट स्वामित्व, राजनीतिक झुकाव और सरकारी विज्ञापनों पर बढ़ती निर्भरता ने अख़बारों की धार को कुंद कर दिया है। सत्ताधारियों को चाटुकार ही पसंद होते हैं जो कि उनकी झूठी तारीफें कर गलतफहमी में रखते है, जो कि उनके साथ धोखा है, लेकिन सत्ताधारियों को धोखे की लत लग गयी है। मै पिछले 25 सालों से उत्तराखंड में यह सब देख रहा हूं।
कई बार ऐसा लगता है कि समाचार पत्र सत्ता के ‘वॉचडॉग’ की बजाय उसके ‘प्रेस नोट विस्तारक’ बनते जा रहे हैं। जो पत्रकारिता कभी घोटालों को उजागर कर सरकारों की नींद उड़ाती थी, वही आज कई मामलों में चुप्पी साधे दिखती है। ऐसे समय में पत्रकारिता को फिर से उसी ‘हिक्की स्पिरिट’ की ज़रूरत है, जहाँ जनहित सर्वोपरि हो और सत्ता से दूरी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बने। टीवी चैनल तो पत्रकारिता का कचूमर निकाल ही रहे थे लेकिन सोशल मीडिया सूचनाओं की गति आश्चर्य रूप से जरूर बढ़ा दी लेकिन विश्वसनीयता का भट्टा भी बिठा दिया।
डिजिटल युग, डीपफेक और अख़बारों की नई ज़िम्मेदारी
डिजिटल क्रांति ने सूचना को तेज़ और सर्वसुलभ बनाया, लेकिन साथ ही फेक न्यूज़, डीपफेक वीडियो और संगठित दुष्प्रचार का खतरा भी कई गुना बढ़ा दिया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा डीपफेक को लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बताना इस संकट की गंभीरता को रेखांकित करता है।
इस शोरगुल भरे डिजिटल परिदृश्य में प्रिंट मीडिया की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। अख़बार आज भी इसलिए भरोसेमंद माने जाते हैं, क्योंकि यहाँ खबरें कई स्तरों की संपादन प्रक्रिया, तथ्य-जांच और कानूनी विवेक से गुजरकर प्रकाशित होती हैं। जब सोशल मीडिया सेकंडों में अफवाह फैला देता है, तब अख़बारों का धैर्य और जिम्मेदारी ही उनकी सबसे बड़ी पहचान है।
‘इतिहास का पहला ड्राफ्ट’ और अख़बारों की ऐतिहासिक भूमिका
कहा जाता है कि पत्रकारिता इतिहास का पहला ड्राफ्ट होती है। आज छपी हुई खबरें ही कल के इतिहासकारों के लिए स्रोत बनती हैं। यदि आज तथ्यों से समझौता किया गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ विकृत और अधूरा इतिहास पढ़ेंगी।
उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है, जहाँ सैन्य परंपराएँ, जनजातीय समाज, भाषा-संस्कृति और पर्यावरणीय संघर्ष मुख्यधारा के इतिहास में अक्सर हाशिये पर डाल दिए जाते हैं। मुद्रित शब्द की स्थायित्व शक्ति यह याद दिलाती है कि अख़बार केवल आज के पाठक के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी लिखे जाते हैं।
भाषाई पत्रकारिता और गिरता विमर्श
आज ‘हिंग्लिश’, सनसनी और सतही मनोरंजन ने गंभीर पत्रकारिता को चुनौती दी है। क्षेत्रीय भाषाओं के अख़बारों पर यह दोहरी जिम्मेदारी है कि वे न केवल भाषा की शुद्धता बनाए रखें, बल्कि स्थानीय मुद्दों को गहराई और संवेदनशीलता के साथ उठाएँ।
यदि क्षेत्रीय अख़बार भी केवल विज्ञापन, सरकारी उपलब्धियों और हल्के कंटेंट तक सीमित हो गए, तो वे अपने समाज के प्रति न्याय नहीं कर पाएँगे। भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का वाहक भी होती है—और पत्रकारिता उसका सबसे सशक्त मंच।
पत्रकारिता को आईना दिखाने का अवसर
समाचार पत्र दिवस अतीत की उपलब्धियों को याद करने भर का दिन नहीं, बल्कि वर्तमान पत्रकारिता को आईना दिखाने का अवसर है। जब तक समाज में एक भी व्यक्ति अन्याय के विरुद्ध सच जानने के लिए अख़बार खोलता है, तब तक पत्रकारिता जीवित है।
लेकिन इसकी दीर्घायु साहस, सत्यनिष्ठा और स्वतंत्रता पर निर्भर है। जेम्स हिक्की से लेकर जॉन मैकनन तक की परंपरा हमें यही सिखाती है कि अख़बार सत्ता की सुविधा नहीं, बल्कि लोकतंत्र की ज़रूरत हैं।
(लेखक परिचय: जयसिंह रावत वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं। वे 1978 से पूर्णकालिक पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उनके द्वारा अब तक लिखी गयी और सम्पादित दर्ज़नभर पुस्तकों में पत्रकारिता पर तीन पुस्तकें हैं। उन्हें कई सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हुए हैं, जिनमें एक लाख रुपये का प्रथम पं0 भैरव दत्त धूलिया पत्रकारिता पुरस्कार और के सी कुलिस अंतर्राष्ट्रीय प्रिंट जर्नलिज्म पुरस्कार भी शामिल हैं । लेखक इस न्यूज़ पोर्टल के संपादक मंडल के मानद सदस्य भी है -एडमिन)
