उच्च शिक्षा में समानता से जुड़े UGC नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, केंद्र को झटका
नई दिल्ली, 30 जनवरी। उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता सुनिश्चित करने और भेदभाव रोकने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा अधिसूचित Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत के इस आदेश को केंद्र सरकार और यूजीसी के लिए एक महत्वपूर्ण झटके के रूप में देखा जा रहा है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने 29 जनवरी 2026 को हुई सुनवाई के दौरान नियमों की भाषा और प्रावधानों पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ये नियम अस्पष्ट हैं और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। पीठ ने स्पष्ट किया कि अगले आदेश तक वर्ष 2012 के पूर्ववर्ती नियम ही प्रभावी रहेंगे।
सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि नए नियमों की भाषा समाज में विभाजन पैदा कर सकती है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद देश को ऐसे किसी भी कदम से बचना चाहिए जो समाज को प्रतिगामी दिशा में ले जाए। उन्होंने कहा कि शिक्षा संस्थानों में भारत की एकता, समावेशिता और समानता स्पष्ट रूप से परिलक्षित होनी चाहिए।
अदालत ने सुझाव दिया कि इन नियमों की समीक्षा के लिए प्रतिष्ठित न्यायविदों और विषय विशेषज्ञों की एक समिति गठित की जानी चाहिए, जो नियमों की भाषा और प्रावधानों को अधिक स्पष्ट, संतुलित और संविधानसम्मत बना सके।
याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से विनियम 3(सी) पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि नए नियमों में जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया गया है, जिससे सामान्य वर्ग के छात्र समान संरक्षण से वंचित रह जाते हैं। इसे संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार का उल्लंघन बताया गया।
अदालत ने यह भी माना कि नियमों की अस्पष्टता के कारण किसी निर्दोष व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, जिससे छात्रों और शिक्षकों का भविष्य प्रभावित होने की आशंका है। इसके अलावा, ड्राफ्ट नियमों में झूठी शिकायतों पर दंड से जुड़े प्रावधानों को अंतिम अधिसूचना से हटाए जाने को भी विवाद का एक प्रमुख कारण माना गया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए 19 मार्च 2026 तक अपना जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। माना जा रहा है कि अब सरकार को इन नियमों की भाषा में संशोधन कर नया प्रारूप तैयार करना पड़ सकता है, ताकि यह किसी भी वर्ग के प्रति भेदभावपूर्ण न हो।
देश के विभिन्न हिस्सों में सामान्य वर्ग के संगठनों द्वारा इन नियमों के विरोध के बीच आए सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला सरकार को नियमों में सुधार और व्यापक सहमति बनाने का अवसर भी प्रदान करता है।
