पर्यावरणब्लॉग

उत्तराखंड के वनों में संकट: खूंखार जीव भी तो सुरक्षित नहीं !

 

उषा रावत
उत्तराखंड के जंगल आज केवल जैव विविधता के संकट का प्रतीक नहीं रह गए हैं, बल्कि वे मानव सुरक्षा के लिए भी गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं। हाल के वर्षों में सामने आए वन विभाग के आँकड़े और आरटीआई से प्राप्त जानकारियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि राज्य के वन क्षेत्र एक ऐसे असंतुलन की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ न तेंदुआ और न बाघ सुरक्षित है, और न ही जंगल से सटे गाँवों में रहने वाला इंसान।
वन्यजीव मौतों के डरावने आँकड़े
सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2020 से 2025 के बीच उत्तराखंड में 749 तेंदुओं और 86 बाघों की मौत दर्ज की गई है। राज्य गठन (2000) के बाद से अब तक यह संख्या 1,500 से अधिक तेंदुओं तक पहुँच चुकी है।
यह स्थिति तब है, जब उत्तराखंड को देश के प्रमुख बाघ राज्यों में गिना जाता है और यहाँ बाघों की संख्या बढ़ने के दावे किए जाते रहे हैं।
अज्ञात कारण’: संरक्षण व्यवस्था की सबसे बड़ी विफलता
वन विभागीय आँकड़ों में 185 तेंदुओं की मौत आपसी संघर्ष, 21 की सड़क दुर्घटनाओं और 40 की बीमारी से बताई गई है, लेकिन 185 मौतों का कारण ‘अज्ञात’ दर्ज है।
किसी भी वन्यजीव संरक्षण नीति में ‘अज्ञात कारण’ सबसे गंभीर चेतावनी होता है। यह न केवल पोस्टमार्टम व्यवस्था की कमजोरी दर्शाता है, बल्कि निगरानी, जांच और जवाबदेही की पूरी प्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
मानव मौतें: जंगल अब इंसान के लिए भी असुरक्षित
वन्यजीव संकट का सबसे भयावह पहलू यह है कि इसका सीधा असर मानव जीवन पर पड़ रहा है।
राज्य वन विभाग और गृह विभाग के आँकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में उत्तराखंड में मानव–वन्यजीव संघर्ष में 500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें सबसे अधिक मामले तेंदुओं के हमलों से जुड़े हैं।
हर साल औसतन 60 से 70 लोग तेंदुआ, हाथी या अन्य वन्यजीव हमलों में अपनी जान गंवा रहे हैं। चमोली, पौड़ी, टिहरी, अल्मोड़ा, नैनीताल और पिथौरागढ़ जैसे जिले इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित रहे हैं।
मानव–वन्यजीव संघर्ष क्यों बढ़ रहा है
विशेषज्ञों के अनुसार, इसके पीछे कई कारण हैं—
जंगलों का विखंडन, सड़क और निर्माण परियोजनाओं का जंगलों के भीतर विस्तार, वन्यजीव गलियारों पर अतिक्रमण और प्राकृतिक भोजन श्रृंखला का टूटना।
जब जंगल सिकुड़ते हैं, तो तेंदुए और अन्य शिकारी आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि कभी खेतों में काम करता किसान, तो कभी स्कूल जाता बच्चा, इस संघर्ष का शिकार बन जाता है।
विकास परियोजनाएँ और बढ़ता जोखिम
चारधाम सड़क परियोजना, ग्रामीण सड़क नेटवर्क और जंगलों से गुजरने वाले नए मार्गों ने वन्यजीवों के प्राकृतिक आवागमन को बाधित किया है।
सड़क दुर्घटनाओं में दर्ज मौतें केवल दर्ज आँकड़े हैं—वास्तविक संख्या इससे अधिक होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि जंगल अब “संरक्षित क्षेत्र” कम और “संघर्ष क्षेत्र” अधिक बनते जा रहे हैं।
बढ़ती संख्या, घटती सुरक्षा
वन विभाग के अनुसार, उत्तराखंड में बाघों की संख्या 2022 में 560 थी, जो 2023–24 में 600 के पार बताई गई। लेकिन संख्या बढ़ने के बावजूद बाघों और तेंदुओं की मौतें यह संकेत देती हैं कि संरक्षण नीति गणना तक सीमित रह गई है, सुरक्षा और सह-अस्तित्व की रणनीति कमजोर पड़ी है।
 यह केवल वन्यजीव संकट नहीं, नीति संकट है
उत्तराखंड के जंगलों में आज न वन्यजीव सुरक्षित हैं और न ही मानव। तेंदुओं और बाघों की बढ़ती मौतें और मानव जीवन की लगातार हो रही क्षति यह बताती है कि राज्य एक गहरे पारिस्थितिक और प्रशासनिक संकट से गुजर रहा है।
यदि हर मौत का कारण स्पष्ट नहीं होगा, यदि ‘अज्ञात’ शब्द ही जवाब बनता रहेगा, और यदि विकास व संरक्षण के बीच संतुलन नहीं साधा गया, तो यह संकट और गहराएगा।
वन्यजीव संरक्षण अब केवल जंगल बचाने का सवाल नहीं है—यह मानव सुरक्षा, नीति की पारदर्शिता और राज्य की जिम्मेदारी की सीधी परीक्षा बन चुका है।

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