केंद्रीय बजट और उत्तराखंड: उम्मीदों का बोझ, हकीकत की कसौटी
The Union Budget is a strategic roadmap, not just a financial exercise. As a special category, border and ecologically fragile state, Uttarakhand needs policies rooted in its unique realities. Climate change and recurring disasters demand full central funding for reconstruction, climate-resilient planning, and a green bonus for ecosystem services. Strategic infrastructure—railways, all-weather roads, and dual-use airstrips—is essential for security and connectivity. Stopping migration requires targeted MSME support and agri-processing in hill areas. Sustainable tourism must prioritize urban infrastructure over expansion. Ultimately, meaningful capital support and disaster preparedness—not populist promises—will determine the budget’s real impact on Uttarakhand.

– जयसिंह रावत-
आज केंद्रीय बजट पेश हो रहा है। सामान्य राज्यों के लिए यह वित्तीय दस्तावेज़ मात्र आय–व्यय का ब्यौरा होता है, लेकिन उत्तराखंड जैसे विशेष श्रेणी के राज्य के लिए यह आने वाले वर्षों की दिशा और प्राथमिकताओं को तय करने वाला घोषणापत्र बन जाता है। ऊपर से राज्य और केंद्र—दोनों जगह “डबल इंजन” सरकार होने के कारण अपेक्षाएं स्वाभाविक रूप से और अधिक बढ़ जाती हैं।
सवाल यह है कि क्या यह बजट उत्तराखंड की वास्तविक जरूरतों को समझते हुए तैयार किया गया है, या फिर यह भी आंकड़ों और योजनाओं का एक औपचारिक अभ्यास भर साबित होगा?
उत्तराखंड की भौगोलिक विषमता, सीमांत राज्य होने के कारण उसका सामरिक महत्व और उसकी अत्यधिक पारिस्थितिकी संवेदनशीलता—तीनों ही इसे देश के अन्य राज्यों से अलग बनाते हैं। ऐसे में समान पैमाने पर विकास योजनाएं लागू करना न सिर्फ अव्यावहारिक है, बल्कि खतरनाक भी हो सकता है।
सबसे बड़ी चुनौती आज जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़ी आपदाएं हैं। बीते एक दशक में उत्तराखंड ने केदारनाथ आपदा से लेकर जोशीमठ भू-धंसाव तक बार-बार चेतावनियां दी हैं। इसके बावजूद आपदा प्रबंधन को अब भी “आपदा के बाद राहत” तक सीमित रखा गया है। ज़रूरत इस बात की है कि बजट में उत्तराखंड के लिए जलवायु अनुकूलन और आपदा-पूर्व तैयारी को केंद्रीय स्थान मिले। लंबे समय से राज्य यह मांग करता रहा है कि आपदा के बाद पुनर्निर्माण के लिए SDRF के अंतर्गत 100 प्रतिशत केंद्रीय वित्त पोषण सुनिश्चित किया जाए, क्योंकि सीमित संसाधनों वाला यह राज्य बार-बार आपदाओं का आर्थिक बोझ अकेले नहीं उठा सकता। इसके साथ ही, जंगलों, नदियों और ग्लेशियरों के संरक्षण के एवज में ‘ग्रीन बोनस’ या ईको-सिस्टम सेवाओं के लिए विशेष अनुदान अब कोई नई मांग नहीं, बल्कि पर्यावरणीय न्याय का प्रश्न बन चुका है।
इंफ्रास्ट्रक्चर का सवाल उत्तराखंड में केवल विकास का नहीं, बल्कि सुरक्षा और अस्तित्व का भी है। सीमांत राज्य होने के नाते सड़कों, सुरंगों और रेल परियोजनाओं का सामरिक महत्व है। ऋषिकेश–कर्णप्रयाग रेल परियोजना और ऑल वेदर रोड परियोजना के लिए पर्याप्त और निरंतर बजटीय समर्थन आवश्यक है। हवाई कनेक्टिविटी के मामले में गौचर और चिन्यालीसौड़ जैसे हवाई पट्टे केवल नागरिक सुविधा नहीं, बल्कि आपदा प्रबंधन और रक्षा—दोनों के लिए अहम हैं। इन्हें ‘ड्यूल यूज़’ के रूप में विकसित करने के लिए यदि विशेष बजटीय प्रावधान होता है, तो यह पहाड़ के लिए दूरगामी लाभ देगा। इसी तरह ‘अमृत भारत स्टेशन’ योजना के तहत राज्य के प्रमुख रेलवे स्टेशनों को विश्वस्तरीय बनाने की घोषणा कागजों से निकलकर ज़मीन पर दिखनी चाहिए।
उत्तराखंड का सबसे संवेदनशील सामाजिक प्रश्न पलायन है। दशकों से “पहाड़ का पानी और जवानी पहाड़ के काम आए” का नारा गूंज रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि रोजगार के अभाव में गांव लगातार खाली हो रहे हैं। यदि इस बजट में पहाड़ी क्षेत्रों के लिए विशेष MSME पैकेज, स्टार्ट-अप्स को टैक्स छूट और ‘रिवर्स माइग्रेशन’ को प्रोत्साहित करने वाली योजनाएं नहीं आतीं, तो यह स्वीकार करना होगा कि नीति-निर्माताओं ने जमीनी सच्चाई से आंखें मूंद ली हैं। खेती और बागवानी को भी केवल परंपरागत नजरिये से नहीं देखा जा सकता।
जंगली जानवरों से बढ़ते नुकसान के बीच कोल्ड स्टोरेज, फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स और वैल्यू एडिशन के लिए सब्सिडी ही किसानों को वैकल्पिक और टिकाऊ आय दे सकती है।
पर्यटन उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन यह रीढ़ अब दबाव में है। चारधाम यात्रा के साथ-साथ मानसखंड कॉरिडोर जैसे नए धार्मिक पर्यटन सर्किट यदि बिना पर्यावरणीय संतुलन के विकसित किए गए, तो वे अवसर से अधिक संकट बन सकते हैं। 2026 में प्रस्तावित हरिद्वार कुंभ के लिए विशेष केंद्रीय सहायता केवल आयोजन तक सीमित न रहे, बल्कि सीवरेज, ठोस कचरा प्रबंधन और परिवहन जैसी स्थायी सुविधाओं पर केंद्रित हो। बढ़ती ‘फ्लोटिंग पॉपुलेशन’ को संभालने के लिए शहरी निकायों को अलग से बुनियादी ढांचा अनुदान देना समय की मांग है।
अंत में, केंद्र सरकार की ‘स्पेशल असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर कैपिटल इन्वेस्टमेंट’ (SASCI) योजना उत्तराखंड के लिए निर्णायक साबित हो सकती है—यदि इसके तहत राज्य का कोटा बढ़ाया जाए। पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण लागत मैदानी राज्यों की तुलना में 30–40 प्रतिशत अधिक होती है। इसे नजरअंदाज कर समान शर्तें थोपना, असमानता को संस्थागत रूप देना है।
उत्तराखंड को इस केंद्रीय बजट से सबसे अधिक जरूरत ठोस पूंजीगत सहायता और मजबूत आपदा प्रबंधन ढांचे की है। चूंकि 2027 में विधानसभा चुनाव भी नजदीक हैं, इसलिए नए मेडिकल कॉलेज, केंद्रीय विद्यालय या बड़े संस्थानों जैसी लोक-लुभावन घोषणाएं संभव हैं। लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि क्या यह बजट उत्तराखंड को केवल भावनात्मक नारों से आगे ले जाकर, उसकी भौगोलिक और पर्यावरणीय सच्चाइयों के अनुरूप न्यायपूर्ण संसाधन उपलब्ध कराता है या नहीं।
(लेखक पत्रकार और कई शोध पर्ण पुस्तकों के रचयिता हैं तथा इस न्यूज़ पोर्टल के संपादक मंडल के भी एक मानद सदस्य हैं, अन्य वरिष्ठ पत्रकारों के साथ ही इनकी सेवाएँ भी हमें निरंतर प्राप्त होती रहती हैं । –एडमिन)
