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बजट का सीजन आया ….!

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा –
फरवरी में शायद बजट पेश होगा I दरअसल बजट तो उन्हीं लोगों का होता है जिनके पास पैसा होता है, बाकी हम जैसे साधारण लोगों के लिए इतना ही है कि जो आया वह चला गया फिर अगले महीने की पगार का इंतजार रहता है ।
बजट कहता है कि हम कुछ नहीं खरीद सकते लेकिन यह भी नहीं कहता कि यह मत खरीदो । आम लोगों की यही अपेक्षा रहती है कि
बजट संतुलित होना चाहिए, कामकाज को चलाने के‌लिए सरकार को राजकोष को फिर भरना भी चाहिए लेकिन जनता पर पड़े हुए कर्ज़ के बोझ को भी कम करने की कोशिश होनी चाहिए और * लोक सेवकों* की ऐयाशी और फिजूलखर्च पर भी लगाम कसनी जरूरी है।
हिंदुस्तान में बजट के दिन मंत्री लोग खूब शेरो- शायरी सुनाते है, यह रिवाज पुराना चला आ रहा है, लोगों का ध्यान भटकाने के लिए कि- बेटा चोट पड़ने वाली है, उसे खुशी खुशी सह लेना लेकिन जो लोग हिम्मत वाले होते हैं वे कहते हैं कि–
वक्त का तकाजा है कि तूफान से जूझो।
कहां तक चलेंगे किनारे किनारे ।।”
टैक्स वसूली के संदर्भ में इस प्राचीन विचार को शायद सभी ने पढ़ा होगा कि महाकवि कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में रघुवंशी राजा दिलीप के आदर्श शासन का वर्णन करते हुए कहा कि वह प्रजा की समृद्धि के लिए ही उनसे टैक्स (बलि) लेते थे, ठीक वैसे ही जैसे सूर्य हजार गुना जल बरसाने के लिए पहले पृथ्वी से जल सोखता है।
“प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् । सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः ॥”

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