आईएमडी का अलर्ट: फरवरी में बढ़ेगा तापमान, हिमालय में सूखी सर्दी—जलवायु संकट की स्पष्ट चेतावनी

नई दिल्ली। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने संकेत दिया है कि इस वर्ष फरवरी का महीना सामान्य से अधिक गर्म रह सकता है और देश के अधिकांश हिस्सों में वर्षा औसत से कम होगी। विशेष रूप से पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र—जिसमें उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख शामिल हैं—में सूखी सर्दी का रुझान सामने आया है, जिसे वैज्ञानिक अध्ययनों में जलवायु परिवर्तन से जोड़ा जा रहा है।
आईएमडी के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्रा के अनुसार फरवरी में देशभर में न्यूनतम और अधिकतम दोनों तापमान सामान्य से ऊपर रह सकते हैं। इसका सीधा प्रभाव रबी फसलों पर पड़ने की आशंका है। उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में गेहूं व जौ जैसी फसलों में समय से पहले पकने (फोर्स्ड मैच्योरिटी) की स्थिति बन सकती है, जिससे दाने कमजोर रहेंगे और उत्पादन घट सकता है।
आईएमडी का आकलन है कि फरवरी में उत्तर-पश्चिम भारत—पूर्वी व पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, पंजाब, दिल्ली-एनसीआर, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख—में वर्षा सामान्य से कम रहने की संभावना है। महापात्रा के अनुसार दिसंबर और जनवरी के अधिकांश समय पश्चिमी विक्षोभों की अनुपस्थिति के कारण पश्चिमी हिमालय में सूखी सर्दी दर्ज की गई, जबकि कई क्षेत्रों में 20 जनवरी के बाद ही बर्फबारी देखने को मिली।
आईएमडी और अन्य संस्थानों के दीर्घकालिक अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि पश्चिमी हिमालय में सर्दियों की वर्षा और बर्फबारी में गिरावट का रुझान बढ़ रहा है। हालांकि, मौसम वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि किसी एक घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ना जटिल है, लेकिन समग्र पैटर्न अब लगातार एक ही दिशा में इशारा कर रहा है।
पूर्वी भारत के संदर्भ में आईएमडी ने बताया कि जनवरी में बंगाल की खाड़ी में बने एक अवदाब के बावजूद देश के पूर्वी हिस्सों में व्यापक वर्षा नहीं हुई, जबकि उत्तर-पूर्वी भारत अपेक्षाकृत इस प्रभाव से बाहर रहा। फरवरी में भी अधिकांश क्षेत्रों में अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने का अनुमान है।
हिमालयी राज्यों के लिए गंभीर निहितार्थ
उत्तराखंड जैसे हिमालयी राज्यों के लिए यह पूर्वानुमान केवल मौसम की सूचना नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक चेतावनी है। कम बर्फबारी का सीधा असर नदियों के जलप्रवाह, जलविद्युत उत्पादन और गर्मियों में पेयजल उपलब्धता पर पड़ता है। सूखी सर्दी जंगलों में आग की घटनाओं का जोखिम भी बढ़ाती है, जिसकी शुरुआत अब हर साल पहले होने लगी है। साथ ही, हिमनदों के तेजी से पिघलने और अनियमित वर्षा का खतरा भविष्य की आपदाओं की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अब हिमालयी राज्यों के लिए “आपदा के बाद राहत” की नीति पर्याप्त नहीं है। ज़रूरत है जलवायु अनुकूलन (Climate Adaptation), आपदा-पूर्व तैयारी, जल-वन-भूमि के एकीकृत प्रबंधन और कृषि को मौसम-सहिष्णु बनाने की ठोस रणनीति की। बदलते मौसम चक्र के बीच नीति-निर्माण में देरी का अर्थ है—आने वाले वर्षों में अधिक मानवीय और आर्थिक नुकसान।
