केंद्रीय बजट 2026-27: उधारी के सहारे विकास, लोक लुभावन
It is important to distinguish between indebtedness by choice (habitual borrowing) and indebtedness by necessity. While some fall into debt due to poor financial management, many are forced into it by systemic issues like inflation, medical emergencies, or lack of stable income.The debate over “fiscal populism” is significant. Critics argue that the government relies heavily on borrowing to fund large-scale welfare schemes, which risks increasing the national debt and burdening future generations. However, proponents argue these loans are “productive debt,” used to build infrastructure and provide a social safety net that prevents even deeper poverty. Balancing immediate relief with long-term fiscal health remains a primary economic challenge.

— जयसिंह रावत–
भारत जैसे विकासशील देश के लिए केंद्रीय बजट महज़ आय और व्यय का दस्तावेज नहीं होता, बल्कि वह सरकार की आर्थिक सोच, प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा का घोषणापत्र होता है। वर्ष 2026-27 का केंद्रीय बजट भी इसी कसौटी पर खरा उतरता दिखता है। यह बजट एक ऐसे भारत की तस्वीर पेश करता है जो बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है, लेकिन इस विकास यात्रा का बड़ा हिस्सा उधारी की बैसाखी पर टिका हुआ है। यही वह बिंदु है जहाँ “विकास की अनिवार्यता” और “वित्तीय जोखिम” के बीच संतुलन साधना सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरता है।
राजकोषीय गणित: घाटा, आय और सीमाएँ
बजट अनुमान 2026-27 के अनुसार केंद्र सरकार ने कुल ₹53.5 लाख करोड़ के व्यय का लक्ष्य रखा है, जबकि गैर-ऋण प्राप्तियां केवल ₹36.5 लाख करोड़ आंकी गई हैं। साफ है कि सरकार अपनी वास्तविक आय से लगभग ₹17 लाख करोड़ अधिक खर्च करने जा रही है। यही अंतर राजकोषीय घाटे के रूप में सामने आता है, जो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 4.3 प्रतिशत है। तकनीकी रूप से यह पिछले वर्ष के 4.4 प्रतिशत से थोड़ा कम जरूर है, लेकिन व्यवहार में यह संकेत देता है कि सरकार अब भी अपनी चादर से कुछ आगे पैर पसार रही है।
इस पूरे परिदृश्य में एक सकारात्मक पहलू कर राजस्व का है। ₹28.7 लाख करोड़ की शुद्ध कर प्राप्तियां यह बताती हैं कि कर आधार में विस्तार हुआ है और औपचारिक अर्थव्यवस्था मजबूत हुई है। वस्तु एवं सेवा कर (GST) और प्रत्यक्ष कर संग्रह में निरंतर वृद्धि इस बात की पुष्टि करती है कि राजस्व जुटाने की क्षमता में सुधार हुआ है, हालांकि यह सुधार बढ़ते खर्च के मुकाबले अभी भी अपर्याप्त नजर आता है।

पिछले एक दशक का कर्ज
भारतीय आर्थिक विमर्श में अक्सर उद्धृत कहावत “ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत” आज के परिदृश्य में असहज रूप से प्रासंगिक लगती है। पिछले एक दशक में केंद्र सरकार के कर्ज में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। वर्ष 2014-15 में जहाँ कुल केंद्रीय कर्ज लगभग ₹62 लाख करोड़ था, वहीं 2026-27 तक यह आंकड़ा ₹175 लाख करोड़ के पार पहुंचने का अनुमान है। यानी एक दशक से थोड़े अधिक समय में कर्ज लगभग तीन गुना हो गया है।
इस कर्ज का सबसे चिंताजनक पहलू ब्याज भुगतान है। आज बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल पुराने कर्ज पर ब्याज चुकाने में खर्च हो रहा है। इसका अर्थ यह है कि सरकार का एक महत्वपूर्ण संसाधन न तो विकास कार्यों में लग पा रहा है और न ही सामाजिक क्षेत्रों में, बल्कि केवल अतीत की उधारी को संभालने में खप रहा है। यदि उधार लिया गया धन उपभोग या सब्सिडी तक सीमित रह जाए, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक जोखिम पैदा करता है।
पूंजीगत व्यय: भविष्य में निवेश की उम्मीद
हालांकि इस तस्वीर का दूसरा, अपेक्षाकृत उजला पक्ष भी है। वर्ष 2026-27 के लिए ₹26.1 लाख करोड़ का पूंजीगत व्यय प्रस्तावित किया गया है। आर्थिक सिद्धांतों के अनुसार यदि उधारी का पैसा सड़क, रेल, बंदरगाह, ऊर्जा, डिजिटल नेटवर्क और शहरी अवसंरचना जैसी स्थायी परिसंपत्तियों के निर्माण में लगाया जाता है, तो यह केवल खर्च नहीं बल्कि भविष्य की उत्पादक क्षमता में निवेश होता है।
संशोधित अनुमानों के अनुसार कुल व्यय का लगभग आधा हिस्सा पूंजीगत कार्यों के लिए आवंटित किया जाना इस बात का संकेत है कि सरकार उधारी को केवल उपभोग तक सीमित रखने के बजाय संपत्ति निर्माण की दिशा में ले जाना चाहती है। यदि ये परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं और उनकी गुणवत्ता बनी रहती है, तो वे आने वाले वर्षों में आर्थिक वृद्धि को सहारा दे सकती हैं।
उधारी, बाजार और आर्थिक जोखिम
इसके बावजूद ₹17.2 लाख करोड़ की सकल बाजार उधारी चिंता पैदा करती है। जब सरकार बाजार से बड़े पैमाने पर कर्ज लेती है, तो बैंकों और वित्तीय संस्थानों के पास निजी क्षेत्र को ऋण देने के लिए अपेक्षाकृत कम संसाधन बचते हैं। इससे ब्याज दरों पर दबाव बढ़ सकता है और निजी निवेश प्रभावित हो सकता है, जिसे अर्थशास्त्र में ‘क्राउडिंग आउट प्रभाव’ कहा जाता है।
इसके साथ ही अनुमानित 55.6 प्रतिशत का ऋण-जीडीपी अनुपात भी एक चेतावनी संकेत है। यद्यपि यह कई विकसित देशों से कम है, लेकिन भारत जैसे उभरते बाजार के लिए यह स्तर सतर्कता की मांग करता है। वैश्विक रेटिंग एजेंसियां राजकोषीय अनुशासन और कर्ज प्रबंधन को गंभीरता से परखती हैं, और किसी भी तरह की चूक देश की साख पर असर डाल सकती है।
उधारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भारी बोझ
कुल मिलाकर केंद्रीय बजट 2026-27 एक साहसिक लेकिन जोखिमों से भरा प्रयोग प्रतीत होता है। एक ओर पिछले दशक में तेजी से बढ़ा कर्ज है, तो दूसरी ओर आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बुनियादी ढांचे के निर्माण की तीव्र आकांक्षा। यदि यह पूंजीगत निवेश अगले कुछ वर्षों में आर्थिक वृद्धि दर को 7 से 8 प्रतिशत के आसपास बनाए रखने में सफल रहता है, तो कर्ज का बोझ संभालना अपेक्षाकृत आसान होगा।
लेकिन यदि वैश्विक मंदी, भू-राजनीतिक तनाव या घरेलू आर्थिक कमजोरियों के कारण विकास की रफ्तार थमती है, तो यही उधारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भारी बोझ बन सकती है। अंततः इस बजट की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार उपभोग आधारित खर्च को कितनी सख्ती से नियंत्रित कर पाती है और परिसंपत्ति निर्माण को कितनी ईमानदारी व दक्षता से आगे बढ़ाती है। विकास की दौड़ उधारी की बैसाखी पर नहीं, बल्कि मजबूत आर्थिक अनुशासन के सहारे ही टिकाऊ बन सकती है।
(लेख में प्रकट विचार और तथ्य लेखक के निजी हैं- एडमिन)
