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आवाज़ में छिपा अवसाद: हमारी बोली बता सकती है मन का बोझ?

ज्योति रावत
मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में डिप्रेशन आज सबसे बड़ी वैश्विक चुनौतियों में शामिल है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया भर में 28 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी रूप में अवसाद से ग्रस्त हैं। भारत में यह समस्या और भी जटिल है, क्योंकि यहां मानसिक रोगों को लेकर सामाजिक चुप्पी, संसाधनों की कमी और विशेषज्ञों तक सीमित पहुंच अब भी बड़ी बाधा है। ऐसे में यदि कोई तकनीक यह दावा करे कि व्यक्ति की आवाज़ और बोलने के तरीके से डिप्रेशन के शुरुआती संकेत पहचाने जा सकते हैं, तो यह न केवल चिकित्सा विज्ञान, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के लिए भी एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है।
हाल ही में एम्स, दिल्ली (AIIMS Delhi) के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया एक अध्ययन इसी दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देता है। इस शोध में यह सामने आया है कि व्यक्ति की बोली—उसकी गति, ठहराव, स्वर और भावनात्मक उतार-चढ़ाव—डिप्रेशन की पहचान में सहायक हो सकती है, वह भी तब, जब रोग अभी चिकित्सकीय रूप से स्पष्ट न हुआ हो।
एम्स दिल्ली का शोध और उसके निष्कर्ष
एम्स के इस अध्ययन में 423 प्रतिभागियों के भाषण नमूनों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने मशीन लर्निंग तकनीकों की मदद से इन भाषणों में छिपे पैटर्न को समझने की कोशिश की। नतीजों ने चौंकाने वाला संकेत दिया—भाषण विश्लेषण के आधार पर डिप्रेशन की पहचान 60 से 75 प्रतिशत तक सटीक रही और जब लंबे भाषण नमूने लिए गए, तो यह सटीकता लगभग 78 प्रतिशत तक पहुंच गई।
शोध के अनुसार, अवसाद से ग्रस्त व्यक्ति आम तौर पर धीमी गति से बोलता है, शब्दों के बीच अनावश्यक ठहराव बढ़ जाता है, आवाज़ में भावनात्मक सपाटता आ जाती है और स्वर में उतार-चढ़ाव कम हो जाता है। यह बदलाव अक्सर अनजाने में होता है, जिसे सुनने वाला व्यक्ति सामान्य बातचीत में महसूस नहीं कर पाता, लेकिन मशीन आधारित विश्लेषण इन सूक्ष्म संकेतों को पकड़ लेता है।
आवाज़ कैसे बनती है मानसिक स्वास्थ्य का संकेतक
पिछले एक दशक में वैश्विक स्तर पर हुए कई शोध इस बात की पुष्टि कर चुके हैं कि डिप्रेशन केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि जैविक और व्यवहारिक बदलाव भी लाता है। इसका असर व्यक्ति की नींद, ऊर्जा, निर्णय क्षमता और संवाद शैली पर पड़ता है।
वैज्ञानिकों ने पाया है कि अवसाद की स्थिति में मस्तिष्क के वे हिस्से प्रभावित होते हैं, जो भावनात्मक अभिव्यक्ति और भाषण नियंत्रण से जुड़े होते हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति की आवाज़ में एकरूपता आ जाती है, जिसे तकनीकी भाषा में मोनोटोनस स्पीच कहा जाता है। शब्दों की तीव्रता घट जाती है, आवाज़ का कंपन बदल जाता है और बातचीत में उत्साह का अभाव दिखने लगता है।
यही कारण है कि आज भाषण को “डिजिटल बायोमार्कर” के रूप में देखने की दिशा में शोध आगे बढ़ रहा है।
मशीन लर्निंग और एआई की भूमिका
एम्स के अध्ययन सहित अंतरराष्ट्रीय शोधों में मशीन लर्निंग मॉडल—जैसे सपोर्ट वेक्टर मशीन (SVM), न्यूरल नेटवर्क और डीप लर्निंग तकनीकों—का उपयोग किया गया है। ये मॉडल व्यक्ति की आवाज़ से जुड़े कई तकनीकी संकेतों का विश्लेषण करते हैं, जैसे आवाज़ की आवृत्ति, ऊर्जा स्तर, ठहराव की अवधि और शब्दों का भावनात्मक स्वरूप।
कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि सिर्फ आवाज़ ही नहीं, बल्कि बातचीत में प्रयुक्त शब्द—जैसे नकारात्मक भाव, थकान, अकेलापन या निराशा से जुड़े संदर्भ—भी डिप्रेशन की तीव्रता का संकेत देते हैं। यही कारण है कि आने वाले समय में आवाज़ और भाषा, दोनों का संयुक्त विश्लेषण मानसिक स्वास्थ्य जांच का अहम औजार बन सकता है।
ग्रामीण और संसाधन-विहीन क्षेत्रों के लिए बड़ी संभावना
भारत जैसे देश में, जहां मनोचिकित्सकों और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट की भारी कमी है, भाषण आधारित स्क्रीनिंग एक उपयोगी विकल्प बन सकती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों, टेलीमेडिसिन सेवाओं या मोबाइल ऐप के माध्यम से यह तकनीक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की तरह काम कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी व्यक्ति में डिप्रेशन के शुरुआती संकेत समय रहते पकड़ लिए जाएं, तो गंभीर स्थिति बनने से पहले ही हस्तक्षेप संभव है। यह आत्महत्या रोकथाम, कार्यक्षमता बनाए रखने और सामाजिक स्वास्थ्य के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
लेकिन क्या यह तकनीक पूर्ण समाधान है?
हालांकि शोध के निष्कर्ष उत्साहजनक हैं, लेकिन विशेषज्ञ सावधानी बरतने की सलाह भी देते हैं। सबसे बड़ा सवाल निजता और डेटा सुरक्षा का है। किसी व्यक्ति की आवाज़ और मानसिक स्थिति से जुड़ा डेटा बेहद संवेदनशील होता है। इसके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
दूसरी बड़ी चुनौती भाषा और संस्कृति की विविधता है। भारत जैसे बहुभाषी देश में एक ही मॉडल सभी भाषाओं, बोलियों और सामाजिक पृष्ठभूमियों पर समान रूप से काम करे—यह अभी भी शोध का विषय है।
इसके अलावा, चिकित्सक इस बात पर भी जोर देते हैं कि ऐसी तकनीकें डॉक्टर का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक उपकरण हो सकती हैं। अंतिम निदान और उपचार हमेशा विशेषज्ञों द्वारा ही किया जाना चाहिए।
भविष्य की दिशा
भविष्य में शोधकर्ता भाषण विश्लेषण को चेहरे के भाव, टेक्स्ट मैसेज, नींद के पैटर्न और मोबाइल उपयोग जैसे अन्य डिजिटल संकेतों के साथ जोड़ने की दिशा में काम कर रहे हैं। इसे मल्टीमॉडल एनालिसिस कहा जा रहा है, जिससे डिप्रेशन की पहचान और भी सटीक हो सकती है।
यदि यह तकनीक वैज्ञानिक, नैतिक और कानूनी मानकों के साथ विकसित होती है, तो यह मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक सुलभ, समयबद्ध और समावेशी बना सकती है।
निष्कर्ष
एम्स दिल्ली सहित विश्व भर के शोध यह संकेत दे रहे हैं कि मन की पीड़ा अक्सर आवाज़ में झलकने लगती है, बस उसे सुनने के लिए सही तकनीक की जरूरत है। भाषण आधारित डिप्रेशन पहचान अभी शुरुआती दौर में है, लेकिन इसके संकेत स्पष्ट हैं—यह मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक नई दिशा खोल सकती है।

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