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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: नाबालिग लड़की को 30 सप्ताह के गर्भपात की अनुमति

 सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “किसी महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध मां बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता”

नई दिल्ली, 7 फरवरी । सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामले में शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को फैसला सुनाते हुए मुंबई की एक 17-18 साल की लड़की को अपनी 30 सप्ताह पुरानी गर्भावस्था को मेडिकल तरीके से समाप्त (Medical Termination of Pregnancy – MTP) करने की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अदालत किसी भी महिला को, खासकर नाबालिग को, उसकी मर्जी के खिलाफ गर्भावस्था जारी रखने या मां बनने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। यह फैसला महिला की प्रजनन स्वायत्तता (reproductive autonomy) को मजबूती से स्थापित करता है।

मामले की पूरी पृष्ठभूमि

यह मामला महाराष्ट्र से जुड़ा है। लड़की (जो गर्भधारण के समय नाबालिग थी और अब 18 साल से अधिक हो चुकी है) ने एक रिश्ते के कारण गर्भवती हो गई। लड़की और उसकी मां ने बॉम्बे हाईकोर्ट में गर्भपात की अनुमति मांगी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने 27 जनवरी 2026 को याचिका खारिज कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि 30 सप्ताह का भ्रूण स्वस्थ और viable (जीवन योग्य) है, इसलिए गर्भपात से भ्रूणहत्या होगी। हाईकोर्ट ने लड़की को डिलीवरी तक मेडिकल और मनोवैज्ञानिक सहायता देने तथा बच्चे को अनाथालय में सौंपने का निर्देश दिया था।

इस फैसले के खिलाफ लड़की की मां ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने मामले की सुनवाई की।

कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां और तर्क

पीठ ने सुनवाई के दौरान कई महत्वपूर्ण बातें कहीं:

  • “किसी महिला को, खासकर नाबालिग को, गर्भावस्था पूरी करने या बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।”
  • लड़की ने स्पष्ट और लगातार अपनी इच्छा जताई है कि वह बच्चे को जन्म नहीं देना चाहती। यह बच्चा अवैध (illegitimate) होगा, क्योंकि लड़की नाबालिग थी और रिश्ता वैवाहिक नहीं था। इससे उसे जीवन भर सामाजिक कलंक, मानसिक आघात और कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
  • “अगर कोर्ट उसे गर्भ जारी रखने के लिए कहेगा, तो लोग कोर्ट में नहीं आएंगे। वे झोलाछाप डॉक्टरों या अवैध केंद्रों में गर्भपात करवाएंगे, जिससे उनकी जान और स्वास्थ्य को खतरा होगा।”
  • कोर्ट ने नैतिक दुविधा भी स्वीकारी: “यह फैसला लेना बहुत मुश्किल है। एक तरफ 30 सप्ताह के भ्रूण का दिल धड़क रहा है, दूसरी तरफ लड़की की प्रजनन स्वायत्तता और मानसिक स्वास्थ्य। लेकिन निर्णायक कारक लड़की की इच्छा है।”
  • एमटीपी एक्ट, 1971 के तहत सामान्यतः 20-24 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति है, लेकिन विशेष मामलों में (जैसे नाबालिग, बलात्कार पीड़िता) कोर्ट अपनी शक्तियों से इससे अधिक समय पर भी अनुमति दे सकता है।
  • महाराष्ट्र सरकार ने तर्क दिया कि भ्रूण का दिल धड़क रहा है और समय से पहले जन्म से बच्चे को असामान्यता का खतरा है। बच्चे को अनाथालय में सौंपा जा सकता है। लेकिन पीठ ने पूछा कि राज्य किसके हितों की रक्षा कर रहा है — लड़की के या भ्रूण के?

कोर्ट का अंतिम आदेश

पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए याचिका मंजूर कर ली। कोर्ट ने मुंबई के जेजे ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स को निर्देश दिया कि:

  • लड़की की गर्भावस्था को मेडिकल टर्मिनेशन प्रक्रिया से समाप्त किया जाए।
  • सभी आवश्यक चिकित्सकीय सावधानियां (medical safeguards) बरती जाएं।
  • प्रक्रिया सुरक्षित और विशेषज्ञ डॉक्टरों की देखरेख में हो।
  • याचिकाकर्ता (मां) को लिखित सहमति (undertaking) जमा करनी होगी।

कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि प्रक्रिया में भ्रूणहत्या (feticide) नहीं होनी चाहिए, यानी सुरक्षित तरीके से प्रक्रिया पूरी हो।

इस फैसले का महत्व

यह फैसला महिला अधिकारों, खासकर नाबालिग लड़कियों की प्रजनन स्वायत्तता को मजबूत करता है। कोर्ट ने बार-बार दोहराया कि महिला का शरीर और उसका निर्णय सर्वोपरि है। अगर गर्भावस्था अनचाही है, तो उसे जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होगा। यह फैसला भविष्य के ऐसे मामलों में मिसाल बनेगा, जहां समय सीमा से अधिक गर्भावस्था में भी कोर्ट व्यक्तिगत परिस्थितियों को देखते हुए अनुमति दे सकता है।

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