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जाको राखे साइयां, मार सके न कोय

 

 

गोविंद प्रसाद बहुगुणा 

कबीर की यह उक्ति एक लेखक पित्रिम सोरोकिन पर लागू हुई जब वह मृत्यु दंड की सजा से बाल बाल बच गए..
Power & Morality *अर्थात् सत्ता और नैतिकता का साथ बड़ी मुश्किल से मिलता और निभता है।इसी टाइटिल के साथ प्रकाशित इस पुस्तक में गंभीर शोध/ अध्ययन के उपरांत एक ऐसा समाजशास्त्रीय विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है जिसका मुख्य तर्क यह है कि कुछ अपवादों को छोड़कर यही देखने में आया कि शासन- प्रशासन चलाने वाले ज्यादातर व्यक्तियों का बौद्धिक और नैतिक स्तर इतना घटिया होता है कि जिसके कारण समाज में उनकी कभी कोई प्रतिष्ठा नहीं बन पाती।
विश्व विख्यात समाजशास्त्री पित्रिम सरोकिन की यह पुस्तक साठ के दशक में मैने भी पढ़ी थी। किस्मत से यह किताब उस समय भवन बुक यूनिवर्सिटी बॉम्बे द्वारा प्रकाशित की गई थी, जब केo एमo मुंशी जी university की क्लासिक बुक सिरीज के संपादक थे। उन्होंने सस्ते दामों पर सामान्य पाठकों को ऐसी अनेक पुस्तकें उपलब्ध कराई थी । सोरोकिन की एक दूसरी पुस्तक Reconstruction of Humanity भी इसी सिरीज़ में प्रकाशित हुई थी, जो सौभाग्य से एक दिन हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर Wheelers book Stand पर मैंने खरीदी थी।
सोरोकिन को रूस की जारशाही के जमाने में मृत्यु दंड दिलाने की कोशिश की गई थी लेकिन एक विद्वान न्यायाधीश ने सोरोकिन को रूस से देश निकाला की सजा सुनाकर उनके प्राण बचा लिए। ठीक ही कहते हैं कि-
“जाको राखे साइयां, मार सके न कोय।
बाल न बांका कर सके, जो जग बैरी होय।।”
सोरोकिन को अंततः अमेरिका में शरण मिल गई जहां कालान्तर में वह वहां की प्रतिष्ठित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्र पढ़ाने लगे और उन्हीं की देखा देखी में दुनिया के अन्य विश्वविद्यालयों में भी यह विषय पढ़ाया जाने लगा। एक दिलचस्प बात उन्होंने यह भी कही कि मनुष्यता को कभी भी सत्ता का लक्ष्य नहीं बनाया गया, उसके प्रतीक चिन्हों में मनुष्य ही अनुपस्थित है और उसकी जगह हमेशा डरावने जीव रहे जेसे शेर, tiger सांप, ड्रेगन,बाज, Eagle आदि हिंसक जन्तु रहे।…

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