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भारत – अमरीका ट्रेड डील : अविश्वसनीय दोस्त के साथ भरोसे का संकट

जयसिंह रावत
डोनाल्ड ट्रम्प की राजनीति का सबसे खतरनाक पहलू उनका व्यक्तित्व नहीं, बल्कि उनकी अविश्वसनीयता है। ट्रम्प के साथ समस्या यह नहीं है कि वे सख़्त मोलभाव करते हैं, बल्कि यह है कि वे आज जिस समझौते पर दस्तख़त करते हैं, उसे कल खुद ही निरर्थक बना देते हैं। ऐसे में किसी भी देश के लिए, खासकर भारत जैसे उभरते शक्ति केंद्र के लिए, ट्रम्प के साथ हुए व्यापार समझौते को बड़ी उपलब्धि बताकर जश्न मनाना जल्दबाज़ी ही होगी।
भारत-अमेरिका संबंध कभी केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे। दो दशक पहले अमेरिका ने भारत को “स्वाभाविक साझेदार” कहा था। साझा लोकतांत्रिक मूल्यों, एशिया में चीन के बढ़ते प्रभाव और नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के समर्थन ने दोनों देशों को करीब लाया। उस दौर में भरोसा इस रिश्ते की बुनियाद था।
ट्रम्प ने इसी भरोसे को सबसे ज़्यादा नुकसान पहुँचाया।
ट्रम्प की सोच में अंतरराष्ट्रीय संबंध किसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा नहीं, बल्कि तत्काल लाभ का सौदा हैं। वे गठबंधनों को रणनीतिक पूंजी नहीं, बल्कि ऐसे व्यावसायिक अनुबंध मानते हैं जिन्हें जब चाहें, जैसे चाहें, तोड़ा या बदला जा सकता है। यही कारण है कि उनके शासनकाल में व्यापार समझौते स्थिरता नहीं, बल्कि अनिश्चितता का प्रतीक बन गए।
दक्षिण कोरिया इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। अमेरिका का करीबी सहयोगी होने के बावजूद उस पर भारी टैरिफ लगाए गए। संदेश साफ था—निकटता या मित्रता कोई सुरक्षा कवच नहीं है। यही संदेश भारत के लिए भी निहित है।

रवैया साझेदारी का नहीं, आदेश का
भारत से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अमेरिकी सामान खरीदे, नीतियाँ बदले, यहाँ तक कि अपनी ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े फैसलों में भी दबाव स्वीकार करे। यह रवैया साझेदारी का नहीं, आदेश का है। किसी संप्रभु देश के लिए यह स्थिति असहज ही नहीं, अस्वीकार्य भी होनी चाहिए।
ट्रम्प समर्थक अक्सर तर्क देते हैं कि “कुछ तो मिला”—टैरिफ घटे, बातचीत आगे बढ़ी। लेकिन यह लाभ कितना टिकाऊ है? जब नीतियाँ एक ट्वीट, एक रैली या एक चुनावी ज़रूरत से बदल सकती हों, तब ऐसे लाभ रेत पर खड़ी इमारत की तरह होते हैं।

दांव पर है अमेरिका की विश्वसनीयता
असल चिंता आर्थिक नुकसान से भी बड़ी है। दांव पर है अमेरिका की विश्वसनीयता। जब एक वैश्विक शक्ति समझौतों को हल्के में लेने लगे, तो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था कमजोर होती है। इसका असर सिर्फ द्विपक्षीय व्यापार पर नहीं, बल्कि सुरक्षा, तकनीक और भू-राजनीतिक संतुलन पर पड़ता है।
भारत-अमेरिका रिश्तों की मजबूती इस धारणा पर टिकी रही है कि अमेरिका एक अनुमानित और भरोसेमंद साझेदार है। ट्रम्प के दौर में यही धारणा सबसे अधिक दरकी है। यदि भरोसा नहीं रहा, तो सहयोग का ढांचा भी टिक नहीं पाएगा।
इसलिए सवाल यह नहीं है कि ट्रम्प के साथ समझौता हुआ या नहीं। असली सवाल यह है कि ऐसे व्यक्ति के साथ हुए समझौते पर भरोसा कितना किया जा सकता है, जो खुद ही संस्थाओं, नियमों और प्रतिबद्धताओं को तिरस्कार की नजर से देखता हो।
अस्थायी विराम की तरह्
ट्रम्प के साथ किसी भी समझौते को उपलब्धि नहीं, अस्थायी विराम की तरह देखना चाहिए। भारत को उत्साह नहीं, सतर्कता की ज़रूरत है। क्योंकि अविश्वसनीय नेतृत्व के साथ किया गया सौदा, अक्सर भरोसे से ज़्यादा जोखिम लेकर आता है। (लेख में प्रकट विचार और तर्क लेखक के निजी हैं, जिनसे एडमिन की सहमति जरूरी नहीं) 

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