शीतकाल में भी चारधाम में उमड़ रहा आस्था का सैलाब
-ज्योतिर्मठ से प्रकाश कपरुवाण-
बद्रीनाथ एवं केदारनाथ मंदिरों मे ग्रीष्मकाल मे जिस प्रकार प्रति वर्ष यात्रियों की संख्या मे बृद्धि हो रही है उसी प्रकार शीतकालीन पूजा स्थलों मे भी यात्रियों की संख्या मे बृद्धि देखी जा रही है, लेकिन बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अधीनस्थ कई स्थानों पर उपेक्षित पड़े मंदिरों का भी यदि कायाकल्प हो तो निश्चित ही इन पौराणिक महत्व के देवस्थलों तक भी श्रद्धालुओं का आवागमन हो सकेगा। मंदिर समिति के अधीन कई ऐसे मंदिर भी हैं जहाँ जीर्णोद्धार की प्रतीक्षा मे भगवान किसी कमरे मे रखें हैं तो जीर्णोद्धार के बाद नवनिर्मित एक ऐसा भी मंदिर है जहाँ भगवान अपने मूल स्थान पर जाने की प्रतीक्षा मे हैं।
उत्तराखंड मे ही गढ़वाल एवं कमायूँ मण्डलों मे ऐसे कई मंदिर हैं जो बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अधीन तो हैं पर राज्य गठन के 25वर्ष के बाद भी ये उपेक्षित पड़े हैं, राज्य गठन के बाद ज्योतिर्मठ -जोशीमठ मे भगवान नृसिंह के मंदिर के जीर्णोद्धार के बाद यहाँ न केवल ग्रीष्मकाल बल्कि शीतकाल मे भी श्रद्धालुओं की संख्या मे आशातीत बृद्धि देखी जा रही है, यदि बीकेटीसी नृसिंह मंदिर की तर्ज पर अन्य अधीनस्थ मंदिरों का भी जीर्णोद्धार करें तो निश्चित ही तीर्थाटन के माध्यम से रोजगार के अवसर तो बढ़ेंगे ही मंदिर समिति की आय मे भी इजाफा होगा।
श्री बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर अधिनियम 1939के अस्तित्व मे आने के साथ ही 45अन्य मंदिरों को भी समिति के अधीन किया गया जिसका उद्देश्य ही यही रहा कि बद्रीनाथ एवं केदारनाथ धामों के साथ साथ इनका भी कायाकल्प होगा, हालांकि पूर्व वर्षो तक बद्रीनाथ केदारनाथ मे भी यात्रियों की संख्या और आय इतनी नहीं थी कि सभी अधीनस्थ मंदिरों का भी जीर्णोद्धार किया जा सके. लेकिन पिछले एक डेढ़ दशक से यात्रियों की संख्या व आय मे भी आशातीत बृद्धि देखी जा रही है तो ऐसे मे अन्य उपेक्षित पड़े पौराणिक महत्व के अधीनस्थ मंदिरों के कायाकल्प होने की उम्मीद जगना भी स्वाभाविक ही है।
वर्ष 1990से पूर्व तक बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति की कमान उत्तर प्रदेश व देश के अन्य हस्तियों के पास रहती थी लेकिन 1991-92से अब तक उत्तराखंड मूल के लोगों के पास ही समिति की कमान रही है, इसके वाबजूद अधीनस्थ मंदिरों की सुध न लिया जाना देवभूमि के लिए चिंता की बात तो है ही।
बद्रीनाथ व केदारनाथ मंदिरों का प्रबंधन, आय, यात्रियों की संख्या, नियुक्तियां, चढ़ावा, यात्रियों की संख्या, क्यूआर कोड, दानिदाताओं के दान, दान मे दी गई भूमि आदि पर तो तो सबकी निगाहेँ रहती हैं लेकिन इसी समिति के अधीन अन्य अधीनस्थ पौराणिक मंदिरों की दशा पर मजबूत आवाजें उठती नहीं दिखती।
उत्तराखंड के ही गढ़वाल मंडल मे कुलसारी व नंदप्रयाग आदि के मंदिरों की स्थिति हो या कुमायूँ मंडल के गड़सीर, द्वाराहाट व बयाला मे स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर जो बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति के अधीनस्थ मंदिरों मे तो हैं पर इनकी दशा किसी से छुपी नहीं हैं, इनके अलावा जोशीमठ मे ही नव दुर्गा सिद्ध पीठ, वासुदेव मंदिर परिसर के जीर्णोद्धार सहित बेहतर पार्किंग सुविधा की मांग स्थानीय देवपुजाई समिति द्वारा वर्षो से की जा रही है। यही नहीं योग बद्री मंदिर पाण्डुकेश्वर तक हल्का वाहन मोटर मार्ग जो वर्ष 2017-18 मे मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद भी आज तक नहीं बन सका।
आस्था के धाम बद्रीनाथ एवं केदारनाथ मंदिर लाखों लोगों की आजीविका का संचालन कर रहे हैं, इनके अलावा मंदिर समिति ही रोजगार के माध्यम से सैकड़ों परिवारों का भरण पोषण कर रही है, यदि उत्तराखंड के ही अन्य अधीनस्थ मंदिरों का कायाकल्प होगा तो निश्चित ही इन देवस्थलों तक वर्ष भर यात्रियों का आवागमन होगा और वहाँ के आसपास के लोग भी तीर्थाटन के माध्यम से रोजगार से जुड़ेंगे व मंदिर समिति की आय मे भी बृद्धि होगी।
बद्रीनाथ केदारनाथ मंदिर समिति अधीनस्थ मंदिरों के जीर्णोद्धार एवं व्यापक प्रचार प्रसार के लिए प्रतिबद्ध है, इन दिनों मंदिर समिति की टीम विभिन्न अधीनस्थ मंदिरों तक पहुंचकर वीडियोग्राफी व फोटोग्राफी का कार्य कर रही है ताकि जल्द से जल्द इनके जीर्णोद्धार की कार्ययोजना को मूर्तरूप दिया जा सके………. ऋषि प्रसाद सती, उपाध्यक्ष बीकेटीसी।
