मसूरी का डरावना भूस्खलन मानचित्रण : कई इलाके गंभीर खतरे में

SCIENTISTS FROM WADIA INSTITUTE OF HIMALAYAN GEOLOGY (WIHG), AN AUTONOMOUS INSTITUTE UNDER THE DEPARTMENT OF SCIENCE AND TECHNOLOGY, GOVT. OF INDIA, CARRIED OUT THE STUDY IN MUSSOORIE TOWNSHIP AND ITS SURROUNDINGS COVERING 84 SQUARE KM IN THE LESSER HIMALAYA. THEY FOUND THAT DOMINANT PART OF THE AREA FALLING UNDER VERY HIGH AND HIGH LANDSLIDE SUSCEPTIBLE ZONE LIES IN THE SETTLEMENT AREA –. BATAGHAT, GEORGE EVEREST, KEMPTY FALL, KHATTAPANI, LIBRARY ROAD, GALOGIDHAR, AND HATHIPAON AND ARE COVERED BY HIGHLY FRACTURED KROL LIMESTONE EXHIBITING SLOPE MORE THAN 60 DEGREES.

-जयसिंह रावत-
पर्वतों की रानी मसूरी, आज एक गंभीर भूगर्भीय संकट की दहलीज पर खड़ी है। हिमालय की गोद में स्थित इस पर्यटन स्थल पर भूस्खलन की निरंतर बढ़ती आवृत्तियां न केवल चिंता का विषय हैं, बल्कि यह पारिस्थितिक संतुलन के बिगड़ने का एक स्पष्ट संकेत भी हैं। उत्तराखंड के इस संवेदनशील क्षेत्र में घटित होने वाली ये आपदाएं काफी हद तक अनियंत्रित बुनियादी ढांचे के विस्तार और मानवीय हस्तक्षेप का प्रत्यक्ष परिणाम मानी जा रही हैं। हिमालयी तंत्र की इस नाजुकता को समझते हुए, भविष्य के संभावित खतरों के न्यूनीकरण हेतु क्षेत्र का वैज्ञानिक मानचित्रण अब एक अपरिहार्य आवश्यकता बन गया है। इसी दिशा में कदम उठाते हुए, भू-वैज्ञानिकों ने मसूरी और उसके परिधीय क्षेत्रों की भूगर्भीय संवेदनशीलता का गहन विश्लेषण किया है। हालिया वैज्ञानिक निष्कर्षों ने इस चिंता को और पुख्ता किया है कि इस क्षेत्र का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा ‘अत्यधिक संवेदनशील’ श्रेणी में आता है, जो किसी भी समय बड़ी प्राकृतिक विभीषिका का कारण बन सकता है।
वाडिया संस्थान का अध्ययन और भूगर्भीय निष्कर्ष
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अधीन कार्यरत वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के शोधकर्ताओं ने मसूरी के आसपास के लगभग 84 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। इस शोध में यह पाया गया कि भूस्खलन की दृष्टि से सबसे खतरनाक क्षेत्रों में भाटाघाट, जॉर्ज एवरेस्ट, केम्प्टी फॉल, खट्टापानी, लाइब्रेरी रोड, गलोगीधार और हाथीपांव जैसे प्रमुख आबादी वाले इलाके शामिल हैं। इन क्षेत्रों की भौगोलिक बनावट काफी जटिल है क्योंकि ये अत्यधिक खंडित क्रोल चूना पत्थर से आच्छादित हैं। यहाँ पहाड़ियों की ढलान 60 डिग्री से भी अधिक है, जो मिट्टी और चट्टानों की पकड़ को कमजोर कर देती है। जर्नल ऑफ अर्थ सिस्टम साइंस में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, क्षेत्र का 29 प्रतिशत हिस्सा हल्के भूस्खलन की श्रेणी में आता है, जबकि एक बड़ा हिस्सा यानी 56 प्रतिशत भाग बहुत बड़े स्तर की भूस्खलन संवेदनशीलता के दायरे में आता है।
शोध पद्धति और तकनीकी विश्लेषण के आधार
इस व्यापक अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने आधुनिक तकनीक और सांख्यिकीय मॉडलों का समन्वय किया है। शोधकर्ताओं द्वारा भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) और उपग्रह से प्राप्त उच्च-क्षमता वाले चित्रों का विश्लेषण करने के लिए द्विभाजक सांख्यिकीय यूल गुणांक विधि का प्रयोग किया गया। अध्ययन के दौरान भूस्खलन के विभिन्न कारकों जैसे चट्टानों की प्रकृति, भूमि उपयोग के तरीके, ढलान की तीव्रता, ऊँचाई, जल निकासी की व्यवस्था और सड़क निर्माण के कारण होने वाले कटाव को प्रमुख आधार बनाया गया। वैज्ञानिकों ने लैंडस्लाइड ऑक्युवेशन फेवरोबिलिटी स्कोर (LOFS) के माध्यम से डेटा एकत्र किया और फिर लैंडस्लाइड ससेप्टिबिलिटी इंडेक्स (LSI) तैयार किया। इस सूचकांक को प्राकृतिक मानकों के आधार पर पांच अलग-अलग क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है ताकि आपदा प्रबंधन की रणनीतियां सटीक रूप से बनाई जा सकें। हाल के वर्षों में जानेमाने भूविज्ञानी डॉ0 महेंद्र प्रताप सिंह बिस्ट ने मसूरी में जल स्रोतों (Springs) और भूगर्भीय संरचना के अंतर्संबंधों पर भी कार्य किया है। उनके शोध के अनुसार, पहाड़ों के भीतर पानी के रिसाव का प्रबंधन न होना भूस्खलन का एक बड़ा कारण बनता है, जो वाडिया इंस्टीट्यूट के वर्तमान निष्कर्षों से भी मेल खाता है।
निर्माण और शहरी नियोजन का नियमन
भूस्खलन के खतरों को कम करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण कदम निर्माण कार्यों पर सख्त नियंत्रण है। वैज्ञानिक मानचित्रण के आधार पर उन क्षेत्रों को ‘नो-कंस्ट्रक्शन ज़ोन’ घोषित किया जाना चाहिए जहाँ ढलान 60 डिग्री से अधिक है या जहाँ क्रोल चूना पत्थर की चट्टानें अत्यधिक खंडित हैं। भविष्य में किसी भी बड़े निर्माण या सड़क चौड़ीकरण से पहले ‘जियोलॉजिकल इम्पैक्ट असेसमेंट’ अनिवार्य किया जाए। इसके साथ ही, ऊँची इमारतों के बजाय हल्की और भूकंपरोधी निर्माण सामग्री के उपयोग को प्राथमिकता दी जानी चाहिए ताकि ढलानों पर अतिरिक्त भार न पड़े। लगभग दो दशकों तक उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी निभा चुके वरिष्ठ भूविज्ञानी डॉ0 पियूष रौतेला ने मसूरी जैसे हिमालयी कस्बों में निर्मित पर्यावरण (Built Environment) और अस्पतालों की भूकंपीय संवेदनशीलता पर शोध किया है। उनके अध्ययन बताते हैं कि तीव्र ढलानों पर बने निर्माण कार्य न केवल भूकंप बल्कि भूस्खलन के खतरे को भी कई गुना बढ़ा देते हैं।
जल निकासी और ड्रेनेज सिस्टम का सुदृढ़ीकरण
पहाड़ों पर भूस्खलन का एक प्रमुख कारण अनियंत्रित जल निकासी है। भारी वर्षा के दौरान जब पानी सड़क के किनारों या कच्ची ढलानों से रिसकर चट्टानों के भीतर जाता है, तो वह ‘लुब्रिकेंट’ का काम करता है जिससे पूरी ढलान खिसक सकती है। मसूरी के शहरी इलाकों और केम्प्टी फॉल जैसे पर्यटन स्थलों में एक सुव्यवस्थित और कंक्रीट-लाइन वाली ड्रेनेज प्रणाली विकसित करना अनिवार्य है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि प्राकृतिक जल स्रोतों का रास्ता निर्माण कार्यों की वजह से बाधित न हो, जिससे पानी का दबाव पहाड़ियों के अंदरूनी हिस्सों पर न बने।
बायो–इंजीनियरिंग और हरित आवरण का विस्तार
चट्टानों को प्राकृतिक रूप से मजबूती देने के लिए बायो-इंजीनियरिंग तकनीकों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। संवेदनशील ढलानों पर गहरी जड़ों वाले स्थानीय पेड़ों और घास का रोपण करने से मिट्टी की पकड़ मजबूत होती है। इसके अतिरिक्त, जहाँ सड़कें काटी गई हैं, वहां केवल कंक्रीट की दीवारें बनाने के बजाय ‘मिट्टी की जाली’ (Geo-grids) और ‘गेबियन वॉल’ का उपयोग किया जाना चाहिए। यह तकनीक न केवल ढलान को स्थिरता प्रदान करती है बल्कि पानी के निकास को भी आसान बनाती है, जिससे दीवारों के गिरने का खतरा कम हो जाता है।
प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और सामुदायिक जागरूकता
प्रौद्योगिकी का लाभ उठाते हुए संवेदनशील क्षेत्रों में ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ और सेंसर लगाए जाने चाहिए जो मिट्टी में मामूली हलचल या जल स्तर में वृद्धि होने पर तत्काल अलर्ट जारी कर सकें। इसके साथ ही, स्थानीय निवासियों और होटल व्यवसायियों के लिए नियमित आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल का आयोजन किया जाना चाहिए। पर्यटन सीजन के दौरान आने वाले यात्रियों को डिजिटल सूचना पट्टों के माध्यम से संवेदनशील रास्तों और सुरक्षित स्थानों की जानकारी दी जानी चाहिए, ताकि किसी भी आपातकालीन स्थिति में त्वरित निकासी (Evacuation) सुनिश्चित की जा सके।
(जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के लिए लिंक: https://doi.org/10.1007/s12040-020-01428-7)
