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भीषण गर्मी में कैसे जिंदा रहते हैं धरती के सबसे पुराने जीव?

As the planet’s climate changes rapidly, with ocean and surface water temperatures rising, it’s becoming more important to understand how some of the earliest heat-loving organisms developed ways to survive in extreme heat. Archaea, which means “ancient things” in Greek, are one of the oldest forms of life on Earth and belong to a group called the third domain of life. Many archaea live in some of the harshest environments on Earth, which makes them ideal for studying how life can survive in tough conditions.In a recent study published in the journal mBio (American Society for Microbiology), Dr. Ghosh and his team uncovered a novel function of the TA system in archaea. They studied a specific TA system in a heat-loving archaeon called Sulfolobus acidocaldarius to understand how it helps these organisms.

                                                         प्रस्तावित मॉडल जो ताप तनाव के दौरान वैपबीसी4 टीए प्रणाली की कार्यविधि को दर्शाता है।

 

By- Jyoti Rawat

जैसे-जैसे पृथ्वी की जलवायु बदल रही है और तापमान बढ़ रहा है, वैज्ञानिकों के सामने यह सवाल है कि आखिर भीषण गर्मी में जीवन कैसे बच सकता है? इस सवाल का जवाब वैज्ञानिकों को पृथ्वी के कुछ सबसे पुराने और सूक्ष्म जीवों के पास मिला है।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान, बोस इंस्टीट्यूट (Bose Institute) के वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि कैसे कुछ आदिम जीव (Ancient Organisms) उबलते हुए पानी और ज्वालामुखी जैसी जानलेवा गर्मी में भी खुद को जिंदा रखते हैं।

कौन हैं ये ‘आर्किया’ (Archaea)?

ये जीव ‘आर्किया’ कहलाते हैं। ग्रीक भाषा में इसका अर्थ है- “प्राचीन चीजें”। ये पृथ्वी पर जीवन के सबसे पुराने रूपों में से एक हैं। ये ऐसी जगहों पर पाए जाते हैं जहाँ आम तौर पर जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती, जैसे- उबलते हुए गर्म पानी के कुंड या ज्वालामुखी के मुहाने।

भारतीय वैज्ञानिकों की खोज

डॉ. अभ्रज्योति घोष और उनकी टीम ने अंडमान और निकोबार के बैरन द्वीप (भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी) और दुनिया के अन्य ज्वालामुखी क्षेत्रों में पाए जाने वाले एक विशेष जीव ‘सल्फोलोबस एसिडोकैल्डेरियस’ पर अध्ययन किया। यह जीव 90 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में भी मजे से रहता है।

जीवित रहने का अनोखा तरीका: ‘पावर सेविंग मोड’

वैज्ञानिकों ने पाया कि इन जीवों के शरीर में एक विशेष प्रणाली होती है जिसे ‘टॉक्सिन-एंटीटॉक्सिन’ (विष-प्रतिविष) सिस्टम कहते हैं। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं:

  1. सामान्य स्थिति: जब सब कुछ ठीक होता है, तो जीव के अंदर एक ‘विष’ (Toxin) और उसका ‘काट’ (Antitoxin) दोनों मौजूद होते हैं। ‘काट’ उस ‘विष’ को दबा कर रखता है, जिससे जीव सामान्य रूप से अपना काम करता रहता है।

  2. खतरे की घंटी (गर्मी): जैसे ही गर्मी बहुत ज्यादा बढ़ जाती है (हीट स्ट्रेस), जीव के अंदर मौजूद ‘काट’ वाला प्रोटीन नष्ट हो जाता है।

  3. सुरक्षा कवच: ‘काट’ के हटते ही ‘विष’ आजाद हो जाता है। यह विष जीव को मारता नहीं है, बल्कि उसके शरीर में प्रोटीन बनने की प्रक्रिया को रोक देता है।

  4. गहरी नींद (कोमा): प्रोटीन बनना बंद होते ही यह सूक्ष्म जीव एक तरह की “गहरी नींद” (Dormant State) में चले जाते हैं। इसे वैज्ञानिकों ने “परसिस्टर सेल” या स्थायी कोशिका कहा है।

आसान शब्दों में कहें तो, जैसे हम मोबाइल की बैटरी कम होने पर उसे ‘पावर सेविंग मोड’ में डाल देते हैं, वैसे ही ये जीव गर्मी बढ़ते ही अपनी गतिविधियां बंद कर देते हैं और सो जाते हैं। इससे उनकी ऊर्जा बचती है और खराब प्रोटीन नहीं बनते। जैसे ही मौसम ठीक होता है, वे फिर से सक्रिय हो जाते हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?

यह अध्ययन (जो अमेरिकन सोसाइटी फॉर माइक्रोबायोलॉजी के जर्नल में प्रकाशित हुआ है) हमें बताता है कि कुदरत ने जीवों को कठिन से कठिन परिस्थितियों, ग्लोबल वार्मिंग और बदलती जलवायु से निपटने के लिए कैसे तैयार किया है। यह जानकारी भविष्य में विज्ञान के लिए बेहद मददगार साबित हो सकती है।

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