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तटीय क्षेत्रों में आजीविका, पोषण और हरित अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार

नई दिल्ली। भारत की 11,099 किलोमीटर लंबी तटरेखा समुद्री शैवाल की खेती के लिए अपार संभावनाएं समेटे हुए है। इसी को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार समुद्री शैवाल को ब्लू इकोनॉमी के एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में विकसित करने की दिशा में लगातार कदम उठा रही है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) तथा सीएसआईआर के केंद्रीय नमक एवं समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (सीएसएमसीआरआई) द्वारा देशभर में संभावित क्षेत्रों की पहचान और मानचित्रण का कार्य किया गया है।

अब तक आंध्र प्रदेश सहित तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में समुद्री शैवाल की खेती के लिए 384 संभावित स्थलों की पहचान की गई है, जिनका कुल क्षेत्रफल लगभग 24,707 हेक्टेयर है। तमिलनाडु, गुजरात, आंध्र प्रदेश और लक्षद्वीप जैसे क्षेत्रों में समुद्री शैवाल की खेती धीरे-धीरे विस्तार ले रही है।

पीएम मत्स्य संपदा योजना से मिल रहा प्रोत्साहन

केंद्र सरकार के मत्स्य विभाग द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के अंतर्गत वर्ष 2020-21 से 2025-26 के दौरान समुद्री शैवाल की खेती को प्राथमिक गतिविधि के रूप में शामिल किया गया है। योजना के तहत राफ्ट, मोनोलाइन और ट्यूबनेट जैसी संरचनाओं की स्थापना, समुद्री शैवाल बीज बैंक और हैचरियों की स्थापना, बहुउद्देशीय समुद्री शैवाल पार्क, प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण, अनुसंधान तथा पूर्व-व्यवहार्यता अध्ययनों के लिए सहायता प्रदान की जा रही है।

पिछले पांच वर्षों में समुद्री शैवाल की खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए 198.17 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इन परियोजनाओं से स्वयं सहायता समूहों, महिला समूहों और व्यक्तिगत किसानों को लाभ मिल रहा है, जिससे तटीय क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर सृजित हो रहे हैं।

समुद्री शैवाल की उपयोगिता: बहुउपयोगी प्राकृतिक संसाधन

समुद्री शैवाल की बढ़ती मांग का प्रमुख कारण इसकी बहुआयामी उपयोगिता है।

खाद्य और पोषण के क्षेत्र में, समुद्री शैवाल प्रोटीन, आयोडीन, कैल्शियम, आयरन और विभिन्न विटामिनों से भरपूर होता है। इसका उपयोग सूप, सलाद, नूडल्स और स्वास्थ्यवर्धक खाद्य उत्पादों में किया जाता है। यह कुपोषण से निपटने में सहायक माना जाता है।

औषधीय उपयोग में समुद्री शैवाल से एंटीऑक्सीडेंट, एंटीबैक्टीरियल और एंटीवायरल गुणों वाली दवाएं तैयार की जाती हैं। थायरॉइड, मधुमेह और हृदय रोगों के उपचार में भी इसका महत्व बढ़ रहा है।

सौंदर्य प्रसाधन उद्योग में समुद्री शैवाल का उपयोग क्रीम, लोशन, फेस मास्क और शैंपू जैसे उत्पादों में किया जाता है, जो त्वचा और बालों के लिए लाभकारी होते हैं।

कृषि क्षेत्र में, समुद्री शैवाल से जैविक खाद और बायो-स्टिमुलेंट बनाए जाते हैं, जो फसलों की वृद्धि बढ़ाने, मिट्टी की उर्वरता सुधारने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में मदद करते हैं।

औद्योगिक उपयोग के अंतर्गत समुद्री शैवाल से एगार, एल्गिनेट और कैरेजीनन जैसे पदार्थ प्राप्त होते हैं, जिनका उपयोग खाद्य प्रसंस्करण, औषधि, कपड़ा और कागज उद्योग में व्यापक रूप से किया जाता है।

पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से समुद्री शैवाल कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करता है तथा समुद्री जैव विविधता को बढ़ावा देता है।

क्लस्टर और उत्कृष्टता केंद्र की स्थापना

सरकार ने लक्षद्वीप को समुद्री शैवाल क्लस्टर के रूप में नामित किया है। वहीं, आईसीएआर-सीएमएफआरआई के मंडपम क्षेत्रीय केंद्र को समुद्री शैवाल विकास के लिए उत्कृष्टता केंद्र घोषित किया गया है। तमिलनाडु में स्थापित बहुउद्देशीय समुद्री शैवाल पार्क में एकीकृत खेती, प्रसंस्करण और उत्पाद विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है।

इसके साथ ही, राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड द्वारा प्रशिक्षण, प्रदर्शन और एक्सपोजर विजिट के माध्यम से जागरूकता और कौशल विकास के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। आंध्र प्रदेश में 12 तटीय जिलों में 1,440 स्वयं सहायता समूहों और मछुआरों को प्रशिक्षण दिया गया है।

भविष्य की हरित अर्थव्यवस्था की ओर कदम

विशेषज्ञों के अनुसार, समुद्री शैवाल की खेती न केवल तटीय समुदायों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि यह सतत विकास, पोषण सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी एक मजबूत आधार प्रदान करती है। सरकार के निरंतर प्रयासों से आने वाले वर्षों में समुद्री शैवाल भारत की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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