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यूक्रेन युद्ध की मार इंसानों तक ही सीमित नहीं, यूक्रेन के कुत्ते भी बदल गए

शोधकर्ताओं ने रूस के साथ युद्ध की अग्रिम पंक्ति में पूर्व पालतू कुत्तों में चौंकाने वाले बदलाव पाए

Ihor Dykyy, a zoologist at the Ivan Franko National University of Lviv, with Linda, a Saint Bernard who perished from a vehicle strike.

-लेखक: एंथनी हैम-

यूक्रेन में जारी युद्ध को अब चार साल के करीब होने को हैं। अब तक इस युद्ध की चर्चा आमतौर पर इंसानों की मौत, उजड़े शहरों और आर्थिक तबाही तक सीमित रही है। लेकिन हालिया एक वैज्ञानिक अध्ययन बताता है कि युद्ध की मार केवल इंसानों पर नहीं पड़ी है। यूक्रेन के पालतू कुत्ते भी इस युद्ध में बदल गए हैं—इतने कि कई अब अपने पुराने, घरेलू रूप में दिखाई ही नहीं देते।

दिसंबर 2025 में प्रकाशित एक शोध में सामने आया कि रूस-यूक्रेन युद्ध की अग्रिम पंक्ति के आसपास रहने वाले कुत्ते बहुत कम समय में ऐसे ढल गए हैं, जैसे वे फिर से जंगली जीवन की ओर लौट रहे हों। यह बदलाव न केवल उनके व्यवहार में, बल्कि उनकी शारीरिक बनावट में भी साफ दिखाई देता है।

जब घर छूटे, मालिक बिछड़े

युद्ध शुरू होते ही यूक्रेन के लाखों नागरिकों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा। इस हड़बड़ी और भय के माहौल में हजारों पालतू जानवर पीछे छूट गए। कुछ कुत्तों को रेलवे स्टेशनों पर छोड़ दिया गया, तो कुछ कब्जे वाले या गोलाबारी से घिरे इलाकों में ही रह गए।लवीव विश्वविद्यालय की प्राणी विज्ञानी और अध्ययन की प्रमुख लेखिका मारिया मार्त्सिव बताती हैं कि युद्ध के शुरुआती दिनों से ही पालतू जानवरों की हालत बेहद दर्दनाक रही। उनके अनुसार, कुछ लोग अपने कुत्तों को साथ ले जाने में सफल रहे, लेकिन बहुत से जानवर अचानक बेसहारा हो गए और उन्हें आवारा जीवन अपनाना पड़ा।

763 कुत्तों पर नज़र

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने यूक्रेन के नौ अलग-अलग क्षेत्रों में 763 कुत्तों से जुड़े आंकड़े जुटाए। इसमें पशु आश्रयों में रह रहे कुत्ते, अपेक्षाकृत सुरक्षित इलाकों के आवारा कुत्ते और युद्ध की अग्रिम पंक्ति के कुत्ते शामिल थे।अग्रिम मोर्चे से जानकारी जुटाना सबसे कठिन था। यह काम इहोर दिकीय ने संभाला, जो लवीव स्थित इवान फ्रैंको राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में प्राणी विज्ञानी हैं। वे 2022 से दो वर्षों तक यूक्रेनी सशस्त्र बलों के साथ स्वयंसेवक के रूप में युद्ध क्षेत्र में रहे।दिकीय बताते हैं कि जारिचने गांव में कई आवारा कुत्ते सैनिकों के साथ रहने लगे थे। गोलाबारी से डरे ये कुत्ते शेल शॉक तक का शिकार थे। किसी की टांग टूटी थी, किसी ने विस्फोट में आंख गंवा दी थी। सैनिकों ने जहां तक संभव हुआ, इन कुत्तों को खाना, आश्रय और इलाज दिया।

शरीर की बनावट बदलने लगी

शोध में सामने आया कि युद्ध क्षेत्र के कुत्तों की शारीरिक बनावट में स्पष्ट बदलाव आया है। अग्रिम मोर्चे के कुत्तों में न तो बहुत छोटी थूथन दिखी और न ही बहुत लंबी। उनका शरीर हल्का और मजबूत था। उनके कान अक्सर नुकीले और खड़े थे, जबकि झुके हुए कान कम नजर आए। शरीर पर सफेद रंग भी कम पाया गया। ये सभी लक्षण आमतौर पर भेड़ियों और अन्य जंगली कुत्तों में देखे जाते हैं। मारिया मार्त्सिव के अनुसार, अग्रिम मोर्चे पर वही कुत्ते ज्यादा समय तक जीवित रह पाए जिनमें ये जंगली लक्षण थे। सीधे कान, सीधी पूंछ और हल्का शरीर उन्हें कठिन हालात में फायदा पहुंचाते थे।

व्यवहार भी हुआ जंगली सा

केवल शरीर ही नहीं, कुत्तों का व्यवहार भी बदला। युद्ध क्षेत्रों में बूढ़े, बीमार और घायल कुत्ते कम नजर आए। जो कुत्ते बचे, वे ज्यादा सतर्क, डरपोक और फुर्तीले थे। कई कुत्ते अकेले घूमने के बजाय झुंड बनाकर रहने लगे। झुंड में रहने से उन्हें भोजन ढूंढने, खतरे से बचने और इलाके पर नजर रखने में मदद मिलती थी।

क्या यह तेज़ विकास है?

इतनी तेजी से आए बदलावों को देखकर यह सवाल उठा कि क्या यह जैविक विकास की तेज़ प्रक्रिया है। लेकिन वैज्ञानिक इससे सहमत नहीं हैं। पोलैंड के ग्दांस्क विश्वविद्यालय की शोधार्थी माल्गोर्ज़ाता विटेक बताती हैं कि ये बदलाव आनुवंशिक विकास के कारण नहीं हैं। इसके लिए समय बहुत कम है। असल में युद्ध की परिस्थितियां एक कठोर चयन प्रक्रिया की तरह काम कर रही हैं। जो कुत्ते हल्के, सतर्क और फुर्तीले थे, वे बच गए। भारी शरीर वाले या कम सतर्क कुत्ते ज्यादा खतरे में रहे। हल्का शरीर बारूदी सुरंगों को सक्रिय करने से बचाता है, मलबे में छिपने में मदद करता है और गोलियों का छोटा निशाना बनता है।

इंसानों से नाता पूरी तरह टूटा नहीं

हालांकि कुत्तों में जंगली लक्षण दिखे, फिर भी अधिकांश कुत्ते पूरी तरह इंसानों से अलग नहीं हुए। वे अब भी सैनिकों या स्थानीय लोगों से मिलने वाले भोजन पर निर्भर थे। जरूरत पड़ने पर उन्होंने पौधे खाए या छोटे जानवरों का शिकार किया। कठिन परिस्थितियों में कुछ कुत्तों ने मारे गए सैनिकों के शवों से भोजन जुटाकर भी खुद को जीवित रखा। कई कुत्तों को यूक्रेनी सैनिकों ने गोद लिया और वे उनके साथ ही रहने लगे।

फिर से जंगली जीवन की ओर

शोधकर्ताओं ने कुछ ऐसे कुत्ते भी देखे जो अब इंसानों पर निर्भर नहीं थे। वैज्ञानिक इसे “फेरलाइजेशन”, यानी पालतू जानवरों का फिर से स्वतंत्र और जंगली जीवन की ओर लौटना कहते हैं। परियोजना की प्रमुख वैज्ञानिक माल्गोर्ज़ाता पायलट के अनुसार, यह प्रक्रिया दिखाती है कि युद्ध कैसे जानवरों को भी अपने अस्तित्व के लिए पूरी तरह बदलने पर मजबूर कर देता है।

सिर्फ कुत्तों की कहानी नहीं

यह अध्ययन केवल कुत्तों की कहानी नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कुत्ते जैसे अनुकूलनशील जानवर युद्ध से इतने प्रभावित हो रहे हैं, तो अन्य वन्यजीवों की स्थिति और भी गंभीर हो सकती है।ऑस्ट्रेलिया के वन्यजीव पारिस्थितिकीविद् इवान रिची कहते हैं कि यह अध्ययन अन्य प्रजातियों के लिए चेतावनी है, जो कम गतिशील हैं और जिनका आवास सीमित है।

युद्ध: एक पर्यावरणीय संकट

अंततः यह शोध याद दिलाता है कि युद्ध केवल मानवीय त्रासदी नहीं है। यह पर्यावरणीय आपदा भी है। जंगल, नदियां, मिट्टी, जानवर और पालतू जीव—सब इसकी कीमत चुकाते हैं।यूक्रेन के कुत्तों में आए ये बदलाव हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि युद्ध का असर गोलियों और बमों से कहीं आगे तक जाता है—उन तक, जिनकी आवाज़ नहीं सुनी जाती, लेकिन जिनकी पीड़ा उतनी ही गहरी होती है।


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