लोक सभा अध्यक्ष की कुर्सी पर विश्वास का संकट

–जयसिंह रावत
भारतीय संसदीय व्यवस्था में लोक सभा अध्यक्ष का पद केवल एक संवैधानिक पद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा और निष्पक्षता का प्रतीक माना जाता है। अध्यक्ष को परंपरागत रूप से सरकार और विपक्ष दोनों से ऊपर, सदन के संरक्षक और पंच परमेश्वर की भूमिका में देखा जाता है। ऐसे में जब किसी मौजूदा लोक सभा अध्यक्ष, विशेषकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस देता है, तो यह घटना सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया से कहीं आगे जाकर संसदीय व्यवस्था की आत्मा से जुड़े सवाल खड़े करती है।
अविश्वास प्रस्ताव का राजनीतिक संदर्भ
वर्तमान लोक सभा में विपक्ष का आरोप है कि अध्यक्ष के रूप में ओम बिरला ने सदन की कार्यवाही के संचालन में निष्पक्षता की संवैधानिक अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया। विपक्ष का कहना है कि प्रश्नकाल, स्थगन प्रस्ताव, चर्चा की अनुमति और विपक्षी सांसदों को बोलने का अवसर देने में दोहरा मापदंड अपनाया गया। सत्ता पक्ष इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे विपक्ष की राजनीतिक हताशा और संसदीय रणनीति का हिस्सा बता रहा है। लेकिन तथ्य यह है कि अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस अपने आप में एक असाधारण संसदीय कदम है, जिसे हल्के में नहीं लिया जा सकता।
लोक सभा अध्यक्ष को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था
लोक सभा अध्यक्ष को पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 94 और लोक सभा के प्रक्रिया एवं कार्य संचालन नियमों के अंतर्गत निर्धारित है। यह प्रक्रिया जानबूझकर जटिल और कठोर बनाई गई है ताकि इस पद की गरिमा और स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके। अध्यक्ष को हटाने के लिए सदन में कम से कम 14 दिन पहले लिखित नोटिस देना आवश्यक होता है। यह समय इसलिए दिया जाता है ताकि अध्यक्ष अपने ऊपर लगाए गए आरोपों का उत्तर देने की तैयारी कर सकें।
प्रस्ताव पेश होने से पहले की शर्तें
संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को सदन में पेश करने की अनुमति तभी मिलती है जब कम से कम 50 लोक सभा सदस्य उसके समर्थन में खड़े हों। यह शर्त यह सुनिश्चित करती है कि मामला व्यक्तिगत असहमति या क्षणिक राजनीतिक आवेश का नहीं, बल्कि पर्याप्त संख्या में सांसदों की साझा चिंता का विषय हो। ओम बिरला के मामले में विपक्ष ने दावा किया है कि उसने आवश्यक संख्या पूरी कर ली है, जिससे यह विषय औपचारिक रूप से संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा बन गया।
चर्चा के दौरान अध्यक्ष की भूमिका
जिस दिन अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा होती है, उस दिन वे पीठासीन अधिकारी के रूप में सदन की कार्यवाही का संचालन नहीं कर सकते। उनकी जगह उपाध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है। हालांकि अध्यक्ष सदन में एक सामान्य सदस्य की तरह उपस्थित रह सकते हैं और अपने ऊपर लगे आरोपों पर अपना पक्ष रख सकते हैं। उन्हें मतदान का अधिकार भी प्राप्त होता है, लेकिन वे निर्णायक मत का प्रयोग नहीं कर सकते। यह व्यवस्था इस बात का संकेत है कि संविधान अध्यक्ष को सुनवाई का पूरा अवसर देता है, लेकिन प्रक्रिया में किसी भी तरह का हितों का टकराव नहीं होने देता।
प्रभावी बहुमत की संवैधानिक बाधा
लोक सभा अध्यक्ष को हटाने के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता। इसके लिए प्रभावी बहुमत की आवश्यकता होती है, जिसका अर्थ है सदन के तत्कालीन कुल सदस्यों, रिक्त सीटों को घटाकर, उनके आधे से अधिक सदस्यों का समर्थन। मौजूदा लोक सभा में सत्ता पक्ष के संख्याबल को देखते हुए यह लगभग तय माना जा रहा है कि ओम बिरला के खिलाफ प्रस्ताव पारित नहीं हो पाएगा। यही कारण है कि इस पूरी प्रक्रिया को राजनीतिक गणित से अधिक राजनीतिक नैतिकता के संदर्भ में देखा जा रहा है।
भारतीय इतिहास में अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में अब तक ऐसा कोई उदाहरण नहीं है जब लोक सभा अध्यक्ष को पद से हटाया गया हो। लेकिन तीन ऐसे मौके जरूर आए हैं जब अध्यक्ष के खिलाफ औपचारिक रूप से अविश्वास प्रस्ताव या नोटिस लाया गया। 1954 में पहले लोक सभा अध्यक्ष जी.वी. मावलंकर के खिलाफ विपक्ष ने पक्षपात के आरोप लगाए थे, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कड़े विरोध के बाद प्रस्ताव भारी बहुमत से गिर गया। 1966 में तीसरी लोक सभा के अध्यक्ष सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ भी नोटिस दिया गया, जिसे चर्चा के बाद अस्वीकार कर दिया गया। 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के आरोपों को लेकर नोटिस लाया गया, लेकिन वह भी सत्ता पक्ष के संख्याबल और तकनीकी कारणों से विफल रहा।
इतिहास से मिलते संकेत
इन ऐतिहासिक उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि लोक सभा अध्यक्ष की कुर्सी संवैधानिक रूप से अत्यंत सुरक्षित है। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि हर ऐसा प्रस्ताव अध्यक्ष की भूमिका और निष्पक्षता को सार्वजनिक बहस के केंद्र में ले आता है। इतिहास भले ही यह बताए कि अध्यक्ष को हटाना लगभग असंभव है, लेकिन इतिहास यह भी दर्ज करता है कि किस दौर में अध्यक्ष पर पक्षपात के आरोप लगे और किस हद तक विपक्ष ने असंतोष व्यक्त किया।
ओम बिरला के लिए असली चुनौती क्या है
ओम बिरला के मामले में भी असली चुनौती प्रस्ताव के पारित या अस्वीकृत होने की नहीं है। असली चुनौती यह है कि लोक सभा अध्यक्ष के रूप में उनकी भूमिका को लेकर विपक्ष के मन में जो अविश्वास पैदा हुआ है, उसका समाधान कैसे होगा। लोकतंत्र केवल बहुमत से नहीं चलता, वह विश्वास से भी चलता है। यदि विपक्ष यह मानने लगे कि अध्यक्ष की कुर्सी सरकार का विस्तार बन गई है, तो यह स्थिति संसदीय व्यवस्था के लिए दीर्घकालिक रूप से नुकसानदेह हो सकती है।
लोकतंत्र में पंच परमेश्वर की अवधारणा
भारतीय संसदीय परंपरा में लोक सभा अध्यक्ष को पंच परमेश्वर की संज्ञा दी जाती रही है। इसका अर्थ यही है कि अध्यक्ष को न केवल निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि निष्पक्ष दिखना भी चाहिए। बहुमत का भरोसा जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी अल्पमत का विश्वास भी है। ओम बिरला के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव इसी विश्वास के संकट की ओर इशारा करता है।
संख्या से आगे विश्वास का प्रश्न
यह लगभग तय है कि ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष का अविश्वास प्रस्ताव संख्याबल के अभाव में पारित नहीं होगा। लेकिन यह प्रस्ताव भारतीय संसद के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में दर्ज हो जाएगा। यह आने वाले समय में यह सवाल छोड़ जाएगा कि क्या संसदीय लोकतंत्र में केवल संख्या पर्याप्त है या फिर संवैधानिक मर्यादा और विपक्ष का विश्वास भी उतना ही जरूरी है। लोक सभा अध्यक्ष की कुर्सी की असली मजबूती इसी सवाल के उत्तर में छिपी है।
( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कई शोध ग्रंथों के लेखक हैं। इस लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं, जिनसे एडमिन की सहमति जरूरी नहीं है – एडमिन।)
