भारत में एआई का युग और पर्यावरण संरक्षण
प्रमुख बिंदु
- इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट 2026, ग्लोबल साउथ में आयोजित होने वाला पहला वैश्विक एआई शिखर सम्मेलन है।
- यह शिखर सम्मेलन आधार पीपल, प्लैनेट और प्रोग्रेस (जन, पर्यावरण और प्रगति) के तीन स्तंभों पर आधारित हैं, जो समावेशी और न्यायसंगत विकास के लिए एआई की शक्ति को समर्पित हैं।
- एआई-आधारित समाधानों के माध्यम से इन लक्ष्यों को साकार किया जा रहा है, जिससे जीवन की सुरक्षा, पर्यावरण का संरक्षण और आपदाओं के विरुद्ध तैयारी मजबूत हो रही है।
- जमीनी स्तर पर, एआई-आधारित मौसम पूर्वानुमान अब लगभग सभी गाँवों तक पहुँच चुका है, ग्राम पंचायत-स्तरीय कवरेज के साथ, भारत फोरकास्टिंग सिस्टम (मई 2025) अब 6 किलोमीटर के हाई-रिज़ॉल्यूशन वाले सटीक पूर्वानुमान प्रदान करता है।
- एआई समुद्र के जलस्तर में वृद्धि की निगरानी और एडवांस्ड ड्वोरक तकनीक के माध्यम से चक्रवात के पूर्वानुमानों में सुधार करके जलवायु जोखिम प्रबंधन को सुदृढ़ कर रहा है।
-A PIB FEATURE-
जलवायु परिवर्तन आज एक गंभीर वास्तविकता है, जो हमारे जीवन और आजीविका के लगभग हर पहलू को प्रभावित कर रही है। जैसे-जैसे जलवायु जोखिम बढ़ रहे हैं, अडैप्टेशन और मिटिगेशन के लिए सक्रिय और दूरदर्शी समाधानों की आवश्यकता है। भारत ने इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है—चाहे वह ग्रीन कवर बढ़ाना हो, अक्षय ऊर्जा का दोहन हो, उत्सर्जन में कमी लाना हो या गंभीर मौसम की चुनौतियों से निपटना हो। हाल के वर्षों में, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध इस लड़ाई में एक शक्तिशाली टूल बनकर उभरा है। एआई कंप्यूटरों को डेटा से सीखने और मनुष्यों की तरह निर्णय लेने में सक्षम बनाता है। इसी के भीतर डीप लर्निंग एक ऐसी पद्धति है जो बड़ी मात्रा में सूचनाओं का विश्लेषण कर कंप्यूटर की सीखने की क्षमता को और बेहतर बनाती है। एआई प्रणालियाँ जलवायु से संबंधित डेटा का विश्लेषण करती हैं और बेहतर जलवायु मॉडलिंग, अक्षय ऊर्जा उत्पादन के अनुकूलन, सतत कृषि के समाधान और आपदा प्रबंधन की मजबूती के लिए प्रभावी उत्तर प्रदान करती हैं।
समावेशी विकास को गति देने में एआई की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचानते हुए, 16 से 20 फरवरी तक नई दिल्ली के भारत मंडपम में इंडिया-एआई इम्पैक्ट समिट 2026 का आयोजन किया जा रहा है। यह ग्लोबल साउथ में आयोजित होने वाला पहला वैश्विक एआई शिखर सम्मेलन है। पीपल, प्लैनेट और प्रोग्रेस (जन, पर्यावरण और प्रगति) के तीन आधारभूत स्तंभों पर टिका यह सम्मेलन शासन, नवाचार और सतत विकास के क्षेत्रों में एआई की परिवर्तनकारी क्षमता पर केंद्रित है।
एआई की मदद से आपदा की समय रहते चेतावनी और बचाव
उन्नत तकनीक मौसम के पैटर्न का पूर्वानुमान लगाने और प्राकृतिक आपदाओं की तैयारी करने के हमारे तरीके को नया रूप दे रही है।
मौसम पूर्वानुमान की जानकारी देने वाला सिस्टम: चक्रवात और गंभीर मौसम का अंदाज़ा लगाने की तकनीक का सटीक मॉडल
भारत ने एआई असिस्टेड टूल्स की मदद से चक्रवात की भविष्यवाणी करने की अपनी क्षमता को काफी बेहतर बना लिया है:
- भारतीय मौसम विभाग (आईएमडी) और अन्य सरकारी संस्थाएं समुद्री तूफान (चक्रवात) की ताकत का अंदाजा लगाने के लिए एडवांस्ड ड्वोरक तकनीक (एडीटी) का इस्तेमाल कर रही हैं।
चक्रवात की निगरानी
भारतीय मौसम विभाग समुद्री तूफानों (चक्रवातों) पर नजर रखने के लिए सैटेलाइट आधारित आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स का इस्तेमाल करता है। तूफान कितना ताकतवर है, इसका अंदाज़ा लगाने में एडवांस्ड ड्वोरक तकनीक मदद करती है। इसके साथ ही, आईएमडी मौसम की भविष्यवाणी करने वाले यूरोपीय केंद्र (यूरोपियन सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्टिंग) से मिलने वाले एआई बेस्ड गाइडेंस का भी उपयोग करता है। ये सभी आधुनिक तकनीकें यह बताने में मदद करती हैं कि चक्रवात कब बनेगा, किस दिशा में जाएगा और वह कितना शक्तिशाली होगा।
- पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने 22 पेटाफ्लॉप्स की भारी क्षमता वाले हाई-पावर कंप्यूटिंग सिस्टम (सुपरकंप्यूटर) लगाए हैं। इस सिस्टम का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा खास तौर पर एआई के कामों के लिए इस्तेमाल होता है। इसके अलावा, मौसम की भविष्यवाणी में एआई और मशीन लर्निंग रिसर्च के लिए अलग से ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट्स भी लगाए गए हैं। ये शक्तिशाली सिस्टम मौसम का और भी सटीक अनुमान लगाने वाले मॉडल तैयार करने में मदद करते हैं।
अनुसंधान और विकास के तहत

- भारतीय शोधकर्ताओं द्वारा विकसित ट्रांसफॉर्मर-आधारित न्यूरल नेटवर्क मानसून के व्यवहार की 18 दिन पहले ही भविष्यवाणी कर सकते हैं।
- दुनिया भर के एआई सिस्टम (जैसे GraphCast, PanguWeather, Aurora और FourCastNet) के तुलनात्मक अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि अब चक्रवात के जमीन से टकराने के 96 घंटे पहले ही उसके रास्ते का सटीक पता लगाया जा सकता है। यह तकनीक कुछ ही सेकंड्स में 200 किलोमीटर के दायरे तक की सटीक जानकारी दे देती है। इन सुधारों की वजह से लोगों को सुरक्षित निकालने की योजना बनाने और बिजली-पानी जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर को बचाने में बहुत मदद मिल रही है।
- आईआईटी बॉम्बे ने स्पेशली अवेयर डोमेन एडाप्टेशन नेटवर्क (SpADANet) नाम का एक एआई मॉडल विकसित किया है। यह मॉडल हवाई तस्वीरों के जरिए चक्रवात और तूफानों से हुए नुकसान का सटीक अंदाजा लगाता है। इस मॉडल ने पुराने तरीकों की तुलना में 5 प्रतिशत बेहतर सटीकता हासिल की है। यह मॉडल कम डेटा होने पर भी सही परिणाम दे सकता है। यह एनडीएमए जैसी आपदा प्रबंधन एजेंसियों की बड़ी समस्याओं, जैसे—डेटा की कमी और कम कंप्यूटर पावर—को हल करता है, जिससे आपदा के समय तेजी से और भरोसेमंद तरीके से मदद पहुंचाई जा सके।
- आईआईटी मद्रास भारत में जलवायु की सटीक भविष्यवाणी करने के लिए रिलायबिलिटी एनसेंबल एवरेजिंग (आरईए) तकनीक का इस्तेमाल कर रहा है। उन्होंने 26 अलग-अलग जलवायु मॉडलों को एक साथ मिलाया और हर मॉडल को इस आधार पर नंबर दिए कि वे वर्तमान और भविष्य के मौसम को कितनी सटीकता से बताते हैं। जब भारत के चार शहरों—कोयंबटूर, राजकोट, उदयपुर और सिलीगुड़ी—में इनका परीक्षण किया गया, तो पाया गया कि ज्यादातर मॉडल बारिश की सही भविष्यवाणी करने में पीछे रह गए। लेकिन, आरईए तकनीक बहुत ही भरोसेमंद नतीजे देती है, जिससे मानसून वाले इलाकों में भविष्य की योजनाओं को बेहतर बनाने में मदद मिलती है।
- भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम), पुणे में एक वर्चुअल सेंटर बनाया गया है, जो एआई आधारित एप्लिकेशन टूल्स विकसित करता है। भारतीय मौसम विभाग ने एआई और मशीन लर्निंग रिसर्च को मजबूत करने के लिए एक विशेष टीम तैयार की है। इसके साथ ही, आईएमडी ने एआई रिसर्च में सहयोग के लिए आईआईटी, एनआईटी, इसरो, डीआरडीओ और अन्य बड़े संस्थानों के साथ समझौते किए हैं। वैज्ञानिकों को वर्कशॉप और कोर्सेज के माध्यम से एआई की ट्रेनिंग दी जा रही है। आईएमडी हर साल मई के महीने में एआई और मशीन लर्निंग के बुनियादी सिद्धांतों पर एक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम भी आयोजित करता है।
भूस्खलन, बाढ़ और ग्लेशियर की निगरानी
खतरे की संभावना वाले संवेदनशील क्षेत्रों में एआई आधारित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां पहले से ही काम कर रही हैं:
- भारत में विकसित स्वदेशी एआई-आधारित भूस्खलन चेतावनी प्रणाली अब पहाड़ खिसकने से तीन घंटे पहले ही अलर्ट दे देती है। यह सिस्टम कम लागत वाले सेंसरों का उपयोग करता है जो मिट्टी की नमी, बारिश, नमी, तापमान और जमीन की हलचल को मापते हैं। यह सारा डेटा एक मशीन लर्निंग मॉडल को भेजा जाता है, जिसकी सटीकता 90 प्रतिशत से भी अधिक है। हिमाचल प्रदेश में 60 से अधिक स्थानों पर इसे लगाया गया है, जो जमीन में होने वाली मिलीमीटर जितनी छोटी हलचल को भी पहचान लेता है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामान से बना यह सिस्टम विदेशी तकनीक के मुकाबले बेहद सस्ता है और आपदा से निपटने में भारत की तैयारी को मजबूत करता है। इसकी मदद से भूस्खलन वाले इलाकों में समय रहते लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सकता है।
- इसरो द्वारा वित्तपोषित (2021-24) इंडियन लैंड डेटा एसिमिलेशन सिस्टम (आईएलडीएएस), रिमोट सेंसिंग और विशेष कंप्यूटर मॉडल्स की मदद से जमीन की स्थिति और बाढ़ के संभावित इलाकों का सटीक अनुमान लगाता है। गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसे क्षेत्रों में नदियों के बेहतर प्रबंधन के लिए भौतिक विज्ञान और एआई तकनीकों को मिलाकर बाढ़ की भविष्यवाणी करने वाले सिस्टम बनाए गए हैं। इसी क्रम में, BrahmaSATARK ब्रह्मपुत्र बेसिन के लिए बाढ़ का पूर्वानुमान देता है, जबकि GBM-CLIMPACT एक ऐसा टूलकिट है जो गंगा, ब्रह्मपुत्र और मेघना बेसिन में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों और जल क्षेत्र की तैयारी का आकलन करता है।
ये सभी एआई आधारित सिस्टम मिलकर खतरे की चेतावनी काफी समय पहले (लीड टाइम) देने में मदद करते हैं, जिससे लोगों को सुरक्षित निकालने की योजना बनाना आसान हो जाता है। इनकी मदद से इमारतों और बिजली-पानी जैसे बुनियादी ढांचे के नुकसान को कम किया जा सकता है और जलवायु परिवर्तन के प्रति संवेदनशील इलाकों में रहने वाले समुदायों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
अंतिम छोर तक जलवायु सूचना: समुदायों तक पहुँच
- भारतीय मौसम विभाग ने पंचायती राज मंत्रालय के सहयोग से ग्राम पंचायत स्तर मौसम पूर्वानुमान (जीपीएलडब्ल्यूएफ) सेवा शुरू की है। यह सेवा भारत की लगभग सभी ग्राम पंचायतों को कवर करती है। इसमें एक साथ कई मौसम पूर्वानुमान मॉडलों का उपयोग किया जाता है। किसान इन भविष्यवाणियों को ई-ग्राम स्वराज, मेरी पंचायत और मौसम ग्राम जैसे ऐप्स के माध्यम से देख सकते हैं। इन सूचनाओं में तापमान, बारिश, नमी, हवा और बादलों की स्थिति की जानकारी शामिल होती है। इससे किसानों को बुवाई, कटाई और सिंचाई से जुड़े बेहतर फैसले लेने में मदद मिलती है।
- भारत सरकार ने 27 मई, 2025 को भारत फोरकास्टिंग सिस्टम (BharatFS) लॉन्च किया है। यह पूरी तरह से भारत में विकसित मौसम पूर्वानुमान मॉडल है। यह गाँव के स्तर तक बहुत सटीक और विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। भारत-एफएस की रेज़ोल्यूशन क्षमता 6 किलोमीटर है, जो पिछले 12 किलोमीटर के मुकाबले कहीं बेहतर है। यह 10 दिन पहले ही बारिश की भविष्यवाणी कर सकता है। इससे किसानों, आपदा प्रबंधकों और आम जनता को मौसम के खतरों से निपटने और बेहतर तैयारी करने में बहुत मदद मिलती है।
जलवायु और मौसम की भविष्यवाणियों के लिए नए एआई टूल्स
- सरकार द्वारा मौसम जीपीटी (MausamGPT) नामक एक एआई चैटबॉट विकसित किया जा रहा है, जो किसानों और अन्य लोगों को जलवायु और मौसम के बारे में सलाह देगा। सरकार बारिश के पैटर्न का पूर्वानुमान लगाने और भविष्यवाणी करने के लिए एआई अनुसंधान कर रही है। एआई का उपयोग अब आग की घटनाओं, कोहरा, बिजली गिरने और गरज के साथ तूफान आने की भविष्यवाणी करने के लिए किया जा रहा है। डीप लर्निंग तकनीक मौसम में बारिश की सटीक भविष्यवाणियों को बेहतर बनाने में मदद करती है।

- एआई का उपयोग करके तटीय और समुद्र के स्तर की निगरानी भारत को जलवायु जोखिमों के लिए तैयार होने में मदद करती है। भारत की तटरेखाओं के साथ, एआई यह जाँच करता है कि बढ़ते समुद्री स्तर से कौन से क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं। यह जानकारी सिटी प्लानर्स को बेहतर शहर डिजाइन करने में मदद करती है, जो इन बदलावों को झेल सकें। इसके बाद समुदाय भविष्य के खतरों से बचने के लिए खुद को तैयार और सुरक्षित कर सकते हैं।
सटीक और विस्तृत जलवायु जानकारी तक सभी की पहुँच को आसान बनाकर, भारत सामुदायिक स्तर पर संकटों से लड़ने की क्षमता को मजबूत कर रहा है।
एआई-संचालित वन निगरानी और संरक्षण
- एआई उन्नत निगरानी और मॉनिटरिंग तकनीकों के माध्यम से भारतीय वनों की रक्षा करता है। यह वन क्षेत्रों के आसपास लगाए गए कैमरों से प्राप्त रियल-टाइम फुटेज का विश्लेषण करने के लिए मशीन विजन (एमवी) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग करता है।
- एआई जंगल की आग और उसका कारण बनने वाली मानवीय गतिविधियों के लिए एक मजबूत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली के रूप में कार्य करता है। यह आग को फैलने से पहले ही रोकने या नियंत्रित करने में मदद करता है, जो कि अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया भर में लगने वाली 75 प्रतिशत आग के लिए इंसान ही जिम्मेदार हैं।
- जंगल की सीमाओं पर लगाए गए एआई और मशीन विजन (एमवी) से लैस कैमरे उन जानवरों का पता लगा लेते हैं जो जंगल के बाहर भटक जाते हैं। यह मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने में मदद करता है, जो जंगल के इकोसिस्टम के लिए एक बड़ा खतरा है।
- एआई निगरानी तकनीकें संरक्षित वन क्षेत्रों में अवैध अतिक्रमण और पेड़ों की कटाई जैसी गतिविधियों का पता लगाती हैं।
सैटेलाइट, ड्रोन और जमीनी सेंसरों का एकीकृत नेटवर्क कंज़र्वेशन गवर्नेंस को मजबूत कर रहा है और प्राकृतिक कार्बन सिंक (जैसे जंगलों) को सुरक्षित रख रहा है।
वायु एवं जल जोखिम प्रबंधन हेतु एआई आधारित नवाचार
- रियल-टाइम एयर क्वालिटी मॉनिटरिंग:
आईआईटी कानपुर के AIRAWAT रिसर्च फाउंडेशन और आईआईटी दिल्ली ने मिलकर सस्टेनेबल शहरों के लिए एआई तकनीक विकसित करने का एक समझौता किया है। यह साझेदारी शहरों की बड़ी समस्याओं जैसे—वायु गुणवत्ता, बिजली, ट्रैफिक, कचरा प्रबंधन और डिजिटल सरकारी सेवाओं को सुधारने पर काम करेगी। इसमें खास तौर पर ऐसे स्मार्ट सेंसर बनाए जाएंगे जो हवा में प्रदूषण के साथ-साथ हानिकारक कीटाणुओं (बायोएरोसोल) की भी तुरंत पहचान कर सकें। इस तकनीक का उद्देश्य शहरों को स्मार्ट, स्वस्थ और सुरक्षित बनाना है, ताकि वे जलवायु परिवर्तन के खतरों का मजबूती से सामना कर सकें। विभिन्न शहरी डेटा स्रोतों को एकीकृत करके, एआई जलवायु-अनुकूल और पर्यावरण-अनुकूल शहर बनाने में योगदान देता है।
- भूजल और पेयजल सुरक्षा हेतु रिस्क मैपिंग
आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने भारत के पेयजल में आर्सेनिक प्रदूषण का पता लगाने के लिए एक एआई-आधारित प्रेडिक्शन मॉडल विकसित किया है। यह तकनीक गंगा के किनारों पर रहने वाले उन लाखों लोगों की समस्या का समाधान करती है जो इस संकट से प्रभावित हैं। पर्यावरण, भूविज्ञान और मानवीय उपयोग के डेटा पर एआई एल्गोरिदम का उपयोग करते हुए, टीम ने भूजल में आर्सेनिक के डिस्ट्रीब्यूशन और उससे होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों का पूर्वानुमान लगाया है। उन्होंने डेल्टा क्षेत्र में उच्च और निम्न आर्सेनिक वाले क्षेत्रों की पहचान की है। यह मॉडल दिखाता है कि ‘सरफिशियल एक्विटार्ड थिकनेस’ (सतह की वह परत जो पानी के बहाव को रोकती है) और ‘ग्राउंडवाटर-फेड इरिगेशन’ (भूजल आधारित सिंचाई) का क्षेत्रीय स्तर पर आर्सेनिक के खतरे से गहरा संबंध है। यह ढांचा पश्चिम बंगाल जैसे आर्सेनिक प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षित पेयजल स्रोतों की पहचान करने में मदद करता है और बेहतर भूजल स्रोतों के चयन को सक्षम बनाकर सरकार के जल जीवन मिशन को मजबूती प्रदान करता है।
एआई पर्यावरण संरक्षण के प्रति भारत के दृष्टिकोण को बदल रहा है, जो स्थायी विकास और स्वस्थ समुदायों के लिए मार्ग प्रशस्त कर रहा है।
भारत फोरकास्टिंग सिस्टम
भारत एआई-आधारित जलवायु समाधानों में एक वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में आगे बढ़ रहा है। देश ने संस्थागत नवाचार और मजबूत बहुपक्षीय साझेदारियां की हैं। भारत अब ग्राम-स्तर पर मौसम का पूर्वानुमान उपलब्ध करा रहा है, जो लगभग हर पंचायत तक पहुँचता है। स्वदेशी भारत फोरकास्टिंग सिस्टम 6 किमी के दायरे की सटीक भविष्यवाणी करता है। इसने पूरे देश में जलवायु से जुड़ी जानकारी को जन-जन के लिए सुलभ बना दिया है। भारत ने एआई इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया है, जिसमें 22 पेटाफ्लॉप्स (PetaFLOPS) की कंप्यूटिंग क्षमता शामिल है। ये निवेश नवाचार और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। भारत 2070 तक अपने नेट-जीरो उत्सर्जन लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। एआई-संचालित समाधान अक्षय ऊर्जा, पर्यावरण-अनुकूल खेती और आपदा पूर्वानुमान जैसे क्षेत्रों में मदद कर रहे हैं। ये केवल तकनीकी उपलब्धियां नहीं हैं, बल्कि जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए अनिवार्य उपकरण हैं। भारत यह साबित कर रहा है कि जलवायु परिवर्तन की लड़ाई में एआई एक शक्तिशाली हथियार हो सकता है, विशेष रूप से ग्लोबल साउथ के संवेदनशील समुदायों के लिए।
