कोर्ट के फैसले से बौखलाये ट्रम्प ने सारी दुनियाँ पर थोपा टैक्स
सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद ट्रंप का नया दांव, भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों की दिशा पर गहरा असर

-जयसिंह रावत-
अमेरिका की व्यापार नीति एक बार फिर वैश्विक बहस के केंद्र में है। शुक्रवार, 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की पुरानी ‘व्यापक टैरिफ नीति’ पर कानूनी रोक लगा दी। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि राष्ट्रपति “राष्ट्रीय आपातकाल” की आड़ में मनमाने ढंग से आयात कर या टैक्स नहीं लगा सकता। यह फैसला केवल ट्रंप की नीतियों पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि अमेरिकी लोकतांत्रिक व्यवस्था में राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमाएं भी तय करता है।
अदालत का फैसला और ट्रंप की तीखी प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ट्रंप खासे नाराज़ नजर आए। अगले ही दिन, 21 फरवरी को उन्होंने इसे “अमेरिका विरोधी फैसला” करार देते हुए कहा कि अदालत ने अमेरिकी उद्योगों और नौकरियों के हितों को नजरअंदाज किया है। लेकिन ट्रंप यहीं नहीं रुके। उन्होंने 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 122 का सहारा लेते हुए एक नया रास्ता निकाल लिया। इस धारा के तहत राष्ट्रपति को भुगतान संतुलन सुधारने के नाम पर 150 दिनों तक अधिकतम 15 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाने की अनुमति है।
शुरुआत में ट्रंप ने 10 प्रतिशत का फ्लैट टैरिफ लागू करने की घोषणा की, लेकिन कुछ ही घंटों में इसे बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया। इससे यह साफ हो गया कि सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक सीमाओं के बावजूद ट्रंप अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति को हर हाल में आगे बढ़ाना चाहते हैं।
भारत के लिए बदला हुआ परिदृश्य
इस घटनाक्रम का असर भारत पर भी पड़ा है, हालांकि यह असर सीधा नुकसान या सीधे फायदे की शक्ल में नहीं, बल्कि एक जटिल स्थिति के रूप में सामने आया है। ट्रंप और भारत के रिश्ते हमेशा व्यावहारिक और लेन-देन आधारित रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि नए फ्लैट टैरिफ ने भारत को अस्थायी राहत दी है। भारत-अमेरिका के बीच हाल में जिस व्यापार समझौते पर बातचीत चल रही थी, उसके तहत कुछ भारतीय उत्पादों पर 18 प्रतिशत तक शुल्क लगने की संभावना थी। अब 10 से 15 प्रतिशत के इस नए ढांचे के कारण कई भारतीय उत्पाद अमेरिकी बाजार में अपेक्षाकृत कम टैक्स के साथ पहुंच सकते हैं।
ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया है कि भारत के साथ उनकी व्यापार वार्ता अभी जारी है। उनका यह बयान कि “भारत के साथ हमारे रिश्ते शानदार हैं,” भारतीय नीति-निर्माताओं के लिए एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, भले ही इसके पीछे दबाव की राजनीति छिपी हो।
निर्यातकों की सबसे बड़ी चिंता: अनिश्चितता
हालांकि राहत के इस पहलू के साथ एक बड़ी समस्या भी जुड़ी है—अनिश्चितता। यह 15 प्रतिशत का टैरिफ केवल 150 दिनों के लिए है। इसके बाद क्या होगा, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है। कपड़ा उद्योग, आईटी सेवाएं, रत्न एवं आभूषण जैसे क्षेत्रों से जुड़े भारतीय निर्यातकों के लिए यह अस्थिरता दीर्घकालिक योजना बनाने में सबसे बड़ी बाधा है। व्यापार जगत मानता है कि नीति की अनिश्चितता अक्सर ऊंचे टैक्स से भी ज्यादा नुकसान पहुंचाती है।
भारत-अमेरिका व्यापार डील: दबाव और संभावनाएं
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब भारत और अमेरिका एक अंतरिम व्यापार समझौते के बेहद करीब बताए जा रहे थे। इस प्रस्तावित डील में भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल की खरीद सीमित करने और अमेरिकी उत्पादों पर आयात शुल्क घटाने जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं। अमेरिका लंबे समय से भारत पर दबाव बना रहा है कि वह रूस से ऊर्जा आयात कम करे और अमेरिकी एलएनजी व तकनीक का बड़ा खरीदार बने।
यदि भारत इस दबाव के आगे झुकने से इनकार करता है, तो ट्रंप 150 दिनों के बाद धारा 122 से आगे बढ़कर और सख्त प्रावधानों, जैसे धारा 301, का सहारा ले सकते हैं। इस धारा के तहत ‘अनुचित व्यापार प्रथाओं’ के नाम पर किसी भी देश के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
चीन के मुकाबले भारत को रणनीतिक बढ़त
इस पूरे परिदृश्य में भारत के लिए एक अवसर भी छिपा है। ट्रंप की मुख्य व्यापारिक जंग चीन के खिलाफ है। संकेत हैं कि चीन पर लगाए जाने वाले टैरिफ 60 प्रतिशत से भी ऊपर जा सकते हैं। ऐसे में भारत पर 15 प्रतिशत का शुल्क अमेरिकी बाजार में उसे चीन के मुकाबले अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकता है। ‘चीन प्लस वन’ रणनीति के तहत अमेरिकी और बहुराष्ट्रीय कंपनियां पहले से ही चीन के बाहर वैकल्पिक उत्पादन केंद्र तलाश रही हैं, और भारत उनके लिए एक प्रमुख विकल्प बनकर उभर सकता है।
कानूनी सीमाएं और नई चुनौतियां
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का एक अहम पहलू यह भी है कि अब किसी भी व्यापार समझौते को कानूनी कसौटी पर ज्यादा सख्ती से परखा जाएगा। ट्रंप की एकतरफा फैसले लेने की शक्ति पहले जैसी नहीं रही। ऐसे में भारत के वाणिज्य मंत्रालय के सामने चुनौती यह होगी कि वह ऐसी डील तैयार करे जो न केवल व्हाइट हाउस, बल्कि अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस में भी टिक सके।
संभलकर आगे बढ़ने का समय
कुल मिलाकर, भारत के लिए यह समय सतर्कता और रणनीतिक संतुलन का है। 15 प्रतिशत का वैश्विक टैरिफ एक झटका जरूर है, लेकिन चीन की तुलना में यह भारत को अमेरिकी बाजार में बेहतर स्थिति में खड़ा करता है। ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति भारत को दबाव में भी डालती है और अवसर भी देती है। अब यह भारत की नीति-दृष्टि पर निर्भर करेगा कि वह इस बदलते वैश्विक व्यापार परिदृश्य में खुद को एक मजबूत मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात केंद्र के रूप में किस तरह स्थापित करता है।
