ट्रंप की ईरान नीति से यूरोप दुविधा में
European politicians risk angering their voters if they join America’s war. Yet they could also face domestic upheaval if they take no action to reopen shipping routes that Iran has blocked and ease an energy crisis.
–जयसिंह रावत-
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को लेकर आक्रामक नीति ने यूरोप के सामने ऐसी कूटनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है, जिसमें कोई भी रास्ता पूरी तरह सुरक्षित नहीं दिखता। ट्रंप प्रशासन द्वारा अपनाई गई “मैक्सिमम प्रेशर” (अधिकतम दबाव) रणनीति ने न केवल ईरान पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ाया, बल्कि यूरोपीय देशों—ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी—को भी कठिन निर्णय लेने के लिए मजबूर कर दिया है।
मामले की जड़ 2015 में हुए ईरान परमाणु समझौते, जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन—जेसीपीओए में है, जिसे यूरोप ने क्षेत्रीय स्थिरता का आधार माना था। इस समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण स्वीकार किया था, जबकि बदले में उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में ढील दी गई थी।

हालांकि, 2018 में ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते से खुद को अलग कर लिया और ईरान के खिलाफ कठोर आर्थिक प्रतिबंध (इकोनॉमिक सैंक्शंस—आर्थिक प्रतिबंध) लागू कर दिए। अमेरिका ने अपने सहयोगियों पर भी दबाव बनाया कि वे ईरान के साथ व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध सीमित करें।
यहीं से यूरोप के लिए संकट शुरू हुआ। एक ओर, यूरोपीय देश अमेरिका के साथ अपने पारंपरिक और सामरिक संबंधों को बनाए रखना चाहते हैं, जो नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) जैसे रक्षा ढांचे के माध्यम से और मजबूत होते हैं। दूसरी ओर, वे ईरान के साथ संवाद बनाए रखकर क्षेत्रीय शांति और परमाणु समझौते को बचाना भी चाहते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यूरोप अमेरिका का पूरा समर्थन करता है, तो उसे जेसीपीओए से पीछे हटना पड़ेगा, जिससे उसकी कूटनीतिक विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचेगा और ईरान के साथ तनाव और बढ़ेगा। वहीं, यदि वह अमेरिका के दबाव का विरोध करता है, तो उसे अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है, जो उसकी अर्थव्यवस्था और कंपनियों के लिए भारी पड़ सकता है।
यूरोपीय कंपनियों पर इसका सीधा असर पड़ा है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ईरान में निवेश किया था, लेकिन अमेरिकी वित्तीय प्रतिबंधों के डर से उन्हें अपने प्रोजेक्ट रोकने पड़े। अमेरिका की वैश्विक वित्तीय व्यवस्था पर मजबूत पकड़ के कारण यूरोप के पास विकल्प सीमित हो गए हैं।
इस बीच, यूरोप ने एक संतुलित रास्ता अपनाने की कोशिश की है। उसने परमाणु समझौते को बनाए रखने के लिए वैकल्पिक वित्तीय तंत्र (अल्टरनेटिव फाइनेंशियल मैकेनिज्म—वैकल्पिक वित्तीय व्यवस्था) विकसित करने की पहल की, ताकि ईरान के साथ सीमित व्यापार जारी रखा जा सके। हालांकि, यह प्रयास अपेक्षित सफलता नहीं हासिल कर सका।
मध्य-पूर्व की अस्थिरता भी यूरोप के लिए चिंता का बड़ा कारण है। ईरान के साथ किसी भी संभावित संघर्ष का असर तेल की कीमतों, शरणार्थी संकट और सुरक्षा चुनौतियों के रूप में सीधे यूरोप पर पड़ सकता है। यही वजह है कि यूरोपीय देश सैन्य टकराव से बचने और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देने के पक्षधर हैं।
ट्रंप की नीतियों ने इस पूरे मुद्दे को और जटिल बना दिया है। कई बार अमेरिका ने अपने फैसले बिना सहयोगियों से व्यापक चर्चा किए लिए, जिससे यूरोप में असंतोष भी देखने को मिला। फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने “स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी” (रणनीतिक स्वायत्तता) की आवश्यकता पर जोर दिया है, लेकिन इसे व्यवहार में लागू करना अभी भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह स्थिति केवल ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिका और यूरोप के बीच बदलते रिश्तों का संकेत भी देती है। वैश्विक राजनीति के बदलते परिदृश्य में यूरोप अब अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन आर्थिक और सैन्य स्तर पर उसकी अमेरिका पर निर्भरता अभी भी बनी हुई है।
कुल मिलाकर, ट्रंप की ईरान नीति ने यूरोप को एक ऐसी कूटनीतिक दुविधा में डाल दिया है, जहां हर विकल्प अपने साथ जोखिम लेकर आता है। यह घटनाक्रम न केवल मध्य-पूर्व की राजनीति को प्रभावित कर रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के भविष्य को भी नई दिशा दे रहा है।
यूरोप के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखते हुए संतुलित और स्वतंत्र कूटनीति विकसित करे। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वह इस “दोहरी दुविधा” से कैसे बाहर निकलता है और वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को कैसे परिभाषित करता है।
