राकेट साइंस से दौर में भी गटर में हो रही मौतें: बेजवाड़ा

– उत्तराखंड इंसानियत मंच द्वारा गरिमा, सम्मान और भारत का संविधान का संविधान कार्यक्रम का आयोजन
देहरादून, 12 अप्रैल।हम अंतरिक्ष में पहुंच चुके हैं। चांद पर, मंगल पर और शुक्र पर जाने तक की बातें हो रही है, लेकिन रॉकेट साइंस के इस दौर में भी हम एक ऐसा यंत्र नहीं बना पाये हैं जिससे गटर में उतरे लोगों की जान बचाई जा सके। सरकार के तमाम दावों के बावजूद आज भी देश के कई राज्यों में हाथ से मैला उठाने की प्रथा बंद नहीं हुई है। सरकार के पास इस काम में लगे लोगों का आंकड़ा तक नहीं है। इस मामले में समाज और न्याय पालिका से भी अपेक्षित मदद नहीं मिली है।
यह बात रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित, सफाई कर्मचारी आंदोलन के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक बेजवाड़ा विल्सन ने कही। वे प्रेस क्लब में उत्तराखंड इंसानियत मंच की ओर से भारत रत्न डॉ. बीआर अंबेडकर की 135वीं जयंती की उपलक्ष्य में आयोजित गरिमा, सम्मान और भारत का संविधान कार्यक्रम में बोल रहे थे।
उन्होंने कहा कि हमने कई कुर्बानियों के बाद आजादी हासिल की। हमने अपना संविधान बनाया। संविधान में समानता और गरिमा की बात कही गई, लेकिन आज तक समानता नहीं मिली। नागरिकों की गरिमा की स्थिति ये है कि आज भी एक जाति विशेष के लोग हाथ से मैला उठा रहे हैं और गटर में उतरने को मजबूर हैं। सीवर के इन गटरों में लगातार मौतें हो रही हैं, लेकिन सरकार इस बात को मान नहीं रही है।
उन्होंने कहा कि इस मामले में समाज से तो सहयोग नहीं मिला, लेकिन न्याय पालिका ने भी कई बार निराश किया। एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि हाथ से मैला उठाने के मामले उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की तो सुप्रीम कोर्ट ने उनसे ही आंकड़े देने का कह दिया। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा की समाज अभी जीवित है। इस लड़ाई को लड़ने के लिए लोगों ने 82 लाख रुपये एकत्रित किये। उन्होंने कहा कि देश के कई राज्यों में हाथ से मैला उठाने के कुप्रथा आज भी जारी है। उन्होंने कहा दलित समुदाय से उनका नाम तक छीना गया। उनकी मां की आज तक कोई नाम नहीं है।
दलित चिंतक और स्वतंत्र स्तंभकार आरपी विशाल ने दलित, सामाजिक न्याय और भारतीय संविधान विषय पर अपनी बात रखते हुए उत्तराखंड में जातीय भेदभाव में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में एकता और सद्भाव की उम्मीद सिर्फ दलितों से की जाती है, लेकिन वास्तविकता ये है कि वे आज भी मंदिरों में प्रवेश नहीं कर सकते। आज में दलितों और सवर्णों के पानी के स्रोत अलग होते हैं। अंकिता की हत्या के लिए तो बड़े बड़े आंदोलन होते हैं, लेकिन चकराता में जब एक शिक्षक एक दलित किशोरी का रेप करता है तो उसी किशोरी को चरित्रहीन कहकर बदनाम करने का प्रयास किया जाता है।
इससे पहले उत्तराखंड इंसानियत मंच के डॉ. रवि चोेपड़ा ने बेजवाड़ा विल्सन का परिचय दिया और कहा कि अपने माता-पिता से हाथ से मैला उठाने के अमानवीय कार्य करवाये जाने से क्षुब्ध होकर उन्होंने 18 वर्ष की आयु में ही हाथ से मैला उठाने वाले लोगों के लिए काम करना शुरू कर दिया था। वे आज तक लगातार समाज में और न्यायालयों में ये लड़ाई लड़ रहे हैं। विमला कोली ने आरपी विशाल का परिचय देते हुए उन्हें उत्तराखंड में दलित समुदाय की एक मजबूत आवाज बताया। उत्तराखंड महिला मंच की कमला पंत ने अपने अध्यक्षीय भाषण में उत्तराखंड में धार्मिक और जातीय भेदभाव मिटाने के लिए एकजुट होने की अपील की। कार्यक्रम की शुरूआत सतीश धौलाखंडी और त्रिलोचन भट्ट ने साहिर लुधियानवी के गीत ये दुनिया दो रंगी है से की। संचालन चंद्रकला ने किया।
इस मौके पर सफाई कर्मचारी आयोग के उपाध्यक्ष भगवत प्रसाद मकवाना, आयोग के राष्ट्रीय महासचिव भारत भूषण, पूर्व आईपीएस विभा पुरी दास, एसएस पांगती, निर्मला बिष्ट, हरिओम पाली, परमजीत सिंह कक्कड़, नन्द नन्दन पांडेय, गीता गैरोला, दीपा कौशलम, मुकेश बहुगुणा, प्रकाश थपलियाल, ईश्वर पाल शर्मा, गंगाधर नौटियाल, अरविन्द शेखर, नाजमा सुल्ताना, राजेश सकलानी, अशोक कटारिया, तबस्सुम, डॉ. जितेन्द्र भारती सहित कई लोग मौजूद थे।
