पर्यावरण

हिमालय की जैव विविधता बेहद समृद्ध, मानव  सभ्यता की खातिर संरक्षण अनिवार्य

तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर की ओर से विकसित भारत 2047 के तहत सतत विकास लक्ष्यों- एसडीजीएस पर दो दिनी नेशनल कॉन्फ्रेंस का शंखनाद

ख़ास बातें :
  • प्राकृतिक खेती धरतीपुत्रों के स्वर्णिम भविष्य के लिए जरूरीः प्रो. मंजुला 
  • विकसित भारत- 2047 के सपने के प्रति टीएमयू संजीदाः प्रो. पीके जैन 
  • एग्रीकल्चर को समस्या का हिस्सा नहीं, बल्कि समाधान का हिस्सा बनाएं
  • सततता को सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन शैली में अपनाएंः डॉ. गणेश दत्त 
  • नेशनल कॉन्फ्रेंस में अतिथियों ने कॉन्फ्रेंस प्रोसिडिंग का किया विमोचन  

 

मुरादाबाद, 27अप्रैल  । हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल यूनिवर्सिटी, उत्तराखंड के पूर्व कुलपति एवम् जाने-माने पर्यावरणविद प्रो. एसपी सिंह ने हिमालय को थर्ड पोल की संज्ञा देते हुए कहा, हिमालय केवल भारत ही नहीं, बल्कि चीन, म्यांमार और अन्य एशियाई देशों के लिए भी जल, जैव विविधता और जलवायु संतुलन का प्रमुख स्रोत है। हिमालय से निकलने वाली नदियां करोड़ों लोगों के जीवन, कृषि, पेयजल और उद्योगों को सहारा देती हैं, क्योंकि यहां ध्रुवीय क्षेत्रों के बाद सबसे अधिक बर्फ और हिम भंडार है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा, हिमालयी क्षेत्र में बर्फ पिघलना और जलवायु परिवर्तन गंभीर खतरे की घंटी है। यदि यह प्रक्रिया इसी तरह बढ़ती रही, तो सिंधु, गंगा, ब्रह्मपुत्र जैसी नदी प्रणालियों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा, जिससे कृषि, जल सुरक्षा और पर्यावरणीय स्थिरता संकट में पड़ सकती है।
उन्होंने कहा कि हिमालय की जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है और इसका संरक्षण मानव सभ्यता के भविष्य के लिए अनिवार्य है। उन्होंने नदी सर्वेक्षण, कृषि उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन और सतत संसाधन उपयोग को भी महत्वपूर्ण बताया। कृषि क्षेत्र को समस्या का हिस्सा नहीं, बल्कि समाधान का हिस्सा बनना होगा। इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण, पर्यावरणीय चेतना और सामुदायिक सहभागिता आवश्यक है। प्रो. सिंह तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर की ओर से विकसित भारत 2047 के तहत सतत विकास लक्ष्यों- एसडीजीएस पर दो दिनी नेशनल कॉन्फ्रेंस के शुभारम्भ मौके पर बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
इससे पूर्व मुख्य अतिथि प्रो. एसपी सिंह, राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की के वैज्ञानिक-ई डॉ. गोपाल कृष्ण, जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, अल्मोड़ा के वैज्ञानिक-ई डॉ. केएस कानवाल, टीएमयू की डीन एकेडमिक्स प्रो. मंजुला जैन, एग्रीकल्चर कॉलेज के डीन प्रो. प्रवीन कुमार जैन आदि ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित करके नेशनल कॉन्फ्रेंस का शंखनाद किया। अतिथियों ने कॉन्फ्रेंस प्रोसिडिंग का विमोचन भी किया। कॉन्फ्रेंस सचिव प्रो. गणेश दत्त भट्ट और प्रो. महेश कुमार की उल्लेखनीय मौजूदगी रही। संचालन असिस्टेंट डीन एकेडमिक्स डॉ. नेहा आनंद ने किया।
पर्यावरणविद प्रो. सिंह ने सतत विकास और हिमालयी अध्ययन के महत्व पर विस्तार से चर्चा करते हुए कहा, आज कृषि, पर्यावरण और जल संसाधनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलित विकास की है। सतत विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि प्रकृति, संसाधनों और आने वाली पीढ़ियों के हितों को ध्यान में रखकर विकास करना है। उन्होंने कहा कि भारत की कृषि में जल संकट, मृदा क्षरण, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और कृषि अपशिष्ट का सही प्रबंधन न होना सबसे बड़ी बाधा है, इसलिए अब कृषि को अधिक टिकाऊ, पर्यावरण अनुकूल और संसाधन संरक्षण आधारित बनाना आवश्यक है।
उन्होंने कार्बन जस्टिस की अवधारणा पर भी बल दिया, जिसका आशय है, विकास और उत्सर्जन का भार सभी पर समान रूप से पड़े और पर्यावरणीय न्याय सुनिश्चित किया जाए। सतत विकास, जल संरक्षण, जैव विविधता सुरक्षा और जलवायु न्याय के बिना विकास अधूरा है। डीन एकेडमिक्स प्रो. मंजुला जैन ने इंस्टिट्यूशंस इन्नोवेशन काउंसिल- आईआईसी की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा, इस काउंसिल में नवाचार, उद्यमिता और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करने का एक सशक्त मंच है, जो उन्हें भविष्य के कृषि नवप्रवर्तक बनने के लिए प्रेरित करता है। उन्होंने इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स 2023 के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा, भारत ने मिलेट्स को बढ़ावा देने में वैश्विक नेतृत्व स्थापित किया है। मिलेट्स जलवायु परिवर्तन के दौर में एक सशक्त, पोषणयुक्त एवं टिकाऊ फसल विकल्प हैं, जो खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने एसडीजीएस का उल्लेख करते हुए बताया, सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में कृषि की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने प्राकृतिक खेती, संसाधन संरक्षण और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने पर बल दिया, जिससे लाइफ ऑन लैंड जैसे लक्ष्यों को प्रभावी रूप से प्राप्त किया जा सके।
प्रो. जैन ने कहा, टीएमयू सरीखे संस्थान नवाचार, शोध और सतत कृषि के माध्यम से राष्ट्रीय एवम् वैश्विक लक्ष्यों की प्राप्ति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं। एग्रीकल्चर कॉलेज के डीन प्रो. प्रवीन कुमार जैन ने कहा, यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के विकसित भारत 2047 के सपने के प्रति टीएमयू संजीदा है। वर्मी कम्पोस्ट इकाई, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट- एसटीपी एवम् इफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट- ईटीपी जैसी व्यवस्थाएं प्रभावी रूप से संचालित हैं। उन्होंने कहा, कृषि को अधिक उत्पादक, पर्यावरण-अनुकूल और भविष्य-उन्मुख बनाने के लिए प्राकृतिक खेती, मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, जल संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के संग-संग जैव विविधता संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा। कॉन्फ्रेंस सचिव प्रो. गणेश दत्त भट्ट ने कहा, यह नेशनल कॉन्फ्रेंस केवल एक अकादमिक आयोजन नहीं, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों को व्यवहार में उतारने की दिशा में एक सार्थक प्रयास है। उन्होंने कहा कि आज के समय में कृषि, पर्यावरण और समाज एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं, और सततता को केवल एक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन शैली के रूप में अपनाना होगा।
नेशनल कॉन्फ्रेंस में डॉ. आशुतोष अवस्थी, डॉ. देवेन्द्र पाल सिंह, डॉ. चारु बिष्ट, डॉ. अमित कुमार मौर्या, डॉ. शबनम ठाकुर, डॉ. शाकुली सक्सेना, डॉ. उपासना, डॉ. नेहा, डॉ. प्रिंस साहू, डॉ. निमित कुमार, डॉ. ब्रजपाल रजाबत, डॉ. आयुष मिश्रा, डॉ. सुषमा सिंह, डॉ. जेम्स सिंह, डॉ. इशिता, डॉ. अनुप्रिया, डॉ. अनिल कुमार सिंह के संग-संग बीएससी और एमएससी एग्रीकल्चर के स्टुडेंट्स मौजूद रहे।

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