ब्लॉगशिक्षा/साहित्य

दो महाकवियों का अद्भुत संयोग – रवीन्द्र और निराला

-गोविन्द प्रसाद बहुगुणा-
विद्यार्थीकाल से ही मेरा गहरा लगाव इन दो दो महाकवियों के प्रति बड़ा गहरा रहा है इसका प्रमुख कारण उस समय के जो हमारे अध्यापक थे, वही इसके सूत्रधार थे -रुद्रपरायग में पढ़ते समय हमारे प्रधानाचार्य श्री हीराबल्लभ थपलियाल जी स्कूल की सामूहिक प्रार्थना ( Assembly Prayer ) में गुरुदेव रबीन्द्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि से दो गीतों का पाठ alternatively प्रतिदिन करवाते थे जीत की पहली पंक्ति वे बोलते थे फिर उसी को हम दोहराते थे –
Life of my life, I shall ever try
to keep my body pure, knowing that thy living touch
is upon all my limbs.
I shall ever try to keep all untruths out from my thoughts,
knowing that thou art that truth which has kindled
the light of reason in my mind…….
फिर दूसरे दिन यह प्रार्थना होती थी –
Where the mind is without fear and the head is held high
Where knowledge is free
Where the world has not been broken up into fragments
By narrow domestic walls
Where words come out from the depth of truth
Where tireless striving stretches its arms towards perfection……..
Into that heaven of freedom, my Father, let my country awake.”
संयोग देखिए कि मेरे दूसरे प्रिय कवि
सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ का जन्म भी बंगाल की महिषादल रिहासत जिला मेदनीपुर में हुआ था , हालांकि उनके जीवन का उत्तरार्द्ध इलाहाबाद में बीता । वहीं दारागंज मुहल्ले में स्थित रायसाहब की विशाल कोठी के ठीक पीछे बने एक कमरे में १५ अक्टूबर १९६१ को उनका निधन हुआ। इलाहाबाद में महादेवी वर्मा से उनका जीवन पर्यन्त गहरा भाईचारा (भाई बहिन वाला रिश्ता)रहा महादेवी जी से रक्षाबंधन के दिन हमेशा राखी बंधवाने आते थे और उन्हीं से महादेवी जी को दक्षिणा देने के लिए पैसा उधार मांगते थे । ऐसे फक्कड़ मिजाज कवि थे वह ।उनकी यह इस कविता का पाठ हम स्कूल में स्वतंत्रता दिवस पर जरुर करते थे
“वर दे, वीणावादिनी वर दे!
प्रिय स्वतंत्र-रव अमृत-मंत्र नव
भारत में भर दे!
वर दे, वीणावादिनी वर दे।
काट अंध-उर के बंधन-स्तर
बहा जननि, ज्योतिर्मय निर्झर
कलुष-भेद-तम हर प्रकाश भर
जगमग जग कर दे!
वर दे, वीणावादिनी वर दे।
नव गति, नव लय, ताल-छंद नव
नवल कंठ, नव जलद-मंद रव;
नव नभ के नव विहग-वृंद को
नव पर, नव स्वर दे!
वर दे, वीणावादिनी वर दे।..”
कोलकाता प्रवास के समय जिस दिन मैं भाई के साथ शांति निकेतन की यात्रा पर जा रहा था, मेरे दिमाग में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर और निराला जी के चेहरे ही घूम रहे थे। ऐसा अनुभव मुझे पहले किसी तीर्थ यात्रा में भी नहीं हुआ था।
निराला जी ने कोलकाता से प्रकाशित ‘समन्वय’ का संपादन किया था उनकापहला निबंध ‘बंग भाषा का उच्चारण’ अक्टूबर १९२० में मासिक पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित हुआ था।….   

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