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मनोरोग दवाओं के अत्यधिक उपयोग और सुरक्षित वापसी की बढ़ती आवश्यकता

With Health Secretary Robert F. Kennedy Jr. aiming to rein in the use of psychiatric drugs, psychiatrists are preemptively addressing how and when patients should quit taking them.

 

वर्तमान समय में मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व बहस छिड़ गई है, जिसका केंद्र बिंदु मनोरोग दवाओं (Psychiatric drugs) का बढ़ता उपयोग और उन्हें सुरक्षित रूप से बंद करने की प्रक्रिया है। हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका के स्वास्थ्य सचिव रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर द्वारा मनोरोग दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल पर नियंत्रण करने की मंशा जाहिर करने के बाद चिकित्सा जगत में इस विषय पर हलचल तेज हो गई है। विशेषज्ञ अब इस बात पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं कि मरीजों को इन दवाओं के चंगुल से कैसे निकाला जाए, क्योंकि अक्सर चिकित्सकों द्वारा मरीजों को ऐसी दवाओं पर छोड़ दिया जाता है जो समय के साथ अपनी प्रभावशीलता खो चुकी होती हैं या जिनकी अब आवश्यकता ही नहीं रह गई है। इसे चिकित्सा की भाषा में ‘पार्किंग’ कहा जाता है, जहाँ मरीज वर्षों तक एक ही दवा पर बना रहता है।

डिप्रिस्क्राइबिंग का उभरता हुआ सिद्धांत

मनोरोग चिकित्सा में ‘डिप्रिस्क्राइबिंग’ (Deprescribing) शब्द एक नई उम्मीद बनकर उभरा है। इसका अर्थ केवल दवा बंद करना नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और चिकित्सकीय देखरेख में दवाओं को कम करने की प्रक्रिया है। विशेषज्ञों का एक बड़ा समूह, जिसमें लगभग 45 प्रमुख मनोचिकित्सक शामिल हैं, इस बात पर सहमत हुआ है कि अब समय आ गया है जब डॉक्टरों को दवा शुरू करने के साथ-साथ उसे बंद करने के ‘लॉजिकल एंडपॉइंट’ यानी तार्किक समापन पर भी ध्यान देना चाहिए। वर्तमान में चिकित्सा प्रशिक्षण की एक बड़ी खामी यह है कि रेजिडेंट डॉक्टरों को दवाएं लिखने का प्रशिक्षण तो विस्तार से दिया जाता है, लेकिन उन्हें यह नहीं सिखाया जाता कि इन दवाओं को कब और कैसे बंद करना है। इसी कमी के कारण ‘पैसिव री-प्रिस्क्राइबिंग’ की समस्या बढ़ी है, जिसमें बिना किसी ठोस समीक्षा के मरीज को वही पुरानी दवा बार-बार लिख दी जाती है।

बढ़ता उपयोग और सामाजिक चिंताएं

आंकड़ों पर गौर करें तो मनोरोग दवाओं का उपयोग पिछले कुछ दशकों में तेजी से बढ़ा है। वर्ष 1988 में प्रोज़ैक (Prozac) जैसी दवाओं के आने के बाद से यह चलन बढ़ा और वर्ष 2026 तक के अनुमानों के अनुसार, अमेरिका जैसे विकसित देशों में हर छह में से एक वयस्क डिप्रेशन की दवा यानी एस.एस.आर.आई. (SSRI) का सेवन कर रहा है। जैसे-जैसे इन दवाओं का उपयोग बढ़ा, वैसे-वैसे इनके दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव भी सामने आने लगे। मरीजों ने न केवल यौन इच्छा में कमी जैसी समस्याओं की शिकायत की, बल्कि दवाओं को छोड़ने के दौरान होने वाले अत्यंत कष्टदायक ‘विड्रॉल सिम्पटम्स’ (Withdrawal symptoms) के बारे में भी चिंता व्यक्त की। कई बार मरीजों को अपने डॉक्टरों से इस विड्रॉल को संभालने में मदद नहीं मिली, जिसके कारण सोशल मीडिया पर मरीजों के स्व-सहायता समूह बनने लगे, जो एक-दूसरे को दवा छोड़ने की सलाह देने लगे।

विड्रॉल की जटिलता और वैज्ञानिक चुनौतियां

दवाओं को बंद करना कोई सरल प्रक्रिया नहीं है और इसमें कई वैज्ञानिक पेचदगियां शामिल हैं। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि लंबी अवधि तक काम करने वाली दवाएं खुद-ब-खुद शरीर से बाहर निकल जाती हैं और उन्हें धीरे-धीरे कम करने की आवश्यकता नहीं होती, जबकि मरीज समूहों का मानना है कि विड्रॉल के लक्षण इतने गंभीर हो सकते हैं कि वे हेरोइन जैसे नशीले पदार्थों को छोड़ने से भी अधिक कठिन महसूस होते हैं। यहाँ एक बड़ी चुनौती फार्मास्युटिकल कंपनियों की ओर से भी आती है। दवा कंपनियां आमतौर पर इस बात पर शोध नहीं करतीं कि उनके उत्पादों को कब बंद किया जाना चाहिए, क्योंकि उनका व्यावसायिक हित दवा की निरंतर बिक्री में होता है। इसके परिणामस्वरूप, ऐसे रैंडमाइज्ड ट्रायल की कमी है जो यह बता सकें कि एक निश्चित अवधि के बाद दवाओं के फायदे कम होने लगते हैं।

मध्यम मार्ग की तलाश और पेशेवर जिम्मेदारी

मनोचिकित्सा जगत अब एक मध्यम मार्ग अपनाने की कोशिश कर रहा है जो न तो दवाओं को पूरी तरह खारिज करता है और न ही उनके अंधाधुंध उपयोग का समर्थन करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दवाओं ने लाखों लोगों को सामान्य जीवन जीने, स्कूल जाने और काम करने में मदद की है, और इनका अचानक विरोध खतरनाक हो सकता है। कुछ बीमारियाँ ऐसी हैं, जैसे बाइपोलर-1 या गंभीर बार-बार होने वाला डिप्रेशन, जहाँ दवाओं को मधुमेह या उच्च रक्तचाप की तरह अनिश्चित काल के लिए जारी रखना आवश्यक हो सकता है। यहाँ ‘पर्सिमनी’ (Parsimony) का सिद्धांत महत्वपूर्ण हो जाता है, जिसका अर्थ है कम से कम आवश्यक दवाओं का उपयोग करना। डॉक्टर अब इस बात पर जोर दे रहे हैं कि चार या पांच दवाओं के कॉम्बिनेशन के बजाय केवल उन दवाओं को रखा जाए जो वास्तव में मरीज की मदद कर रही हैं।

भविष्य की राह और क्लिनिकल बदलाव

डिप्रिस्क्राइबिंग को मुख्यधारा के चिकित्सा अभ्यास का हिस्सा बनाने के लिए कई प्रयास किए जा रहे हैं। इसमें नए इंश्योरेंस कोड बनाना शामिल है ताकि डॉक्टरों को मरीजों की दवाओं को कम करने में लगने वाले समय के लिए उचित भुगतान मिल सके, क्योंकि दवा हटाना दवा लिखने की तुलना में कहीं अधिक समय लेने वाला और चुनौतीपूर्ण कार्य है। वर्जीनिया विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में इसके लिए प्रायोगिक क्लिनिक शुरू किए गए हैं, जहाँ भारी मांग देखी गई है। यह इस बात का संकेत है कि मरीज अब केवल लक्षणों को दबाना नहीं चाहते, बल्कि वे अपनी मानसिक सेहत को दवाओं के बिना संभालने की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। अंततः, यह एक ‘कला’ की तरह है जिसमें विज्ञान और सहानुभूति का मेल आवश्यक है, ताकि मरीज सुरक्षित और स्वस्थ महसूस करते हुए दवाओं के बोझ से मुक्त हो सके।

 

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