कुदम से ईवीएम तक : एक हजार वर्ष पुरानी लोकतांत्रिक परंपरा की अद्भुत कहानी
तमिलनाडु के शिलालेख बताते हैं कि भारत में गांव स्तर पर लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी थीं
भारत को अक्सर “विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र” कहा जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप में लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ें हजारों वर्ष पुरानी हैं। आज जब करोड़ों लोग इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) के माध्यम से मतदान करते हैं, तब दक्षिण भारत के तमिलनाडु से प्राप्त प्राचीन शिलालेख यह बताते हैं कि लगभग एक हजार वर्ष पहले भी गांवों में संगठित चुनाव कराए जाते थे।
तमिलनाडु के कांचीपुरम जिले के उत्तरामेरूर (Uthiramerur) तथा तिरुनेलवेली जिले के मनूर (Manur) में मिले शिलालेख भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास के अनमोल दस्तावेज हैं। ये प्रमाणित करते हैं कि चोल और पांड्य शासनकाल में स्थानीय स्वशासन की एक सुव्यवस्थित प्रणाली अस्तित्व में थी।
उत्तरामेरूर का अनोखा चुनाव मॉडल
लगभग 920 ईस्वी के चोलकालीन शिलालेखों में उत्तरामेरूर गांव की चुनाव प्रणाली का विस्तृत उल्लेख मिलता है। गांव को 30 “कुदम्बु” यानी वार्डों में विभाजित किया गया था। प्रत्येक वार्ड अपने प्रतिनिधि के लिए उम्मीदवार नामित करता था।
सबसे रोचक बात यह थी कि चुनाव की प्रक्रिया आधुनिक मतदान जैसी नहीं थी, बल्कि “कुदम प्रणाली” पर आधारित थी। “कुदम” तमिल भाषा में मिट्टी के घड़े या पात्र को कहा जाता है। उम्मीदवारों के नाम ताड़पत्रों पर लिखकर उस घड़े में डाले जाते थे और फिर एक बालक द्वारा उनमें से पर्ची निकाली जाती थी। जिस उम्मीदवार का नाम निकलता, उसे निर्वाचित माना जाता था।
इसी कारण इस व्यवस्था को “कुदवोलै प्रणाली” कहा गया। यह दुनिया की सबसे प्राचीन संगठित चुनाव प्रणालियों में गिनी जाती है।
उम्मीदवारों के लिए सख्त नियम
इन चुनावों में उम्मीदवार बनने के लिए कई कठोर शर्तें थीं। शिलालेखों के अनुसार उम्मीदवार—
35 से 70 वर्ष की आयु का होना चाहिए,
उसके पास भूमि और मकान होना चाहिए,
वह करदाता हो,
उसे वेदों अथवा प्रशासनिक ज्ञान का बोध हो,
उसका चरित्र अच्छा हो,
तथा उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला न हो।
यदि किसी व्यक्ति पर भ्रष्टाचार, अनैतिक आचरण या सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का आरोप सिद्ध हो जाता था, तो उसे चुनाव लड़ने से वंचित कर दिया जाता था।
इतिहासकारों के अनुसार यह व्यवस्था प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयास थी। निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल सामान्यतः एक वर्ष का होता था और वे गांव की जल व्यवस्था, कर संग्रह, न्यायिक मामलों तथा मंदिर प्रशासन की देखरेख करते थे।
लोकतंत्र, लेकिन सीमित
हालांकि यह प्रणाली लोकतांत्रिक थी, लेकिन पूरी तरह समावेशी नहीं कही जा सकती। उस समय केवल संपन्न और ऊंची जातियों के लोगों को ही चुनाव लड़ने का अधिकार प्राप्त था। मजदूरों, कारीगरों और निम्न वर्गों की भागीदारी सीमित थी।
इतिहासकार के. ए. नीलकंठ शास्त्री ने इसे “मध्यकालीन भारत की सबसे उल्लेखनीय प्रशासनिक व्यवस्थाओं में से एक” बताया है। वहीं कुछ विद्वान इसे “सीमित लोकतंत्र” भी कहते हैं क्योंकि आम जनता को व्यापक राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं थे।
मनूर के शिलालेखों की ऐतिहासिक अहमियत
उत्तरामेरूर की तरह तिरुनेलवेली जिले के मनूर गांव में भी लगभग 800 ईस्वी के शिलालेख मिले हैं। ये पांड्य शासनकाल से जुड़े हैं और बताते हैं कि उस समय भी स्थानीय परिषदों के गठन की व्यवस्था थी।
हालांकि इन शिलालेखों में मतदान की पूरी प्रक्रिया का उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन परिषद सदस्य बनने की पात्रता, आचरण नियम और प्रशासनिक दायित्व स्पष्ट रूप से दर्ज हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रमाण है कि दक्षिण भारत में ग्राम स्वशासन की परंपरा अत्यंत विकसित थी। गांव केवल कृषि इकाइयां नहीं थे, बल्कि वे प्रशासनिक और सामाजिक निर्णयों के केंद्र भी थे।
ग्राम सभाओं की शक्ति
चोल काल में गांवों की “सभा” और “उर” नामक संस्थाएं अत्यंत प्रभावशाली थीं।
“सभा” मुख्यतः ब्राह्मण बस्तियों की परिषद होती थी,
जबकि “उर” सामान्य गांव परिषद को कहा जाता था।
ये संस्थाएं तालाब निर्माण, सिंचाई, कर निर्धारण, शिक्षा और न्याय व्यवस्था जैसे कार्यों का संचालन करती थीं। यह स्थानीय स्वशासन का एक सशक्त मॉडल था।
इतिहासकारों का मानना है कि आधुनिक पंचायती राज व्यवस्था की वैचारिक जड़ें कहीं न कहीं इन्हीं संस्थाओं में दिखाई देती हैं।
आज का लोकतंत्र और प्राचीन विरासत
आज भारत में चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह बदल चुकी है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों, चुनाव आयोग, सार्वभौमिक मताधिकार और संवैधानिक संस्थाओं ने लोकतंत्र को व्यापक और समावेशी बनाया है।
अब जाति, संपत्ति, शिक्षा या लिंग के आधार पर मतदान का अधिकार सीमित नहीं है। 18 वर्ष से अधिक आयु का हर भारतीय नागरिक वोट दे सकता है।
फिर भी उत्तरामेरूर और मनूर के शिलालेख यह याद दिलाते हैं कि भारत में लोकतांत्रिक सोच कोई आयातित अवधारणा नहीं, बल्कि इसकी ऐतिहासिक जड़ें बहुत गहरी हैं।
यूनेस्को और वैश्विक पहचान
उत्तरामेरूर के शिलालेखों को विश्व स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जाता है। कई इतिहासकार इन्हें दुनिया की प्रारंभिक स्थानीय लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में शामिल करते हैं। तमिलनाडु की शिलालेख परंपरा को यूनेस्को ने भी सांस्कृतिक विरासत के रूप में महत्वपूर्ण माना है।
लोकतंत्र की हजार साल लंबी यात्रा
कभी ताड़पत्रों की पर्चियां मिट्टी के घड़े में डाली जाती थीं, आज EVM का बटन दबाया जाता है। माध्यम बदल गए, लेकिन जनभागीदारी की भावना आज भी कायम है।
तमिलनाडु के ये प्राचीन शिलालेख केवल इतिहास नहीं, बल्कि यह संदेश भी हैं कि लोकतंत्र की असली ताकत स्थानीय भागीदारी, जवाबदेही और जनविश्वास में निहित होती है।
भारत का लोकतंत्र केवल संविधान की देन नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक और प्रशासनिक परंपराओं का परिणाम भी है।
