‘अपनी गणना अपने गाँव’: पर्वतीय अस्मिता और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का शंखनाद
Uttarakhand’s statehood movement aimed to empower the hills, ensuring a growth model aligned with mountainous needs rather than plains-centric priorities. However, two decades later, rampant migration has triggered a severe demographic crisis, systematically eroding the hills’ political influence. Driven by the “Apni Ganna Apne Gaon” campaign, led by Jot Singh Bisht, the article warns that delimitation based on declining population could shrink hill assembly seats from 40 to 27, while expanding plains’ representation to 43. This dangerous cycle reduces development funds and silences the hills, making regional census participation vital to safeguard the state’s political future.–Jay Singh Rawat

– जयसिंह रावत –
उत्तराखंड राज्य आंदोलन केवल उत्तर प्रदेश से अलग एक नया राज्य बनाने की कवायद नहीं था। इस आंदोलन की सबसे बड़ी प्रेरणा यह थी कि हिमालयी क्षेत्रों को अपनी राजनीतिक शक्ति मिले, अपने विकास की प्राथमिकताएं स्वयं तय करने का अधिकार मिले और पहाड़ की समस्याओं का समाधान पहाड़ की सोच के अनुरूप हो। अलग उत्तराखंड की मांग इसलिए की गई थी ताकि सत्ता के केंद्र में पहाड़ की आवाज गूंजे, और विकास का मॉडल मैदानों की आवश्यकताओं के बजाय पर्वतीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयार हो।
दो दशक पहले राज्य निर्माण का यह सपना साकार तो हुआ, लेकिन आज विडंबना यह है कि वही पहाड़ धीरे-धीरे अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को खोने की कगार पर खड़ा दिखाई दे रहा है। आज उत्तराखंड के सामने सबसे बड़ा संकट केवल पलायन का नहीं है, बल्कि पलायन के कारण घटती जनसंख्या और उसके परिणामस्वरूप कम होती राजनीतिक ताकत का है। यदि समय रहते इस चुनौती को नहीं समझा गया, तो आने वाले वर्षों में पहाड़ अपने ही राज्य में राजनीतिक रूप से हाशिए पर जा सकता है।
इसी गंभीर खतरे को सबसे पहले संगठित रूप से समाज के सामने रखने वालों में ‘अपनी गणना अपने गाँव’ अभियान के मुख्य सूत्रधार एवं संयोजक जोतसिंह बिष्ट प्रमुख हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि यदि पर्वतीय क्षेत्रों की जनसंख्या लगातार घटती रही, तो उत्तराखंड आंदोलन से प्राप्त राजनीतिक अधिकार भी धीरे-धीरे कमजोर होते जाएंगे।
जनगणना तय करती है सत्ता का गणित
भारत में जनगणना केवल आबादी गिनने की एक सांख्यिकीय प्रक्रिया नहीं है; यह लोकतंत्र का आधार और विकास का सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसी के आधार पर तय होता है:
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विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों का परिसीमन।
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पंचायतों और नगर निकायों का गठन।
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केंद्र और राज्य सरकारों से मिलने वाले बजट का निर्धारण।
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शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, पेयजल, राशन, आंगनबाड़ी और विद्यालय जैसी बुनियादी सुविधाओं का ढांचा।
कैसे बदल रहा है सीटों का संतुलन?
उत्तराखंड राज्य गठन के समय विधानसभा की 70 सीटों का वितरण 1971 की जनसंख्या के आधार पर किया गया था। उस समय का संतुलन पर्वतीय क्षेत्रों के पक्ष में था:
| क्षेत्र | तत्कालीन सीटें (1971 आधार) | 2001 परिसीमन के बाद | भविष्य का अनुमानित आंकड़ा |
| 9 पर्वतीय जिले | 40 सीटें | 34 सीटें | 27 सीटें (अनुमानित) |
| 4 मैदानी जिले | 30 सीटें | 36 सीटें | 43 सीटें (अनुमानित) |
‘अपनी गणना अपने गाँव’ अभियान के अध्ययन के अनुसार, यदि जनसंख्या की यही प्रवृत्ति जारी रही तो भविष्य के परिसीमन में पहाड़ की सीटें घटकर मात्र 27 रह जाएंगी, जबकि मैदानों की हिस्सेदारी बढ़कर 43 तक पहुंच सकती है। इसका सीधा अर्थ यह होगा कि उत्तराखंड की नीतियों, बजट और राजनीतिक निर्णयों में पहाड़ की आवाज बेहद कमजोर हो जाएगी।
पलायन ने बदल दिया राजनीतिक भूगोल
उत्तराखंड के अधिकांश पर्वतीय जिलों में दशकों से जारी पलायन का असर अब केवल गांवों की खाली होती चौपालों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसने लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर सीधा प्रहार किया है।
जनसांख्यिकीय संकट का दुष्चक्र:
2001 और 2011 की जनगणना के बीच अल्मोड़ा और पौड़ी गढ़वाल जैसे जिलों में जनसंख्या वृद्धि नकारात्मक (Negative) रही, जबकि देहरादून, हरिद्वार, ऊधमसिंह नगर और नैनीताल जैसे मैदानी जिलों में आबादी तेजी से बढ़ी।
जनसंख्या घटने का असर केवल विधानसभा सीटों तक सीमित नहीं रहता। ग्राम पंचायतों के गठन से लेकर, पंचायतों को मिलने वाले अनुदान, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) जैसी विकास योजनाओं का निर्धारण भी आबादी के आधार पर ही होता है। यानी, गाँव की आबादी कम होगी तो विकास का हिस्सा भी स्वतः कम हो जाएगा। विडंबना यह है कि पहाड़ का विकास रुकने से पलायन बढ़ता है, और पलायन बढ़ने से विकास के संसाधन और कम हो जाते हैं। यही दुष्चक्र आज उत्तराखंड की सबसे बड़ी चुनौती है।
‘अपनी गणना अपने गाँव’ क्यों जरूरी?
इसी चिंता से उपजा है ‘अपनी गणना अपने गाँव’ अभियान। इसके संयोजक जोतसिंह बिष्ट का तर्क है कि रोजगार या शिक्षा के लिए बाहर रहना किसी की मजबूरी हो सकती है, लेकिन यदि उत्तराखंड का प्रवासी समाज अपनी जन्मभूमि और अपनी जड़ों से जुड़ा है, तो उसे जनगणना के समय अपने मूल गाँव में अपनी गणना अवश्य करानी चाहिए।
यह अभियान किसी को स्थायी रूप से गाँव लौटने के लिए बाध्य नहीं करता, बल्कि इसके मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं:
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लोकतांत्रिक रिश्ता बनाए रखना: प्रवासी उत्तराखंडी जनगणना के दौरान अपने गाँव पहुंचकर अपना और अपने परिवार का नाम मूल निवास स्थान पर दर्ज करवाएं।
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वास्तविक जनसंख्या आधार की रक्षा: इससे पर्वतीय क्षेत्रों का वास्तविक जनसंख्या डेटा सुरक्षित रहेगा, जिससे भविष्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटने का खतरा कम होगा।
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चेतना का प्रसार: यह केवल एक भावनात्मक अपील नहीं, बल्कि पर्वतीय अस्मिता और राजनीतिक अधिकारों को बचाने का एक जागरूक लोकतांत्रिक आंदोलन है।
केवल जनगणना नहीं, भविष्य बचाने की लड़ाई
यह पूरी तरह सच है कि उत्तराखंड की समस्याओं का स्थायी समाधान केवल जनगणना से नहीं होगा। उसके लिए रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुदृढ़ स्वास्थ्य सेवाएं, कृषि आधारित उद्योग, पर्यटन, डिजिटल कनेक्टिविटी और स्थानीय संसाधनों पर आधारित एक ठोस विकास मॉडल की आवश्यकता है। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि यदि हमारा राजनीतिक प्रतिनिधित्व ही समाप्त हो गया, तो इन समस्याओं के समाधान के लिए सदन में आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचेगा।
जोतसिंह बिष्ट लगातार इस बात पर जोर देते रहे हैं कि उत्तराखंड आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि हमारा राजनीतिक प्रतिनिधित्व था। यदि वही आधार खिसक गया, तो राज्य निर्माण का मूल उद्देश्य ही परास्त हो जाएगा।
यह पूरे उत्तराखंडी समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है—चाहे वे गांवों में रह रहे हों या आजीविका के लिए देश-विदेश में। यदि हमारे गाँव जनगणना के आंकड़ों से गायब होते गए, तो वे जल्द ही राज्य के राजनीतिक मानचित्र से भी ओझल हो जाएंगे।
आने वाली जनगणना केवल आंकड़ों का संकलन नहीं होगी, बल्कि यह तय करेगी कि भविष्य के उत्तराखंड में पहाड़ की आवाज कितनी बुलंद रहेगी। आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या हम केवल अपने पहाड़ों का भूगोल बचाना चाहते हैं, या उनका राजनीतिक भविष्य भी?
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लेखक परिचय: जयसिंह रावत उत्तराखंड के एक वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं शोधकर्ता हैं। मीडिया जगत में 48 वर्षों से अधिक का अनुभव रखने वाले रावत हिमालयी पारिस्थितिकी, जनजातीय इतिहास और उत्तराखंड की सामाजिक-राजनीतिक व प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर निरंतर लेखन करते रहते हैं। लेकिन इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं। इनसे वेब पोर्टल के एडमिन (प्रबंधन) का सहमत होना आवश्यक नहीं है।
