शिक्षा/साहित्य

दून पुस्तकालय में समकालीन कहानी की पठनीयता और चुनौतियां पर ‘संवेदना’ ने की गोष्ठी

देहरादून, 17 अगस्त। साहित्य कला और संस्कृति के लिए समर्पित संस्था “संवेदना” द्वारा दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सहयोग से दून पुस्तकालय के सभागार में आज कहानी विधा से संबंधित विषय “समकालीन कहानी की पठनीयता और चुनौतियां” विषय पर एक गोष्ठी संपन्न हुई ।

गोष्ठी की अतिथि वक्ता डॉक्टर रजनी गुप्त, जो कि ‘कथाक्रम’ पत्रिका लखनऊ की उप संपादक भी हैं, ने कहा कि समकालीनता एक विशेष कालखंड का द्योतक है, जिसमें आज के जीवन का यथार्थ हो अर्थात सीधे-सीधे वास्तविक जीवन से सहजता से जुड़ाव महसूस हो । आज की इस कहानी में इस तरह से विषयों की विविधता शामिल हो,जिसे पढ़ते हुए आम पाठक को अपना समूचा जीवन नजर आए, कहानी में ऐसे नए विषयों को लिया जाए जिसमें दिन-ब-दिन जटिल होते जा रहे रिश्तों और जीवन के बहुआयामी संबंधों से मुठभेड़,पढ़कर जीने का हौसला जगे । विषय बेशक नए हों मगर थीम को रचने गढ़ने में इतनी दुरूहता न हो, जिसे आम पाठक समझ ही ना सके । जैसे गीतांजलि श्री का बुकर पुरस्कार प्राप्त उपन्यास ‘रेत समाधि’ . क्योंकि इस तेज रफ्तार दौर में आज समय की कमी है । रचनारत कई पीढियां के लेखक मौजूदा दौर के बहुरूपिया प्रहारों और बाजार से उपजी समस्याओं का सामना कर रहे हैं । बेशक कहानियों का खूब प्रकाशन हो रहा है किंतु पाठकों की संख्या में इसने इजाफा किया हो ऐसा कहना मुश्किल है । इसके बरबक्श सामान्य पाठक कई बार एक जैसे होते जा रहे उसके पाठ से ऊबने की शिकायत भी करते हुए देखे जा सकते हैं

अपने-अपने हिसाब से तय लगभग दो दशक के जीवन को रचनाओं में समेटना मुश्किल है । क्योंकि आज कहानीकारों की कई पीढियां एक साथ सक्रिय हैं । समकालीन कहानी में तीन पीढियां के लेखक सृजनरत हैं । आम पाठक किसे पढ़े किसे ना पड़े , पढ़ने का हासिल क्या रहा, ऐसे सवाल जरूरी हैं । आज के दौर में पठनीयता के दबाव का सामना करने और नए शिल्प को पाने की जद्दोजहाफ़ से हर लेखक जूझ रहा है । इतना ही नहीं जिन लोगों का रचनाकाल कुछ दशकों तक फैला है, उन्होंने भी अपनी सीमाओं का अतिक्रमण किया है । कई बार नव्यता के अति उत्साह में कुछ युवा लेखक अपनी ही शैली के दोहराव के शिकार होकर अल्प अवधि में ही पुराने पड़ते गए यानी मोनोटोनस हो गए । हिंदी कहानी के समकालीन परिदृश्य में दोनों ही तरह के उदाहरण आसानी से देखे जा सकते हैं ।

डॉ रजनी गुप्त के उपन्यास/ कहानी पुस्तक ‘आलापचारी’ के लोकार्पण से इस गोष्ठी की शुरुआत हुई ।

गोष्ठी के अध्यक्ष श्री जितेन ठाकुर, जिन्हें उत्तराखंड राज्य सरकार के द्वारा हाल ही में राज्य के साहित्य भूषण सम्मान से भी नवाजा गया है, ने इस विषय पर अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि पठनीयता किसी भी रचना की रीढ़ होती है जिसके सहारे रचना एक पाठक से दूसरे पाठक तक और फिर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है। यह सच है कि हमने पाठकों का एक बड़ा प्रतिशत खोया है पर फिर भी आज हमारे पास पाठक है और इसे बचाए रखना एक बड़ी चुनौती है । प्रायोजित चर्चाओं ने साहित्य का अहित किया है। इन सब चुनौतियों के बीच ही समाज में कहानी विधा को समाज के लिए उपयोगी बनाते हुए इन चुनौतियों से निरंतर जूझना और पार पाना हर कहानीकार के लिए ब्यक्तिगत स्तर पर और साहित्यिक संस्थाओं को सामूहिक स्तर पर लेखन से भी पहले की पहली जरूरी शर्त है ।

गोष्ठी का प्रारंभ दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के समन्वयक चंद्रशेखर तिवारी के द्वारा सभी उपस्थित सदस्यों के स्वागत के साथ किया गया । संवेदना संस्था के संयोजक समदर्शी बड़थ्वाल ने संवेदना संस्था के कार्यों पर बात रखी । यह संस्था पिछले पांच दशक से भी अधिक समय से देहरादून में साहित्य कला और संस्कृति के क्षेत्र में अपना निरंतर योगदान दे रही है । हर माह के प्रथम रविवार को संवेदना की पहली गोष्टी संपन्न होती है जिसमें रचनाकारों द्वारा अपनी अब अप्रकाशित रचनाओं को संवेदना के साथियों के समक्ष रखा जाता है और उस पर उनकी राय ली जाती है, जिससे उसका परिमार्जन किया जा सके । कला संस्कृति और समसामयिक सामाजिक मुद्दों पर भी संवेदना द्वारा विभिन्न कार्यक्रमों और जन आंदोलनों सामाजिक कार्यों में निरंतर सहभागिता की जाती रही है ।

गोष्ठी का संचालन डॉक्टर विद्या सिंह ने किया और गोष्टी के विषय पर प्रारंभिक आधार वक्तव्य भी रखा । आज के दौर में जबकि हर कार्य हर गतिविधि में तेजी और तकनीक का विशेष सम्मिश्रण हो चुका है, ऐसे में कहानी लेखन और उसका पाठकों तक उसके मूल तत्व के साथ पहुंचना और उन्हें प्रभावित करना एक दुष्कर या कठिन कार्य हो गया है । इस बारे में इसे चुनौती के रूप में लिया जाना आवश्यक भी है, जबकि चुनौती के रूप में तकनीक, सोशल मीडिया, समय की कमी और युवा वर्ग में नए दौर की विस्तृत पठन-पाठन की प्रक्रिया, रोजगार के लिए जद्दोजहद के कारण एक नए तरह का परिवेश बनता जा रहा है । ऐसे में पुस्तक के रूप में या सोशल मीडिया में भी कहानी को पाठक तक एक अलग समय निश्चित करते हुए पहुंचाना काफी मुश्किल जान पड़ता है । इन कठिनाइयों को पार करते हुए मनुष्य जीवन में उसके बहुमुखी विकास के लिए कहानी की उपयोगिता और उसके प्रभावों को कैसे अक्षुण्ण रखा जाए, इस बारे में ही आज की गोष्टी आज आप सबके सामने अपनी बात रखती है ।

गोष्ठी में दून पुस्तकालय के सक्रिय सदस्य श्री चंद्रशेखर तिवारी, श्री निकोलस हॉफलैण्ड, श्री सुंदर सिंह बिष्ट, संवेदना के साथी डॉक्टर जितेंद्र भारती, डॉ राजेश पाल, डॉ आशुतोष सिंह, शशि भूषण बडोनी, डाॅ. लालता प्रसाद, डॉली डबराल, सुधा थपलियाल, डॉ इंदु पांडे, सुधा जुगरान, सरोजनी नौटियाल,यामा शर्मा, नीलम्प्रभा वर्मा, निशा अतुल्य, रजनीश त्रिवेदी, शिवमोहन सिंह, संजीव घिल्डियाल, कुसुम भट्ट, डॉ घनश्याम सिंह, तन्मय ममगाईं सहित अन्य साहित्यकार उपस्थित रहे ।

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