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श्रीलंका के 40 सिविल सेवा अधिकारियों ने समझी उत्तराखंड की आपदा प्रबंधन व्यवस्था

नेदेहरादून, 17 अगस्त।  शनल सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस (एनसीजीजी) के तत्वावधान में आपदा प्रबंधन विषय पर आयोजित क्षमता निर्माण कार्यक्रम के तहत श्रीलंका के 40 सदस्यीय सिविल सेवा अधिकारियों के प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) का दौरा किया। प्रतिनिधिमंडल ने राज्य में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों, तकनीकी नवाचारों और संस्थागत व्यवस्थाओं की जानकारी ली। अधिकारियों ने विशेष रूप से पूर्व चेतावनी प्रणाली, मौसम आधारित जोखिम प्रबंधन, भूस्खलन न्यूनीकरण, तकनीकी संसाधनों के उपयोग तथा समुदाय की भागीदारी से संचालित आपदा प्रबंधन तंत्र को समझा। प्रतिनिधिमंडल ने उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए किए जा रहे प्रयासों की भी जानकारी ली।

इस अवसर पर यूएसडीएमए के अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (प्रशासन) प्रकाश चंद्र ने कहा कि उत्तराखंड की भौगोलिक एवं प्राकृतिक परिस्थितियां आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में निरंतर तैयारी और जोखिमों की पहले से पहचान की मांग करती हैं। उन्होंने कहा कि राज्य में आपदा प्रबंधन को केवल आपदा के बाद की प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रखा गया है, बल्कि जोखिम की पहचान, न्यूनीकरण, पूर्व तैयारी, प्रशिक्षण, तकनीकी क्षमता और विभागीय समन्वय को एकीकृत करते हुए आगे बढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस व्यवस्था को और प्रभावी बनाने में वैज्ञानिक संस्थानों और स्थानीय समुदायों की सहभागिता महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

यूएसडीएमए के अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (क्रियान्वयन) एवं डीआईजी राजकुमार नेगी ने प्रतिनिधिमंडल को राज्य की आपदा प्रबंधन प्रणाली में स्थापित समन्वय तंत्र की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि किसी भी आपदा की स्थिति में सूचना प्राप्त होने से लेकर राहत एवं बचाव कार्यों के संचालन तक विभिन्न स्तरों पर स्पष्ट समन्वय व्यवस्था सुनिश्चित की गई है। उन्होंने राज्य एवं जिला आपातकालीन परिचालन केंद्रों की भूमिका, घटना प्रतिक्रिया प्रणाली (आईआरएस), बहु-स्रोत चेतावनी तंत्र तथा तकनीक आधारित सूचना एवं निर्णय सहायता प्रणालियों के बारे में विस्तार से बताया।

मौसम विशेषज्ञ डॉ. पूजा राणा ने उत्तराखंड में मौसम संबंधी जोखिमों की निगरानी और पूर्व चेतावनी के लिए अपनाई जा रही वैज्ञानिक व्यवस्थाओं की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारतीय मौसम विज्ञान विभाग की ओर से उपग्रह आधारित निगरानी, डॉप्लर वेदर रडार, स्वचालित मौसम केंद्र, स्वचालित वर्षामापी तथा अन्य आधुनिक उपकरणों से प्राप्त आंकड़ों का लगातार विश्लेषण किया जाता है। रियल-टाइम मौसम संबंधी सूचनाओं के आधार पर विभिन्न अवधि के पूर्वानुमान और प्रभाव आधारित चेतावनियां तैयार की जाती हैं, ताकि संवेदनशील क्षेत्रों में समय रहते आवश्यक तैयारियां की जा सकें।

उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र (यूएलएमएमसी) के जियोलॉजिस्ट डॉ. रघुवीर नेगी ने राज्य में भूस्खलन के जोखिम को कम करने के लिए अपनाए जा रहे वैज्ञानिक उपायों पर प्रकाश डाला। उन्होंने संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, भू-वैज्ञानिक एवं भू-तकनीकी अध्ययन, रिमोट सेंसिंग एवं जीआईएस आधारित विश्लेषण, ड्रोन सर्वेक्षण, ढलानों की निगरानी तथा वर्षा और भूस्खलन के बीच संबंधों के अध्ययन की जानकारी दी।

उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर जोखिम वाले क्षेत्रों में आवश्यक उपचारात्मक एवं स्थिरीकरण उपाय तय किए जाते हैं। इनमें जल निकासी व्यवस्था को बेहतर बनाना, ढलानों को स्थिर करना और जरूरत के अनुसार इंजीनियरिंग हस्तक्षेप शामिल हैं। अत्यधिक वर्षा और भूस्खलन से प्रभावित होने वाले श्रीलंका के लिए उत्तराखंड में अपनाई जा रही ये व्यवस्थाएं प्रतिनिधिमंडल के लिए विशेष रूप से उपयोगी और अध्ययन योग्य रहीं।

इस दौरान प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने उत्तराखंड की आपदा प्रबंधन प्रणाली से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अधिकारियों एवं विशेषज्ञों के साथ संवाद किया। उन्होंने राज्य में अपनाए जा रहे तकनीकी और संस्थागत उपायों में विशेष रुचि दिखाई तथा आपदा जोखिम न्यूनीकरण से जुड़े अनुभवों को साझा किया। इस अवसर पर संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी दिनेश कुमार पुनेठा, एनसीजीजी के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. एपी सिंह, डॉ. एमके भंडारी सहित अन्य अधिकारी एवं विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग से मजबूत होगा आपदा प्रबंधन तंत्र : सुमन

सचिव, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विनोद कुमार सुमन ने कहा कि आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में निरंतर सीखने, अनुभव साझा करने और नई कार्यप्रणालियों को अपनाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि विभिन्न देशों के अधिकारियों के साथ संवाद और अनुभवों का आदान-प्रदान आपदा जोखिमों से निपटने की तैयारियों को व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में विकसित संस्थागत व्यवस्थाओं, तकनीकी नवाचारों और जमीनी अनुभवों को साझा करने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जा रही प्रभावी प्रणालियों को समझना भी राज्य की आपदा प्रबंधन क्षमता को मजबूत करने में सहायक होगा। ऐसे कार्यक्रम आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के साथ भविष्य की आपदाओं के प्रति अधिक सक्षम, समन्वित और लचीली व्यवस्था विकसित करने का अवसर प्रदान करते हैं।

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