अब दांत का इम्प्लांट लगवाना हो सकता है आसान, भारतीय वैज्ञानिकों ने खोजा नया रास्ता
चित्र 1: (ए) टेपर्ड ग्रेफाइट डाई का योजनाबद्ध डायग्राम; (बी) दो परतों वाले टीआई6एआई4वी -वाईएसजैड डेंटल इम्प्लांट का योजनाबद्ध डायग्राम; (सी) 8 वाईएसजैड (ऊपर) और टीआई6एआई4वी (नीचे) का दो-परतों वाला नमूना; (डी) दो-परतों वाले नमूने का क्रॉस सेक्शन
Indian scientists at ARCI have developed a single-piece, dual-layer dental implant combining titanium alloy (for strength and bone integration) and zirconia (for durability and natural appearance). Made via spark plasma sintering, it achieves high density, strength, and biocompatibility. This innovation aims to reduce the need for multiple surgeries and joint-related issues common in traditional multi-part implants. Still in the development stage, it could lead to simpler, more durable, and potentially affordable indigenous implants, benefiting patients in India where dental issues are rising.
दो परतों वाला एक ही टुकड़े का इम्प्लांट, बार-बार सर्जरी की जरूरत घटाने की दिशा में बड़ी पहल

-ज्योति रावत –
दांत टूट जाए या किसी कारण निकालना पड़े तो उसकी जगह कृत्रिम दांत लगवाना आज आम बात है। लेकिन जिसने कभी डेंटल इम्प्लांट लगवाया है, वह जानता है कि यह प्रक्रिया केवल नया दांत लगाने जितनी आसान नहीं होती। कई बार डॉक्टर के पास जाना, जबड़े में इम्प्लांट लगाना, उसके ठीक होने का इंतजार करना और फिर उसके ऊपर कृत्रिम दांत फिट करना पड़ता है। कुछ मामलों में दो से तीन सर्जिकल प्रक्रियाओं से भी गुजरना पड़ सकता है।
अब भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जो भविष्य में इस प्रक्रिया को आसान बना सकती है। उन्होंने दो अलग-अलग खूबियों वाली सामग्रियों को जोड़कर दो परतों वाला सिंगल-पीस डेंटल इम्प्लांट तैयार किया है। इसका उद्देश्य इम्प्लांट को मजबूत और टिकाऊ बनाने के साथ सर्जिकल प्रक्रिया की जरूरत कम करना है।

अभी क्यों जटिल है इम्प्लांट लगाना?
सामान्य डेंटल इम्प्लांट को आसान भाषा में समझें तो वह तीन हिस्सों से मिलकर बनता है। पहला हिस्सा जबड़े की हड्डी के भीतर लगाया जाता है। दूसरा हिस्सा उसके और कृत्रिम दांत के बीच जोड़ का काम करता है और तीसरा वह क्राउन है, जो बाहर से हमारे असली दांत जैसा दिखाई देता है।
अलग-अलग हिस्सों को जोड़ने की इस व्यवस्था में एक समस्या यह है कि जोड़ वाली जगह पर बहुत मामूली हलचल भी लंबे समय में परेशानी पैदा कर सकती है। इससे इम्प्लांट का हड्डी के साथ जुड़ाव प्रभावित होने या उसके ढीला पड़ने का खतरा रहता है।
इसी समस्या का समाधान खोजने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के स्वायत्त संस्थान इंटरनेशनल एडवांस्ड रिसर्च सेंटर फॉर पाउडर मेटलर्जी एंड न्यू मैटेरियल्स (एआरसीआई) के वैज्ञानिकों ने नई संरचना तैयार की है।
एक इम्प्लांट में दो सामग्रियों की खूबियां
वैज्ञानिकों ने इसमें टाइटेनियम मिश्र धातु और ज़िरकोनिया का इस्तेमाल किया है। दोनों पहले से चिकित्सा और दंत चिकित्सा में उपयोग होने वाली महत्वपूर्ण सामग्रियां हैं, लेकिन दोनों की अपनी खूबियां और सीमाएं हैं।
टाइटेनियम मिश्र धातु मजबूत होती है और जबड़े की हड्डी के साथ अच्छी तरह जुड़ सकती है। इसलिए इसे इम्प्लांट के उस हिस्से में रखा गया है, जिसे जबड़े के भीतर भार सहना होता है। दूसरी ओर ज़िरकोनिया को ऊपरी हिस्से में इस्तेमाल किया गया है। यह घिसाव और संक्षारण के प्रति अधिक प्रतिरोधी होने के साथ देखने में भी दांत के लिए उपयुक्त है।
यानी वैज्ञानिकों ने एक ही सामग्री से पूरा इम्प्लांट बनाने के बजाय दो सामग्रियों की खूबियों को एक संरचना में जोड़ने की कोशिश की है।
मुश्किल था दोनों को एक साथ जोड़ना
यह काम सुनने में जितना आसान लगता है, वास्तव में उतना था नहीं। टाइटेनियम मिश्र धातु और ज़िरकोनिया को तैयार करने के लिए आवश्यक तापमान में काफी अंतर होता है। इसलिए दोनों को बिना किसी कमजोरी के एक मजबूत संरचना में जोड़ना वैज्ञानिक चुनौती थी।
इसके लिए शोधकर्ताओं ने स्पार्क प्लाज्मा सिंटरिंग नाम की उन्नत तकनीक अपनाई। विशेष रूप से तैयार उपकरण की मदद से तापमान को इस तरह नियंत्रित किया गया कि दोनों सामग्रियां एक साथ सघन होकर मजबूत दो-परती संरचना में बदल गईं।
इस प्रक्रिया से तैयार सामग्री का घनत्व 99.5 प्रतिशत तक पहुंच गया। जांच में दोनों परतों के जोड़ पर दरार, छेद या परतों के अलग होने जैसी गंभीर खामियां नहीं मिलीं। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुंह के भीतर लगा इम्प्लांट वर्षों तक लगातार चबाने का दबाव सहता है।
मजबूती की परीक्षा में भी अच्छे नतीजे
प्रयोगशाला परीक्षणों में इस नई संरचना ने उत्साहजनक परिणाम दिए हैं। इसकी कठोरता 1350 एचवी तक और दबाव सहने की क्षमता करीब 1550 मेगापास्कल दर्ज की गई। इसकी फ्लेक्सुरल यानी मुड़ने के दबाव को सहने की क्षमता लगभग 310 मेगापास्कल रही। शोधकर्ताओं के अनुसार ये नतीजे व्यावसायिक इम्प्लांट सामग्रियों के बराबर या कुछ मामलों में उनसे बेहतर हैं।
लेकिन मुंह में लगाई जाने वाली किसी सामग्री के लिए केवल मजबूत होना पर्याप्त नहीं है। उसका शरीर के लिए सुरक्षित होना भी जरूरी है। इसीलिए वैज्ञानिकों ने इसकी जैव अनुकूलता की भी जांच की।
कोशिकाओं पर किए गए प्रयोगों में 90 प्रतिशत से अधिक चयापचय गतिविधि दर्ज हुई। लाल रक्त कोशिकाओं को होने वाली क्षति भी नगण्य पाई गई। शुरुआती प्रयोगशाला नतीजे बताते हैं कि यह सामग्री जैविक दृष्टि से अनुकूल हो सकती है।
मरीज के लिए इसका क्या मतलब है?
यही इस पूरे शोध का सबसे महत्वपूर्ण सवाल है। यदि आगे के परीक्षणों और नैदानिक मूल्यांकन में तकनीक सफल रहती है तो भविष्य में ऐसा इम्प्लांट उपलब्ध हो सकता है जिसमें अलग-अलग हिस्सों और उनके जोड़ से जुड़ी कुछ समस्याएं कम हों। एकीकृत संरचना सर्जिकल प्रक्रिया को भी सरल बनाने में मदद कर सकती है।
इसका मतलब मरीज के लिए कम परेशानी, इलाज की अपेक्षाकृत सरल प्रक्रिया और अधिक टिकाऊ इम्प्लांट की संभावना हो सकती है।
हालांकि इसे अभी ऐसी तकनीक नहीं माना जाना चाहिए जो कल से हर डेंटल क्लीनिक में उपलब्ध हो जाएगी। शोध अभी विकास और प्रक्रिया-अनुकूलन के चरण में है। वैज्ञानिकों को इम्प्लांट को अंतिम आकार देने की मशीनिंग के दौरान घुमावदार सतहों पर कुछ तकनीकी चुनौतियां भी मिली हैं, जिन पर काम चल रहा है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज?
भारत में दांतों की समस्या बड़ी स्वास्थ्य चुनौती है और उम्र बढ़ने के साथ दांत खोने वाले लोगों में इम्प्लांट की मांग भी बढ़ रही है। अच्छी गुणवत्ता वाले इम्प्लांट और उससे जुड़ा उपचार महंगा हो सकता है। ऐसे में देश में विकसित तकनीक यदि बड़े पैमाने पर उत्पादन और चिकित्सकीय उपयोग तक पहुंचती है तो भविष्य में किफायती स्वदेशी डेंटल इम्प्लांट के लिए रास्ता खुल सकता है।
एआरसीआई की विकसित निर्माण प्रक्रिया की एक और खासियत यह है कि इसे बार-बार लगभग समान गुणवत्ता के साथ दोहराया जा सकता है। इससे इसके औद्योगिक स्तर पर उत्पादन की संभावना बढ़ती है।
फिलहाल इस खोज की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि इसने डेंटल इम्प्लांट की सारी समस्याएं हल कर दी हैं, बल्कि यह है कि भारतीय वैज्ञानिकों ने हड्डी के लिए मजबूती और दिखाई देने वाले दांत के लिए उपयुक्त सामग्री को एक ही इम्प्लांट में जोड़ने का रास्ता तैयार किया है।
यदि आगे के परीक्षण भी सफल रहे तो आने वाले समय में कृत्रिम दांत लगवाने वाले मरीजों को बार-बार की सर्जरी और जटिल जोड़ वाले इम्प्लांट से कुछ हद तक राहत मिल सकती है। यानी जिस डेंटल इम्प्लांट को आज कई चरणों की चिकित्सा प्रक्रिया माना जाता है, उसे भविष्य में अधिक सरल बनाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण स्वदेशी कदम है।
