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अश्वगंधा का नियमित सेवन लिवर और किडनी के लिए पूरी तरह सुरक्षित: बड़े वैज्ञानिक अध्ययन में पुष्टि

Multicentre randomised placebo-controlled trial involving 1,200 vaccinated adults finds Ashwagandha root extract well tolerated over 24 weeks; study published recently in Frontiers in Medicine

 

– उषा रावत –

स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) बढ़ाने के लिए अश्वगंधा का उपयोग सदियों से किया जा रहा है, लेकिन इसके लंबे समय तक सेवन को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। हाल ही में प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘फ्रंटियर्स इन मेडिसिन’ (Frontiers in Medicine) में प्रकाशित एक बड़े क्लिनिकल अध्ययन ने इन शंकाओं को दूर कर दिया है। अध्ययन में स्पष्ट पाया गया है कि 24 सप्ताह (लगभग 6 महीने) तक अश्वगंधा के ‘मूल अर्क’ (Root Extract) का रोजाना सेवन करने से लिवर या किडनी को कोई नुकसान नहीं पहुंचता है।

20 अगस्त 2026 को प्रकाशित यह शोध देश के 9 प्रमुख संस्थानों के 45 विशेषज्ञों की टीम द्वारा किया गया है। इसमें केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद (CCRAS), अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIIA), राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (जयपुर), ट्रांसलेशनल हेल्थ साइंस एंड टेक्नोलॉजी इंस्टीट्यूट और सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय जैसे शीर्ष संस्थानों के आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा (मॉडर्न मेडिसिन) के विशेषज्ञ शामिल थे।

1,200 लोगों पर 6 महीने तक चला गहन परीक्षण

इस अध्ययन को आधुनिक विज्ञान के सबसे कड़े मानकों—‘रैंडमाइज्ड, डबल-ब्लाइंड, प्लेसीबो-नियंत्रित ट्रायल’ के तहत भारत के सात केंद्रों पर पूरा किया गया। परीक्षण में 18 से 70 वर्ष की आयु के ऐसे 1,200 स्वस्थ वयस्कों को शामिल किया गया, जिन्हें कोविशील्ड (COVISHIELD™) वैक्सीन की पहली, दूसरी या बूस्टर डोज लग चुकी थी।

प्रतिभागियों को दो समूहों में बांटकर एक समूह को रोजाना 500 मिलीग्राम मानकीकृत जलीय अश्वगंधा मूल अर्क (जो 4 ग्राम कच्ची अश्वगंधा जड़ के चूर्ण के बराबर है) दिया गया, जबकि दूसरे समूह को प्लेसीबो (बिना दवा की सामान्य गोली) दी गई। 24 सप्ताह तक सेवन कराने के बाद 28वें सप्ताह तक प्रतिभागियों के स्वास्थ्य की निगरानी की गई, जिसमें 1,032 लोगों (86 प्रतिशत) ने अध्ययन के सभी चरणों को सफलतापूर्वक पूरा किया।

लिवर, किडनी और वैक्सीन की क्षमता पर क्या रहा असर?

छह महीने तक चले इस परीक्षण के दौरान प्रतिभागियों की नियमित क्लिनिकल और लैब जांच की गई। वैज्ञानिकों ने पाया कि अश्वगंधा लेने वाले लोगों में लिवर एंजाइम, बिलीरुबिन, क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया जैसे सभी महत्वपूर्ण मानक पूरी तरह सामान्य सीमा के भीतर रहे। किसी भी प्रतिभागी में लिवर या किडनी को नुकसान पहुंचने का कोई प्रमाण नहीं मिला और न ही किसी को दुष्प्रभाव के कारण अध्ययन छोड़ना पड़ा।

इस शोध का एक और महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि अश्वगंधा के सेवन से कोरोना वैक्सीन से बनी इम्यूनिटी पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा। अध्ययन के प्रमुख लेखक और पुणे के प्रसिद्ध रूमेटोलॉजिस्ट डॉ. अरविंद चोपड़ा के अनुसार, अश्वगंधा और प्लेसीबो दोनों ही समूहों में वायरस को निष्क्रिय करने की क्षमता 85 प्रतिशत से अधिक बनी रही, जो यह साबित करता है कि वैक्सीन के साथ भी अश्वगंधा का सेवन पूरी तरह सुरक्षित है।

आयुर्वेद की वैश्विक विश्वसनीयता के लिए बड़ा कदम

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने इन नतीजों को आधुनिक स्वास्थ्य सेवा में आयुर्वेद की भूमिका के लिए बेहद अहम बताया है। उनका कहना है कि इस तरह के उच्च-स्तरीय वैज्ञानिक शोध वैश्विक स्तर पर आयुर्वेदिक दवाओं के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग को मजबूती देते हैं।

अध्ययन के सह-लेखक और आयुष के राष्ट्रीय प्रोफेसर भूषण पाटवर्धन तथा सीसीआरएएस (CCRAS) के महानिदेशक प्रो. (वैद्य) रबिनारायण आचार्य ने भी इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक आयुर्वेद को जब आधुनिक वैज्ञानिक कसौटियों पर परखा जाता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा जगत में आयुर्वेद की स्वीकार्यता और भरोसा दोनों बढ़ते हैं। यह शोध स्पष्ट करता है कि मानकीकृत अश्वगंधा अर्क का लंबे समय तक सेवन स्वास्थ्य के लिए पूरी तरह सुरक्षित और अनुकूल है।

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