दवाओं की मनमानी कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार बोली—रास्ता निकालेंगे
नई दिल्ली, 30 सितंबर। जीवनरक्षक और दूसरी दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) और खुदरा विक्रेता को मिलने वाली कीमत (पीटीआर) के बीच भारी अंतर पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पूछा कि जब दवाएं लोगों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं तो कुछ चुनिंदा दवाओं पर ही मूल्य नियंत्रण क्यों हो और बाकी दवाओं को अत्यधिक कीमत पर बेचने की छूट क्यों दी जाए। केंद्र सरकार ने पहली बार अदालत में स्वीकार किया कि दवाओं की अत्यधिक कीमत का मुद्दा वास्तविक समस्या है और भरोसा दिलाया कि इसका समाधान तलाशा जाएगा।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मंगलवार को सुनवाई के दौरान दवाओं की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था पर सवाल उठाए। अदालत के सामने कैंसर की एक दवा का उदाहरण आया, जिसकी खुदरा विक्रेता को आपूर्ति कीमत करीब 2,700 से 3,000 रुपये थी, जबकि पैकेट पर 27,000 रुपये एमआरपी अंकित थी। यानी मरीज से लगभग दस गुना तक कीमत वसूलने की गुंजाइश थी। अदालत ने इतनी बड़ी मूल्य-वृद्धि पर कड़ी नाराजगी जताई।
सभी दवाओं पर 16 प्रतिशत की सीमा क्यों नहीं?
पीठ ने केंद्र से पूछा कि दवाओं की एमआरपी निर्धारित करने के लिए एक समान व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती। अदालत ने सवाल किया कि खुदरा विक्रेता की कीमत के ऊपर अधिकतम 16 प्रतिशत की सीमा सभी दवाओं के लिए क्यों लागू नहीं हो सकती। हालांकि यह अभी अदालत का आदेश नहीं है, बल्कि सुनवाई के दौरान सरकार के सामने रखा गया सवाल और विचार है। मौजूदा औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश, 2013 में 16 प्रतिशत का प्रावधान कुछ मूल्य-गणनाओं में लागू होता है; सभी दवाओं पर समान रूप से 16 प्रतिशत की सीमा फिलहाल लागू नहीं है।
अदालत ने अनुसूचित और गैर-अनुसूचित दवाओं के बीच मूल्य नियंत्रण के अंतर पर भी सवाल उठाया। पीठ का कहना था कि मरीज के लिए बीमारी के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवा आवश्यक होती है, इसलिए यह विचार करने की जरूरत है कि बड़ी संख्या में दवाओं को प्रभावी मूल्य नियंत्रण से बाहर क्यों रखा जाए।
कॉरपोरेट अस्पतालों की फार्मेसी पर भी सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने कॉरपोरेट अस्पतालों में मरीजों को अस्पताल की अपनी फार्मेसी से ही दवा खरीदने के लिए बाध्य किए जाने की शिकायतों पर भी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि यदि अस्पताल अत्यधिक एमआरपी वाली दवा अपनी फार्मेसी से खरीदने को मजबूर करते हैं तो मरीज के पास वास्तविक विकल्प बहुत कम रह जाता है।
पीठ ने इस मामले को सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं से भी जोड़ा। यदि किसी मरीज का इलाज सरकारी योजना के तहत होता है और अस्पताल बढ़ी हुई एमआरपी के आधार पर बिल बनाता है, तो उसकी प्रतिपूर्ति अंततः सरकारी खजाने से होती है। इस तरह अत्यधिक दवा कीमत का भार केवल मरीज पर ही नहीं, बल्कि करदाताओं पर भी पड़ता है।
अदालत ने एक और व्यावहारिक समस्या की ओर ध्यान दिलाया। यदि 27 हजार रुपये एमआरपी वाली दवा कोई ईमानदार दुकानदार तीन हजार रुपये में देने को तैयार हो जाए तो मरीज को यह संदेह भी हो सकता है कि इतनी सस्ती दवा कहीं नकली तो नहीं है। इस प्रकार कृत्रिम रूप से ऊंची एमआरपी उपभोक्ताओं के विश्वास को भी प्रभावित करती है।
सरकार ने मांगा समय
केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि उन्होंने संबंधित अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर आंतरिक विचार-विमर्श किया है। उन्होंने माना कि समस्या पर विचार करने की जरूरत है और कहा कि विभिन्न हितों के बीच संतुलन बनाते हुए समाधान निकालना होगा। उन्होंने अधिकारियों के साथ आगे चर्चा करने के लिए समय मांगा।
मामला दवाओं की कीमतों, जेनेरिक दवाएं लिखने और चिकित्सा उपकरणों के मूल्य नियंत्रण से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान उठा है। अदालत ने केंद्र को अंतर-विभागीय विचार-विमर्श के लिए और समय देते हुए मामले की अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को निर्धारित की है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी सभी दवाओं पर 16 प्रतिशत लाभ-सीमा लागू करने का आदेश नहीं दिया है। अदालत ने सरकार से पूछा है कि ऐसी समान व्यवस्था क्यों नहीं बनाई जा सकती। अब केंद्र सरकार को इस पर अपना रुख और संभावित समाधान अदालत के सामने रखना है।
