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एक विदेशी नागरिक द्वारा हिंदी की सेवा

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा

यदि आपको पुस्तकों से प्रेम है तो भाषा से भी स्वतः ही प्रेम हो जाएगा -भाषा कोई भी हो I इस लेेख में हिंदी दिवस पर मैं कोई भाषण झाड़ने नहीं आया हूँ I सिर्फ एक छोटा सा संदर्भ साझा करना चाहता हूं ।
मैंने १९७९ में देहरादून के राममार्केट में अपने एक बहुत पुराने प्रेमी पुस्तक विक्रेता *संत सिंह सूरी एंड सन्स * से यह एक अंग्रेजी -हिंदी कोश खरीदा था । तो जब यह किताब निरन्तर इस्तेमाल के कारण फटने लगी तो मैंने अपने हाथ से इस पर जिल्द चढ़ाई – बेटी की पुराणी फ्राक को काटकर अपने हाथसे सिलाई कर इस पर कवर चढ़ा दिया जो आज तक चटक दिखाई देती है I किताबों पर नये वस्त्र पहराना मेरे विद्यार्थी काल से शौक रहा है – खैर, फादर कामिल बुल्के के इस शब्द कोश को खरीदने का एक मुख्य आकर्षण यह था कि देखो ! फादर कामिल बुल्के एक विदेशी होने के बावजूद उनमें हिन्दी भाषा के प्रति इतना गहरा प्रेम और सीखने की ललक है जितना किसी गैर हिन्दी भाषी भारतीय राज्य के नागरिक में भी नहीं मिलता है।


उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1945-49) से हिंदी साहित्य में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी , जो कालान्तर में मेरा भी विश्वविद्यालय रहा , बता दूं कि उनके शोध प्रबंध का शीर्षक था- *राम कथा की उत्पत्ति और विकास *, यह भी मेरा प्रिय विषय रहा है शुरू से I फादर कामिल बुल्के ने तुलसी की रचनाओं का और वाल्मीकि रामायण का भी ,गंभीरता से अध्ययन किया I प्रारम्भिक तौर पर उन्होंने हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से विशारद की परीक्षा पास की थी । साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा सन 1974 में पद्म भूषण से भीी सम्मानित किया गया था ।

बेल्जियम मे पैदा हुए कामिल बुल्के सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री पास कर १९३४ में भारत आये थे ,कुछ समय दार्जिलिंग में रहने के बाद वे गुमला (वर्तमान झारखण्ड ) में आकर एक स्कूल में गणित पढ़ाने लगे । अपनी एक किताब जिसका नाम -The Faith of Christian-Devotion to Hindi And Tilak है, में
वे लिखते हैं कि – १९३५ में जब मैं भारत पहुंचा तो मुझे यह देखकर बड़ा ताज्जुब हुआ और दुःख भी हुआ कि यहाँ के पढ़े -लिखे लोग अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं से अनविज्ञ हैं और अंग्रेजी में बोलना अपनी शान समझते हैं ।

यह देखकर उसी समय से मैंने दृढ़ संकलप किया कि मैं यहाँ की भाषा में महारत हासिल करने की कोशिश करूंगा । ” भाषा सीखकर आदमी किसी भी अपरिचित और अजनबी देश में घर जैसी निश्चिन्तता महसूस कर सकता है ,यह भाषा सीखने का सबसे बड़ा फायदा है । फादर कामिल बुल्के को किसीभी भारतीय नागरिक से अधिक भारतीयता से प्रेम रहा है।
मेरे विद्यार्थी काल में हमारे छात्रावास हालैण्ड हाल में भी एक युवा अमेरिकन पादरी हिन्दी सीखने के खातिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में हिन्दी में एम० ए० कर रहे थे ,उनका नाम इस वक्त याद नहीं आ रहा है …ऐसे एक दो हिन्दी प्रेमी विदेशियों की एक आध पुस्तकें मेरे पास हैं लेकिन उस पर चर्चा फिर कभी क्योंकि अपनी गप्प आगे भी चलती रहेगी ,आज इतना ही बहुत हो गया ।

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