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एक साल कितना बेमिसाल, कांग्रेस या माहरा का?

-दिनेश शास्त्री
उत्तराखंड कांग्रेस में आजकल “एक साल बेमिसाल” का जश्न चल रहा था लेकिन अपनों ने ही जश्न में खलल डाल दिया। आपको याद होगा ठीक एक साल पहले विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने इस्तीफा दिया तो पार्टी ने करन महरा का राजतिलक कर दिया था। यह एक साल बेमिसाल उसी की सालगिरह का जश्न था। यह साल किसके लिए बेमिसाल रहा, यह शोध का विषय हो सकता है। कांग्रेस ने इस एक साल के दौरान क्या कुछ नया किया, पार्टी को कितना संगठित किया, कितनी शिद्दत से चंपावत का उपचुनाव पार्टी ने लड़ा, निर्मला गहतोड़ी अकेले अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह में घिरी थी लेकिन पार्टी उस अंदाज में नहीं दिखी, जैसी होनी चाहिए थी। सिर्फ मुंह दिखाई के लिए नेता चंपावत का दौरा करते रहे लेकिन एक भी नेता का तेवर इस अंदाज में नहीं था जो मुकाबले का दम भरते दिखा हो। रश्मी तौर पर इस एक साल में हर मुद्दे पर कांग्रेस बिखरी ही दिखी है जबकि कांग्रेस को इतने मौके मिले कि वह सत्तारूढ़ दल की नाक में दम कर सकती थी किंतु किसी भी मौके पर पार्टी अपना प्रभाव नहीं छोड़ पाई। अंकिता हत्याकांड हो या पेपर लीक मामला अथवा बेरोजगारों का उत्पीड़न, कानून व्यवस्था, महंगाई, बिजली – पानी, स्वास्थ्य यानी की किसी भी मुद्दे पर कांग्रेस पार्टी भाजपा सरकार को नहीं घेर पाई। इस लिहाज से यह साल बेमिसाल तो नहीं कहा जा सकता। हां पार्टी के भीतर मची अफरा तफरी के लिहाज से जरूर ये एक साल बेमिसाल रहा है। प्रदेश कांग्रेस प्रमुख जिस तरह से साल भर मेंढक तौलते रहे, उसमें वह काफी हद तक सफल रहे हैं।
कांग्रेस की मौजूदा स्थिति यह है कि यहां कौन अपना है, कौन पराया, यह भेद करना काफी कठिन सा है। महरा ने निसंदेह इस एक साल में आग के दरिया में चल कर दिखाया है। पार्टी में जितने नेता, उतने गुट गिने जा सकते हैं। हरिद्वार में पंचायत चुनाव के समय भी पैसे लेकर टिकट देने के आरोप लगे थे तो हाल में पैसे लेकर पद देने के आरोप भी लगे। हालांकि यह आरोप इस लिहाज से खारिज किए जा सकते हैं कि जिन लोगों की मुराद पूरी नहीं हुई, वे नेतृत्व पर सवाल खड़े करते हैं, हो सकता है रुड़की महानगर अध्यक्ष की नियुक्ति के मामले में भी इसी कारण आरोप चस्पा किया गया हो लेकिन उसी प्रकरण में जब रुड़की के कुछ नेता प्रदेश नेतृत्व से मिलने देहरादून आए और उन्होंने बंद कमरे में अपनी बात रखी तो बेमिसाल का दावा जरूर कमजोर सा दिखा। इस बीच दूसरा बम किच्छा के विधायक और नामी कांग्रेस नेता ने फोड़ डाला। उनकी नाराजगी भी नगर अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को लेकर थी और मीडिया से बात करते हुए वे भी पैसे लेकर पद देने का आरोप लगा चुके हैं। यद्यपि बेहड़ की नाराजगी को देखते हुए और केंद्रीय पर्यवेक्षक के आने की खबर के बाद आनन फानन में प्रदेश अध्यक्ष उन्हें मानने पहुंचे। फिलहाल तो बेहड को शांत कर दिया गया है लेकिन यह शांति कब तक रहेगी, कहा नहीं जा सकता। वजह यह है कि अंदर ही अंदर कांग्रेस में काफी कुछ सुलग रहा है।
पार्टी में आलम यह है कि पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और चकराता के विधायक प्रीतम सिंह ने प्रदेश प्रभारी के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है तो दूसरे कई लोगों ने भी आलाकमान के सामने शिकायतों का अंबार लगा दिया। इनमें से ज्यादातर लोग खुद सामने नहीं आए लेकिन आलाकमान को विवश कर दिया कि वह आग में पानी डालने के लिए आगे आए। पानी सिर के ऊपर से गुजरने लगा तो आखिरकार आलाकमान ने पी.एल. पूनिया को पर्यवेक्षक बना कर देहरादून भेजा। पूनिया शनिवार को प्रदेश अध्यक्ष और अन्य नेताओं से जमीनी हकीकत जानते रहे और रविवार को उन्होंने प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी के शीर्ष नेताओं से मुलाकात की। इस दौरान प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव, प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा, नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य, पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह मौजूद रहे समेत तमाम नेता मौजूद थे। पर्यवेक्षक से बात करने वालों में सभी संगठनात्मक जिलों के जिलाध्यक्ष एवं विधायक, पूर्व विधायक, विधायक प्रत्याशी, पूर्व सांसद, सांसद प्रत्याशी भी शामिल थे।

पूनिया पार्टी को कितना एकजुट कर पाएंगे, अथवा उनकी नसीहत पर कांग्रेस के लोग कितना अमल करेंगे, यह तो समय ही बताएगा लेकिन प्रकट तौर पर पूनिया प्रदेश में निकट भविष्य में होने वाले निकाय चुनाव एवं अगले साल के लोकसभा चुनाव के मद्देनजर प्रदेश कांग्रेस की तैयारी एवं संगठन की गतिविधियों पर हिदायत तो से ही चुके हैं। पूनिया ने यह जरूर आगाह किया कि प्रदेश के ज्वलंत मुद्दों पर लगातार कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व नजर बनाए हुए है और यहां के घटनाक्रमों को लेकर गम्भीर है। अंकिता भण्डारी हत्याकांड हो, चाहे प्रदेश में व्याप्त भर्ती घोटाला या फिर चाहे जोशीमठ भू-धसाव कांग्रेस आलाकमान लगातार अपनी चिंता भी जाहिर करता रहा है। पूनिया देहरादून के जिस होटल में ठहरे हुए थे, कल से ही वहां एक के बाद एक नेता उनसे मिलते रहे। कुछ लोग समूह में भी मिले। लोगों ने उनके सामने अपने गिले शिकवे भी रखे। पूनिया पार्टी को कितना एकजुट कर पाए, इसका अंदाजा अगले कुछ दिन में दिखने लगेगा।
एक बात तो साफ तौर पर कही जा सकती है कि उत्तराखंड में कांग्रेस का मजबूत जनाधार कायम है, अगर ऐसा न होता तो पार्टी में पदों के लिए इस कदर मारामारी न होती। हालांकि वह चुंबकीय आकर्षण मौजूदा दौर में बेशक निकाय चुनाव के कारण हो, लेकिन कुछ तो बात है जो अन्य राज्यों की तुलना में यहां पार्टी की जड़ें गहरी हैं। कमजोरी है तो सिर्फ यह कि नेताओं की आपसी लड़ाई से पार्टी कमजोर हुई है। वैसे भी एक आम धारणा है कि कांग्रेस को जनता नहीं, नेता हराते हैं, हालांकि इस बारे में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन वस्तुस्थिति इस तथ्य के काफी करीब रहती आई है और कई बार इस तथ्य को सत्य होते देखा भी गया है।
बहरहाल कांग्रेस के सामने निकाय चुनाव प्रदेश नेतृत्व के लिए अग्निपरीक्षा के रूप में आ रहे हैं। लोकसभा चुनाव तक क्या कुछ होगा, इस पर नजर सबकी रहेगी। तब तक कांग्रेस नेताओं के मिजाज पर आप भी नजर बनाए रखिए।

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