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हनुमान जैसा उजला चरित्र का पात्र एक निराला चरित्र- धार्मिक साहित्य में दूसरा नहीं

-गोविन्द प्रसाद बहुगुणा –

धार्मिक साहित्य में हनुमान जैसा उजला चरित्र का पात्र मैंने दूसरा कोई नहीं देखा। मैं तुलसीदास जी के काव्य शिल्प का मुरीद हूं जिन्होंने साधारण बोलचाल की भाषा में गंभीर विषयों की हृदयग्राही विवेचना की है जिसका प्रमाण रामचरितमानस है।
सिद्धबली हनुमान विनम्रता का प्रतीक है। बलि तो दुनिया में बहुत से हुए हैं लेकिन सिद्धबली सिर्फ हनुमान ही हुए ,उन्होने जो प्रोजेक्ट हाथ में लिया अथवा जिस अभियान का नेतृत्व किया उसमें पूरी तरह सफल हुए लेकिन उसमें अहंकार जरा भी नहीं छू पाया।

दुनिया के बड़े बड़े महाबलियों में कुछ न कुछ कमियां थी जिसकी वजह से उनका पतन हुआ। यूनानी धर्मकथा में एक पात्र हुआ ‘Achilles जो अप्रतिम सौन्दर्य, शौर्य और युद्ध विजय का देवता माना जाता था लेकिन उसकी एड़ियों (heels} में एक शारीरिक तकलीफ़ थी जिसकी वजह से वह महाबलशाली होने के बावजूद युद्ध में हारा और मारा गया।उसके नाम से फिर एक मुहावरा ही बन गया “Achilles heel” …इसी तरह रावण क्या कम बलशाली था लेकिन उसके चरित्र में उसकी सबसे बड़ी कमी उसका अहंकार था, जो उसके पतन का कारण बना।

आधुनिक इतिहास में महान सेनापति नैपोलियन को भी यही तकलीफ थी । लंका का भेद लेना कोई आसान काम नहीं था लेकिन हनुमान ने अपनी बुद्धि कौशल से रावण के घर और राज-व्यवस्था की सारी अंदरुनी जानकारी एक ही visit में एकत्रित कर दी । जिसके कारण राम को लंका विजय का अभियान आसान और सफल हो गया। उसने विभीषण को कहा बन्धु , हम तो साधारण आदमी हैं ,मुझे कोई नहीं जानता- अरे हमारा नाम लोगे तो कोई खाने के लिए भी नहीं पूछेगा,भूखे रह जाओगे- “प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा॥” हम तो राम के सेवक हैं, उसकी शरण ग्रहण करो तुम्हारे सब कष्ट दूर हो जायेंगे -इस प्रकार हनुमान ने रावण के घर तक पहुंच बनाई। हनुमान में एक और खूबी यह थी कि वह शब्दों का सही समय पर सही प्रयोग करना जानते थे ,यह कौशल हर किसी बलवान में नहीं मिलता

-एक छोटा सा उदाहरण -जब हनुमान की सीता जी से पहली बार अशोक वाटिका में भेंट हुई थी तो उसने सोचा एक मायावी राक्षस के द्वारा छली गयी इस स्त्री को कैसे विश्वास दिलाएं कि मैं राम का भेजा हुआ दूत हूँ ? तब उसने कहा -“रामदूत मैं मातु जानकी सत्य सपथ करुनानिधान की ‘-माता जी मैं उन्हीं राम का भेजा दूत हूँ जो आपको जानकी कहकर सम्बोधित करते हैं और आप भी उनको परिहास में करुनानिधान कह देती थी ” पति पत्नी के इस एकदम private संवाद का प्रयोग करके हनुमान की पहचान आसान हो गयी

-यह बात यह भी प्रमाणित करती है कि राम और हनुमान में बहुत घनिष्ट सम्बन्ध थे -इसका कारण एक यह भी था कि उनकी मैत्री निस्वार्थ थी -बाकी सुग्रीव और विभीषण तो अपने स्वार्थ के कारण उनसे जुड़े थे —
हनुमान ने कभी यह नहीं कहा की मैंने राम के लिए ये किया वो किया, ऐसे तो सिर्फ छोटी अक्ल के , अकुलीन, अशिक्षित और घमंडी लोग ही करते हैं जो दूसरों के किए हुए काम को, अपना बनाकर श्रेय लूटते हैं, अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।२७।।अ०३ जैसे कि आप वर्तमान तथाकथित अमृत काल में देख ही रहे हैं ।

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