जयंती पर बिशेष : मात्र 16 वर्ष की उम्र में क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आ गये थे शहीदे आज़म भगत सिंह
-अनंत आकाश-
आज शहीदे भगत सिंह जी की जयंती पूरे देश में मनाई जा रही है। भगतसिंह का जन्म 28 सितम्बर, 1907 को क्रांतिकारियों के परिवार में हुआ था। उनके पिता सरदार किशन सिंह ,उनके चाचा अजित सिंह एवं स्वर्ग सिंह थे। दादा अर्जुन सिंह क्रान्तिकारी विरासत से थे ।

जिनकी पीढ़ियां देश के लिऐ समर्पित थी, इसलिये भगतसिंह के मन-मस्तिष्क पर देश की आजादी का जज्बा बचपन से ही था। 1923 में 16 वर्ष की छोटी-सी आयु में नेशनल कॉलेज, लाहौर में पढ़ाई के दौरान जन-जागरण आधारित ड्रामा-क्लब में भाग लेना शुरू कर दिया था। वहीं से उनका सम्बंध क्रांतिकारियों और इसके लिऐ प्रेरित करने वाले अध्यापकों से जुड़ गया जिन्होंने उन्हें आजादी मुक्ति संघर्ष में जुड़ने के लिऐ उन्हें प्रेरित किया भगतसिंह बहसों और अध्ययन में काफी रुचि रखते थे ।
उन्होने स्कूल की पढ़ाई छोड़कर कानपुर जाकर गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार ‘प्रताप’ में काम करना शुरू कर दिया। वहीं पर उनकी मुलाकात बटुकेश्वर दत्त, शिव वर्मा और विजय कुमार सिन्हा जैसे क्रांतिकारियों से हुई। 1926 में भगतसिंह और उनके साथियों ने नौजवान भारत सभा का गठन किया। साइमन कमीशन के विरोध में जलूस का नेतृत्व करते हुऐ 17 नवम्बर 1928 को लाला लाजपतराय की पुलिस की बर्बरतापूर्ण कार्यवाही के कारण मृत्यु ,जिसका बदला लेने के लिऐ 17दिसम्बर 1928 को लाहौर में साण्डर्स की हत्या की, ट्रेड डिस्टप्यूट एक्ट के खिलाफ 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली एसम्बेली बमकाण्ड में उनकी बहादुराना कार्यवाही जगजाहिर है । 23 मार्च 1923 को सुखदेव तथा राजगुरू के साथ उनको लाहौर में फांसी हुई ।
फांसी से पूर्व तीन क्रान्तिकारियों ने ये पंक्तियाँ गायीं
“दिल से निकलेगी न मरकर वतन की उल्फत।
मेरी मिट्टी से भी खुस्बुए बतन आयेगी।
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद ।
इन्कलाब जिंदाबाद ।।
