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7 अक्टूबर  जयंती पर विशेष ;  एक साधारण सी असाधारण क्रान्तिकारी थी दुर्गा भाभी

-अनंत आकाश-
इतिहास में ऐसा भी क्षण आया जब एक साधारण से दिखने वाली महिला ने वह  कर दिखाया जो बड़े बड़े तुर्मखां करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।  उस साधारण सी दिखने वाली असाधारण महिला दुर्गा भाभी इतिहास हमेशा याद रखेगा।

दुर्गा भाभी ने साण्डर्स की हत्या के बाद राजगुरू और भगतसिंह को लाहौर से अंग्रेजों की कड़ी चौकसी के बावजूद उन्हें सुरक्षित निकालकर कोलकत्ता पहुंचाया । इनके पति क्रन्तिकारी भगवती चरण वोहरा थे जो रेलवे में इन्जीनियर थे। पिता बांके विहारी भट्ट कलैक्टैट में नाजिर थे । ये भी कहा जाता है कि चंद्रशेखर आजाद के पास आखिरी वक्त में जो माउजर (पिस्टल) थी, वह  भी दुर्गा भाभी ने ही उनको दिया था ।

उनका जन्म 7 अक्टूबर 1906 कौंशा शाहजहांपुर में हुआ तथा 14अक्टूबर 1999 गाजियाबाद में वह  इस दुनिया से गुमनाम ही विदा हो गयी । कुछ एक दो अखबारों में ही उनके निधन की थोड़ी बहुत चर्चा हुई । आज़ादी के लम्बे समय के बाद भी इस वीरांगना को वह  जगह नहीं मिली जिसकी वह  सही मायनों में हकदार थी। उनकी कुर्बानियों को भुला दिया गया । जबकि  माफीवीरों के महिमामंडन की होड़ लगी रहती है।

कुछ ऐतिहासिक तथ्य :-

(1)1930 में भगत सिंह व उनके साथियों को फांसी की सजा की घोषणा हो चुकी थी।
(2) दुर्गा भाभी, सुखदेवराज और स्वामीराव के बीच तय हुआ कि वे फांसी के फैसले का बदला लेने के लिए बॉम्बे में गवर्नर को गोली मारेंगे।
(3) गाड़ी लेमिंगटन रोड पहुंची तो अंग्रेज सार्जेन्ट से मुठभेड़ हो गई, जिसमें स्वामीराव के आदेश पर सार्जेंट को दुर्गा भाभी और सुखदेवराज ने गोली मार दी।

(4) बॉम्बे में सावरकर बंधुओं को दुर्गा भाभी ने गोलीकांड की रात बाम्बे में वी डी सावरकर के घर पहुंचकर अपने चार वर्षीय बेटे शची को उनके घर छोड़ दिया यह कहकर कि चार दिन में वापस ले जाएंगी। वह  कल्याण से मेरठ की गाडी पकड़कर फरार हो गईं।

(5) अगले दिन अखबार में खबर छपी कि सार्जेंट की हत्या में एक स्त्री भी शामिल थी। इसके बाद दुर्गा भाभी के बालक को  रघुनाथ वैशम्पायन के घर भेज दिया।

क्रान्तिकारी दुर्गा भाभी, भगवती चरण बोहरा को सादर नमन ।

(इस लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं  जिनसे एडमिन का पूर्णतः सहमत होना जरूरी नहीं है।)

 

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