ब्लॉग

आल इंडिया रेडियो से आकाशवाणी और फिर एफ एम चैनल तक लम्बी छलांगे

 

The first private company to broadcast daily news and other subjects was the Indian Broadcasting Company. It was established on 23rd July, 1927. It was bought by the British and renamed to All India Radio. In the year 1956, AIR was renamed to Akashvani on the suggestion of the famous poet Pandit Narendra Sharma.

 

-उषा रावत –

1890 के दशक के मध्य में, भौतिकविदों द्वारा विद्युत चुम्बकीय तरंगों का अध्ययन करने के लिए उपयोग की जाने वाली तकनीकों के आधार पर, गुग्लिल्मो मार्कोनी ने लंबी दूरी के रेडियो संचार के लिए पहला उपकरण विकसित किया। 24 दिसम्बर 1906 की शाम कनाडाई वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेसेंडेन ने जब अपना वॉयलिन बजाया और अटलांटिक महासागर में तैर रहे तमाम जहाजों के रेडियो ऑपरेटरों ने उस संगीत को अपने रेडियो सेट पर सुना, वह दुनिया में रेडियो प्रसारण की शुरुआत थी। इतालवी आविष्कारक गुग्लिल्मो मार्कोनी (दाईं ओर चित्रित) ने पहली बार 1890 के दशक में रेडियो या वायरलेस टेलीग्राफ का विचार विकसित किया था। उनके विचारों को 1895 में आकार मिला जब उन्होंने एक किलोमीटर से अधिक दूर एक स्रोत पर एक वायरलेस मोर्स कोड संदेश भेजा।

 

रेडियो का दूसरा नाम आकाशवाणी एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है ‘आकाशीय / आकाश से आवाज’ या ‘आकाशीय आवाज’। आज फिर से रेडियो श्रोताओं के दिलों में अपनी जगह बना रहा है। रेडियो सस्ते दामों में उपलब्ध होता है और गाँवों के दुर्गम स्थानों तक इसकी पहुंच है। यह विभिन्न भाषाओं और शैली में कार्यक्रम प्रसारित करता है। इसे यात्रा करते वक्त या अन्य कार्य करते हुए भी सुन सकते हैं। बिजली रहे या नहीं यह बैटरी से भी चल सकता है। अपने घर, दफ्तर ही नहीं कार, बस सहित विभिन्न वाहनों में तो लोगों को बड़े चाव से रेडियो सुनते देखा जा  सकता है। साथ ही, मोबाइल हैंड सेट से लेकर दूर दराज के गाँवों में भी रेडियो की दिलकश आवाज़ कानों में गूंजती है।  लेकिन कुछ साल  पहले बहुत से लोगों के मन में यह आशंका उत्पन्न होने लगी थी कि रेडियो कहीं इतिहास बनकर न रह जाए। कभी देश-विदेश में अपनी धाक ज़माने और जंगल में मंगल करने वाले रेडियो को लेकर ऐसी आशंका बेवजह नहीं थी। इस आशंका का पहला कारण था विश्व भर में टेलीविजन और उसके विभिन्न किस्म के सैकड़ों चैनल का आना और दूसरा मोबाइल सहित और भी कई माध्यमों से संगीत से लेकर समाचारों तक लगभग हर जगह सीधे पहुँच जाना।  फिर संचार माध्यम के इस शक्तिशाली और खूबसूरत साधन रेडियो के प्रति ऐसी धारणा सिर्फ हमारे देश में ही नहीं दुनिया के और भी कई देशों में बनने लगी थी, लेकिन बहुत से लोग चाहते थे कि रेडियो अतीत बनकर न रह जाए।

 

रेडियो श्रोताओं को उनके धर्म, शिक्षा के स्तर, वित्तीय स्थिति, जनजाति, नस्ल या लिंग के बावजूद स्वतंत्रता देता है। इसके अलावा, कुछ देशों में अलग-अलग बोलियाँ या भाषाएँ हैं। यह एक और तरीका है जिससे स्थानीय स्टेशन अभी भी प्रासंगिक हैं। 5G नया रेडियो वास्तव में संचार प्रणालियों का भविष्य है। यह तकनीक उच्च गति, निर्बाध सिग्नल ट्रांसमिशन, कम अंतराल समय और कम नेटवर्क हानि जैसी खूबियों के साथ आभासी और संवर्धित वास्तविकता अनुप्रयोगों को भौतिक रूप से साकार करने में मदद करती है। स्पेन रेडियो की ओर से संयुक्त राष्ट्र संघ में यह प्रस्ताव आया कि वर्ष में एक दिन विश्व में रेडियो दिवस के रूप में मनाया जाना चाहिए।  स्पेन के इस प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र ने व्यापक स्तर पर एक सर्वेक्षण कराने के साथ बहुत से देशों के प्रसारण संस्थानों के विचार सुने तो 91 प्रतिशत लोगों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। उसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने अपनी 36वीं आम सभा में 13 फरवरी 2011 को विश्व रेडियो दिवस मनाने की घोषणा कर दी। इसके लिए 13 फरवरी की तारीख रखने का विशेष कारण यह था कि संयुक्त राष्ट्र संघ के अपने यू एन रेडियो की स्थापना 13 फरवरी 1946 को हुई थी।

भारत में रेडियो

जेसी बोस एक भारतीय वैज्ञानिक थे जिन्होंने 19वीं शताब्दी में रेडियो और वायरलेस संचार का बीड़ा उठाया था। उनके सफल प्रयोगों के 100 से अधिक वर्षों के बाद भी उनका कार्य प्रासंगिक बना हुआ है। जुलाई 1923 में जब भारत पर ब्रिटिश का राज था उसी समय भारत में रेडियो प्रसारण की बात शुरू हुई जो 23 जुलाई 1927 को बम्बई में (आज का मुम्बई) इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी के नाम से शुरू हुई, 26 अगस्त 1927 को कलकत्ता से (आज का कोलकाता) भी रेडियो प्रसारण शुरू हो गए।  भारत में रेडियो प्रसारण की पहली शुरुआत जून 1923 रेडियो क्लब मुंबई द्वारा हुई थी लेकिन इंडियन ब्रॉडकास्ट कंपनी के तहत देश के पहले रेडियो स्टेशन के रूप में बॉम्बे स्टेशन तब अस्तित्व में आया जब 23 जुलाई 1927 को वाइसराय लार्ड इरविन ने इसका उद्घाटन किया । 1930 में इसका राष्ट्रीयकरण हुआ और तब इसका नाम भारतीय प्रसारण सेवा (इण्डियन ब्राडकास्टिंग कॉरपोरेशन) रखा गया। बाद में 1957 में इसका नाम बदल कर आकाशवाणी रखा गया।  प्रसार भारती अधिनियम 15 नवंबर, 1990 को लागू हुआ था। आंतरिक आदेश में कहा गया है, ‘उपरोक्त वैधानिक प्रावधान, जिसके तहत ऑल इंडिया रेडियो का नाम बदलकर ‘आकाशवाणी’ कर दिया था, को सभी के संज्ञान में लाया जा सकता है ताकि नाम और शीर्षक संसद द्वारा पारित प्रसार भारती अधिनियम 1997 के प्रावधानों के अनुरूप हो सकें। सन 1947 में देश के विभाजन के समय भारत में कुल 9 रेडियो स्टेशन थे, जिनमें पेशावर, लाहौर और ढाका तीन पाकिस्तान में चले गए, भारत में दिल्ली, बॉम्बे, कलकत्ता, मद्रास, तिरुचिरापल्ली और लखनऊ के 6 केंद्र रह गए, लेकिन आज देश में रेडियो के कुल 420  प्रसारण केंद्र हैं और आज देश की 99.20 प्रतिशत जनसँख्या तक आल इंडिया रेडियो का प्रसारण पहुँच रहा है।

 

 सन 1990 के बाद जब देश में दूरदर्शन के साथ कई समाचार और मनोरंजन चैनल्स ने अपने पाँव ज़माने तेज कर लिए तो रेडियो की लोकप्रियता धीरे धीरे कम होने लगी, तभी लगा कि यही हाल रहा तो रेडियो को लोग भूल ही जायेंगे। यह रेडियो के लिए निश्चय ही बड़ी चुनौती का समय था। एक ऐसी चुनौती, जहाँ करो या मरो जैसी परिस्थितियां बन गयीं थीं। अच्छी बात यह है कि रेडियो ने इस बात को समझते हुए एक साथ कई बड़े कदम उठाने आरम्भ कर दिए जिससे आज रेडियो का अस्तित्व के साथ इसकी अहमियत और लोकप्रियता भी बरक़रार है। समय के साथ कदम ताल मिलाते हुए रेडियो ने जहाँ अपने कार्यक्रमों में कई व्यापक बदलाव किये वहां देश में कई निजी एफ एम चैनल्स के साथ ऑल इंडिया रेडियो के अपने एफ एम गोल्ड और रेनबो जैसे आधुनिक चैनल्स भी शुरू कर दिये गए। इन एफ एम चैनल्स को जहाँ युवा पीढ़ी ने बहुत पसंद किया वहीं पुरानी पीढ़ी के लिए भी इन चैनल्स में उनके पसंद और महत्‍व के कई प्रसारण रखे गए।

 

रेडियो लोक प्रसारक होने के कारण समाचार और सामायिक विषयों पर वार्ता के साथ गीत, संगीत, स्वास्थ्य, शिक्षा, करियर, खेल, साहित्य, सिनेमा और मनोरंजन सहित सभी विषयों पर विभिन्न कार्यक्रम प्रसारित करता है। साथ ही, रेडियो ने अपने नाटकों रूपकों की गौरवशाली परंपरा को भी रखा है।  एम गोल्ड और रेनबो के साथ इन्द्रप्रस्थ और राजधानी चैनल्स के कितने ही कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हैं, जिनमें युववाणी के महफ़िल जैसे कार्यक्रमों से लेकर शाम मस्तानी, गा मेरे मन गा, वो जो एक फिल्म थी और बहारें हमको ढूंढेंगी तक बहुत से कार्यक्रम हैं, जिनमें गुड मॉर्निंग इंडिया, हमकदम, दिल्लीनामा, संदेश टू सोल्जर, गाने सुहाने, महफिले कव्वाली, कलाकार बेमिसाल और दिल ही तो है जैसे कार्यक्रम भी हैं।

आपदा समय का साथी भी है रेडियो

रेडियो प्राकृतिक आपदाओं में मुख्य रूप से घटित होने वाली आपदा और उसके प्रथम चरण के दुष्प्रभावों के बारे में समाचार फैलाने का एक अनूठा माध्यम है। रेडियो आपदा समय में भी एक  मदद्गार साथी बन सकता है।  आपदा के समय जैसे भूकंप, सुनामी या बाढ़ आदि में भी रेडियो काफी मददगार रहता है। ऐसे समय में जब बिजली आदि भी चली जाती है तो बैटरी चलित रेडियो के माध्यम से मुसीबत में फंसे लोग मार्गदर्शन के साथ सही सूचनाएं भी प्राप्त कर सकते हैं। सभी लोगों को शिक्षित करने के लिए आपदा प्रबंध पर नियमित रूप से विशेष कार्यक्रमों का प्रसारण भी करते हैं। रेडियो हमेशा श्रोताओं को आपदाओं के बारे में शिक्षित करके आपदा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है; खतरों की चेतावनी; प्रभावित क्षेत्रों के बारे में जानकारी एकत्र करना और प्रसारित करना; अधिकारियों, राहत गैर सरकारी संगठनों और जनता को विशिष्ट आवश्यकताओं के प्रति सचेत करना; और चर्चाओं को सुविधाजनक बनाना।

विदेश प्रसारण सेवा

 

 आल इंडिया रेडियो की विदेश प्रसारण सेवा ने भी लगभग पूरी दुनिया को अपने साथ जोड़ते हुए अपनी सफलता की उल्लेखनीय कहानी लिखी है। हालांकि विदेश प्रसारण के अधिकांश कार्यक्रमों का प्रसारण भारत में नहीं होता इसलिए देश का एक बड़ा वर्ग इस ऐतिहासिक प्रसारण सेवा से कुछ अनभिज्ञ सा है, लेकिन विश्व में बसे अनेकों अप्रवासी भारतीयों के लिए यह घर से दूर एक घर जैसा अहसास है, साथ ही उन अन्य विदेशी श्रोताओं के लिए तो यह सेवा एक वरदान जैसी है जो भारत को अधिक से अधिक जानने के लिए लगातार उत्सुक रहते हैं।

भारत में विदेश प्रसारण सेवा का आरम्भ सन 1939 के उन दिनों में ही हो गया था जब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। इससे पहले सन 1938 में बीबीसी ने पहली विदेश प्रसारण सेवा अरबी भाषा में शुरू की थी। उस दौर में हिन्दुस्तान पर इंग्लैंड का राज था। उधर विश्व युद्ध के दौरान जर्मन रेडियो भारत और सहयोगी सेनाओं के विरुद्ध प्रचार कर रहा था। उस प्रचार के खंडन-प्रतिकार के लिए ऑल इंडिया रेडियो की भी विदेश प्रसारण सेवा शुरू कर दी गयी। इस सेवा का प्रथम प्रसारण 1 अक्तूबर 1939 को पश्तो भाषा में आरम्भ हुआ। पश्तो में इसलिए क्योंकि जर्मन रेडियो का यह प्रचार अफगानिस्तान में अधिक हो रहा था इसीलिए हमारे यहाँ से भी उसका जवाब अफगानिस्तान की भाषा में दिया गया। कुछ दिन बाद वहां की एक और भाषा दारी में भी यह सेवा शुरू की गयी।इस सेवा का उद्देश्य तब विरोधी देशों के गठबंधन दलों को प्रत्युत्तर देना ही था। इसलिए जैसे जैसे यह युद्ध जहां जहां फैलता गया वैसे वैसे ऑल इंडिया रेडियो उन उन भाषाओँ में भी अपना विदेश प्रसारण आरम्भ करता गया। इससे सन 1945 यानी द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक विदेश प्रसारण सेवा 42 भाषाओँ में पहुँच गयी। जिनमें चाइनीज,थाई,बलूची,बर्मीज जैसी भाषाएँ भी थीं।

आज ऑल इंडिया रेडियो का  विदेश प्रसारण विभाग विश्व के 139 देशों में अपना प्रसारण कर रहा है। जिसमें 27 भाषाओँ में प्रतिदिन 72 घंटे का प्रसारण होता है.इन 27 भाषाओँ में 12 भारतीय भाषाएं हैं और 15 विदेशी भाषा।विदेश प्रसारण सेवा में हिंदी सेवा भी काफी अहम् है।ऑल इंडिया रेडियो ने विदेशों के लिए अपना हिंदी प्रसारण स्वतंत्रता पूर्व 1944 में ही आरम्भ कर दिया था।आज इसके 5 ट्रांसमिशंस पूर्व और दक्षिण पूर्व एशिया,अफ्रीका,पश्चिम यूरोप,गल्फ और ओसीनिया देशों के लिए प्रतिदिन 8 घंटे का प्रसारण कर रहे हैं।

लेकिन रेडियो की कुछ सीमाएं भी हैं। रेडियो की पहली सीमा यह है कि इसमें श्रोता को पूरी तरह से अपनी श्रवण शक्ति पर निर्भर रहना पड़ता है। जबकि उसके पास आंख, नाक जैसी इंद्रियां भी हैं। ऐसे में अगर श्रोता से कोई भी चीज छूट जाए या किसी कारण से कोई चीज समझ में न आए तो प्रसारण प्रभावी नहीं रह जाता।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!