प्रदूषण से बचिए और बचाइए , ग्रीन पटाखों से करिये उल्लास का इजहार

-By -Usha Rawat
अपने देश में दशहरा, दिवाली और अन्य त्योहारों और शादी-ब्याह पर पटाखे छोड़ने की परंपरा रही है, लेकिन इन पटाखों की वजह से होने वाले प्रदूषण को हमने हमेशा नजरअंदाज किया गया। इसे देखते हुए CSIR ने ग्रीन पटाखों का फॉर्मूला तैयार किया। इनमें आवाज करने वाले पटाखे, फ्लावर पॉट, पेंसिल, चक्करघिरनी और फुलझड़ियां शामिल हैं।
कम उत्सर्जन वाले/ग्रीन पटाखे विकसित करने के लिए आठ प्रयोगशालाएं सीएसआईआर-एनईईआरआई, सीईईआरआई, आईआईटीआर, आईआईसीटी, एनसीएल, सीईसीआरआई, एनबीआईआई और सीएचएमआईआई साथ आईं। इस पूरी कवायद का समन्वय सीएसआईआर-एनईईआरआई ने किया।

काउंसिल ऑफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (CSIR) के वैज्ञानिकों का ये मानना है चूंकि ये पटाखे एन्वायर्नमेंट को कम नुकसान पहुंचाते हैं और पर्यावरण से हरा रंग जुड़ा है। इसलिए इन्हें ग्रीन क्रैकर्स का नाम मिल गया। यही वजह है कि ये पटाखे वायु को कम प्रदूषित करते हैं. ग्रीन पटाखे ना सिर्फ आकार में छोटे होते हैं, बल्कि इन्हें बनाने में रॉ मैटीरियल (कच्चा माल) का भी कम इस्तेमाल होता है।
नई आतिशबाजियों से होने वाले उत्सर्जन के परीक्षण की सुविधाएं सीएसआईआर-एनईईआरआई के साथ-साथ उनके द्वारा अनुमोदित राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशशोधन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (एनएबीएल) में उपलब्ध हैं, जिसकी सूची सीएसआईआर-एनईईआरआई की वेबसाइट पर उपलब्ध है। इसके साथ ही, कच्चे माल के संरचनात्मक परीक्षण (रेस) की सुविधा शिवकाशी में शुरू की गई है। इसका उद्देश्य निर्माताओं को कच्चे माल और रसायन के परीक्षण की सुविधा उपलब्ध कराना है। ग्रीन पटाखों के लिए निर्धारित दिशानिर्देश के अनुसार आतिशबाजी निर्माताओं को नए और बदले गए फॉर्म्यूलेशन के लिए लगभग 530 उत्सर्जन परीक्षण प्रमाणपत्र जारी किए गए हैं।
2018 में पेश की गई, हरित पटाखों की अवधारणा में अनिवार्य रूप से वैकल्पिक कच्चे माल का उपयोग शामिल है – जिसे पर्यावरण पर कम प्रभाव डालने के लिए डिज़ाइन किया गया है – इस प्रक्रिया में, स्वास्थ्य जोखिम और मनुष्यों के लिए खतरों को कम किया जाता है।
इसका रासायनिक फॉर्मूलेशन वातावरण में कण उत्सर्जन को कम करने की गारंटी देता है. देश में तीन तरह के ग्रीन पटाखे होते हैं। स्वास (SWAS) स्टार (STAR) और सफल (SAFAL). ग्रीन पटाखों से निकलने वाली धूल दब जाती है, जिसकी वजह से हवा में पटाखों के कण कम उत्सर्जित होते हैं।
जहां नियमित पटाखे लगभग 160 डेसिबल ध्वनि उत्सर्जित करते हैं, वहीं हरित पटाखों की उत्सर्जन दर 110-125 डेसिबल तक सीमित है। ऐसा माना जाता है कि पारंपरिक पटाखों की तुलना में हरे पटाखे 30% कम कण प्रदूषण फैलाते हैं।
शनल एन्वॉयरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट (CSIR-NEERI) के मुताबिक ‘ऐसे पटाखे जिनसे रेगुलर पटाखों के मुकाबले कम प्रदूषण हो, हवा में पार्टिकुलेट मैटर यानी PM में 30 से 40 प्रतिशत की कमी आए, सल्फर डाई ऑक्साइड और नाइट्रोजन डाई ऑक्साइड घटे और दूसरी खतरनाक गैसों में भी 10 प्रतिशत की कमी हो’। इन मानकों पर खरा उतरने वाले पटाखों को ही ग्रीन क्रैकर्स कहा जाता है।
कई इतिहासकारों का मानना है कि आतिशबाजी का विकास मूल रूप से ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में प्राचीन लियुयांग, चीन में हुआ था। ऐसा माना जाता है कि पहले प्राकृतिक “पटाखे” बांस के डंठल थे, जिन्हें जब आग में डाला जाता था, तो बांस की खोखली हवा की जेबों के अधिक गरम होने के कारण धमाके के साथ फट जाते थे।
