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भयंकर मानव संहारक साबित हो रहा है प्रदूषण : Pollution is proving to be a terrible human killer.

                                प्रदूषण के मानव संहारक खतरे को लेकर राष्ट्रीय सहारा के हस्तक्षेप में 4  नवंबर 2023  को प्रकाशित जयसिंह रावत का लेख। 

The pollution hazard is increasing all over the world due to various reasons. There are human reasons and natural reasons also. According to a report by “The Lessant”, one of the world’s oldest health magazines, the world’s most populous countries China and India are most affected by the havoc of pollution. Since India has left China behind in terms of population, the era of pollution has also left China behind and has made India its first target. This makes it clear that the risk of pollution is increasing due to the increasing population and excessive interference with nature or excessive pressure on resources to meet the increasing needs of the population and its comforts.

–जयसिंह रावत

दुनियाभर में विभिन्न कारणों से प्रदूषण का कहर बढ़ता जा रहा है। इनमें मानवीय कारण भी हैं तो प्राकृतिक कारण भी हैं। विश्व की सबसे पुरानी स्वास्थ्य पत्रिकाओं में से एक ‘‘द लैसेंट’’ की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व के सर्वाधिक आबादी वाले देश चीन और भारत प्रदूषण के कहर से सर्वाधिक प्रभावित हैं। चूंकि जनसंख्या के मामले में भारत ने चीन को पीछे छोड़ दिया है तो प्रदूषण के काल ने भी चीन को पीछे छोड़ कर भारत को अपने पहले निशाने पर ले लिया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि बढ़ती आबादी और आबादी की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने तथा उसकी सुख सुविधाओं के लिये प्रकृति के साथ बेतहासा छेड़छाड़ या संसाधनों पर अत्यधिक दबाव के कारण प्रदूषण का खतरा ज्यादा बढ़ रहा है।

लैसंेट पत्रिका द्वारा गठित लैसेंट कमीशन के एक नए अध्ययन के अनुसार प्रदूषण के कारण विश्व में 2019 में 90 लाख और भारत में 23 लाख से अधिक लोगों की असामयिक मृत्यु हुई। जबकि चीन में प्रदूषण से लगभग 21 लाख लोगों की मौत हुयी। रिपोर्ट के अनुसार भारत में लगभग 16 लाख मौतें अकेले वायु प्रदूषण के कारण हुईं, और 5,00,000 से अधिक मौतें जल प्रदूषण के कारण हुईं। हालाँकि घरेलू वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण जैसे अत्यधिक गरीबी से जुड़े प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों में गिरावट आई है, लेकिन औद्योगिक प्रदूषण, परिवेशी वायु प्रदूषण और विषाक्त रासायनिक प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों में वृद्धि से इस गिरावट की भरपाई हो गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सन् 2000 में पारंपरिक प्रदूषण से होने वाला नुकसान भारत की जीडीपी का 3.2 प्रतिशत था। तब से पारंपरिक प्रदूषण के कारण होने वाली मृत्यु दर में गिरावट के साथ ही आर्थिक नुकसान में भी काफी कमी आई है, लेकिन यह नुकसान अभी भी भारत की जीडीपी का लगभग 1 प्रतिशत है।

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