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एक और उत्तराखंड आंदोलन का रूप ले सकता है मूल निवास और भू कानून का मुद्दा : लोकसभा चुनाव तक मच सकता है बबंडर

लाखों दिलों की सांस्कृतिक आवाज नेगी दा ने की 24 दिसंबर की महा रैली में भाग लेने की अपील

 

-दिनेश शास्त्री –

उत्तराखंड में एक बार फिर ऐसा सशक्त भू कानून बनाने की मांग की जा रही है, जिसमें इस बात का स्पष्ट प्रावधान हो कि उत्तराखंड की जमीनों पर यहां के मूल निवासियों के अधिकार सुनिश्चित और संरक्षित रहें। पहले भी इस तरह की आवाजें उठी लेकिन वह या तो किसी हाशिए के दल या बेहद छोटे संगठन की ओर से उठाई गई किंतु इस बार मामला कुछ अलग दिख रहा है। इस बार तमाम आंदोलनकारी इस अभियान से जुड़ रहे हैं। बड़ी बात यह कि पूर्व सैनिक भी भारी संख्या में अभियान का हिस्सा बनने जा रहे हैं। यदि राजनीति की काली छाया से यह अभियान बचा रहा तो आर पार का वैसा ही आंदोलन नजर आ सकता है जैसे तीन दशक पहले राज्य आंदोलन के लिए अबाल वृद्ध नर नारी पृथक राज्य के लिए उठ खड़े हुए थे। इन आंदोलनकारियों ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि प्रदेश में जल्द ही सशक्त भू कानून और मूल निवास 1950 लागू नहीं किया जाता है, तो उन्हें बड़ा आंदोलन करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। अगर जन आंदोलन भड़का तो लोक सभा चुनाव को प्रभावित कर सकता है।

इस बीच उत्तराखंड की लोक संस्कृति के शिखर पुरुष नरेंद्र सिंह नेगी ने 24 दिसंबर 2023 को राजधानी देहरादून के परेड ग्राउंड में होने वाली “मूल निवास स्वाभिमान महारैली” का समर्थन करते हुए आम जनता के नाम संदेश जारी किया है। उनका आह्वान सोशल मीडिया पर लगातार वायरल हो रहा है। वस्तुत: मूल निवास-भू कानून समन्वय संघर्ष समिति, उत्तराखंड द्वारा आगामी 24 दिसंबर को देहरादून के परेड ग्राउंड में “मूल निवास स्वाभिमान महारैली” का आयोजन किया जा रहा है। समिति के पदाधिकारियों ने उत्तराखंड मूल के लोगों से आह्वान करते हुए कहा है कि यह हमारी आखिरी पीढ़ी है जो उत्तराखंड बचा पाएगी। इसके बाद सिर्फ पश्चाताप ही हाथ लगेगा। उनकी अपील है कि सभी उत्तराखंडी अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए 24 दिसंबर को भूमि कानून, संविधान के विशेष प्रावधान वाले अनुच्छेद 371 और मूल निवास 1950 की मांग के लिए देहरादून पहुंचे।

इसी दौरान सरकारी कर्मचारियों का समर्थन जुटाने की कोशिशें भी होने लगी हैं। पुरानी पेंशन बहाली के लिए संघर्षरत कर्मचारी वैसे आंदोलनकारियों की मांग से सहमत बताए जाते हैं किंतु वे आंदोलन में सक्रिय भागीदारी देंगे, इसकी संभावना कम ही है। राज्य आंदोलन में कर्मचारियों की भागीदारी का अलग कारण था। इस बार न तो उस तरह की परिस्थितियां हैं और न ही संभावना ही है। अलबत्ता वे नैतिक रूप से आंदोलन का समर्थन कर सकते हैं।

इधर लोकगायक नरेन्द्र सिंह नेगी ने उसी तरह का आह्वान प्रदेश के लोगों से किया है। उन्होंने राज्य आंदोलन के दौरान गाए गए आह्वान गीत की क्लिप जारी करते हुए लोगों से स्वाभिमान रैली में भागीदारी की अपील की है।

गीत के बोल वही हैं ” उठा जागा उत्तराखंड्यूं सौं उठाणों वक्त ऐगै”। गीत के इस मुखड़े को लोगों तक आसानी से अपनी बात पहुंचा दी है। उत्तराखंड ही नहीं प्रवासियों ने भी उनकी इस अपील का स्वागत किया है। खासकर देश की राजधानी दिल्ली में श्री नेगी के आह्वान को लोगों ने हाथोहाथ लिया है।

इसके साथ ही एक और अपील भी विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर हलचल मचाए हुए है। उत्तराखंड की एक बिटिया के साथ गायक कलाकार सौरभ मैठाणी, निखिल सकलानी और कई अन्य लोगों ने भी 24 दिसंबर को आहूत स्वाभिमान रैली में जन भागीदारी का आह्वान किया है। इस तरह की जागरूकता को देखते हुए सरकार के समक्ष चुनौती पेश हो सकती है।

माना जाता है कि भाजपा जनता की आकांक्षाओं का खासतौर पर ध्यान रखती है किंतु जब विदेशी निवेश के लिए पूरा सिस्टम ही लालायित हो तो उसके मद्देनजर भू कानून को लचीला बनाना सरकार के लिए एकमात्र रास्ता दिखे किंतु लोगों की आकांक्षा तो हिमाचल प्रदेश की तरह सशक्त कानून की है। देखना यह है कि सरकार क्या रुख अपनाती है? हाल के वर्षों में उत्तराखंड में जमीनों की बड़े पैमाने पर खरीद फरोख्त हुई है और कई स्थानों पर स्थानीय निवासी भूमिहीन होने की स्थिति में पहुंच चुके हैं। इसी के कारण संभवत: यह आंदोलन उठ खड़ा होता दिख रहा है। निवेश, उद्यम और विकास के साथ मूल निवासियों के हक के बीच संतुलन बनाना सरकार के लिए चुनौती नहीं बल्कि परीक्षा सिद्ध हो सकते हैं। देखना यह है कि व्यवस्था इस आंदोलन को किस तरह हैंडिल करती है। वैसे एक भू कानून सरकार के पास विचाराधीन तो है किंतु फाइल में कैद कानून से नाउम्मीदी ही लोगों के हाथ लगी है।

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