साल 2025 : मोदी सरकार के आगे होगा चुनौतियों का पहाड़

–जयसिंह रावत
नए साल 2025 में मोदी सरकार के सामने राजनीतिक परिदृश्य और अधिक चुनौतीपूर्ण होने वाला है। ‘एक देश, एक चुनाव’ जैसी महत्वाकांक्षी पहल के लिए समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा, खासकर जब इस मुद्दे पर विभिन्न दलों की राय विभाजित है। इसके साथ ही आंबेडकर विचारधारा से जुड़े सामाजिक मुद्दों और अडानी प्रकरण पर विपक्ष के तीखे हमलों का सामना करते हुए सरकार को अपनी नीतियों और छवि को मजबूत बनाए रखना होगा। ऐसे में यह वर्ष सरकार के लिए न केवल राजनीतिक कौशल की परीक्षा का होगा, बल्कि जनता के भरोसे को कायम रखने की भी। वक्फ बिल अभी पास नहीं हुआ है और उत्तराखण्ड जैसे राज्य में समान नागरिक संहिता का कानून बन भी चुका है। 2025 का भारत, एक नई राजनीतिक दिशा और संभावनाओं के साथ, गहराते सामाजिक-राजनीतिक विभाजन और असंतोष के दौर से भी गुजर सकता है। पक्ष विपक्ष के बीच प्रतिद्वन्दिता दुश्मनी का रूप लेती जा रही है। मोदी सरकार, जो 2024 में चुनाव जीतकर सत्ता में लौटी है, को न केवल अपने एजेंडे को लागू करने की चुनौती होगी, बल्कि विपक्ष और जनता की अपेक्षाओं के बीच संतुलन भी साधना होगा।
एक देश, एक चुनाव: कहना आसान और करना कठिन
मोदी सरकार ने एक देश एक चुनाव का बिल संसद में पेश तो कर दिया, लेकिन एक साथ चुनाव कराना इतना आसान नही है। यह विचार भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण और विवादास्पद मुद्दा है। इसे लागू करने के लिए संविधान में संशोधन और व्यापक राजनीतिक सहमति की आवश्यकता है। मोदी सरकार के लिए इसे पास करना कई कारणों से चुनौतीपूर्ण होगा। इसे लागू करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174, और 356 में संशोधन करना पड़ेगा। सरकार की इस पहल को लेकर कानूनी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। इस पर अदालतों में याचिकाएं दायर हो सकती हैं। न्यायपालिका का दृष्टिकोण भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण होगा। इसके लिये संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत और आधे से अधिक राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी आवश्यक है। जबकि विपक्षी दल इसे सत्ता के केंद्रीकरण और संघवाद के लिए खतरा मानते हैं। क्षेत्रीय दल, जिनकी राजनीति राज्य स्तर पर केंद्रित है, इसे अपने अधिकारों में हस्तक्षेप मान सकते हैं। इसलिये एनडीए घटकों का समर्थन जुटाना ही चुनौतीपूर्ण होगा। मौजूदा व्यवस्था में बदलाव करने से संवैधानिक संकट उत्पन्न हो सकता है, जैसे कि राज्यों की विधायिकाओं का कार्यकाल छोटा या बड़ा करना। यही नहीं पूरे देश में एक साथ चुनाव कराने के लिए भारी संख्या में ईवीएम और वीवीपैट मशीनों की आवश्यकता होगी। चुनाव आयोग और सुरक्षा बलों के लिए इसे संभालना कठिन हो सकता है।
वक्फ बोर्ड के बिल को पास कराना भी एक चुनौती
वर्तमान में, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) के पास समीक्षा के लिए भेजा गया है। विपक्ष इसे अल्पसंख्यक विरोधी नीति बताकर मुद्दा बना रहा है। राज्यसभा में एनडीए के पास बहुमत है, जिससे इस विधेयक को पारित कराना अपेक्षाकृत सरल हो सकता है। हालांकि, विधेयक की संवेदनशीलता और विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच मतभेदों को देखते हुए, इसे पारित कराने में कुछ चुनौतियाँ आ सकती हैं। क्योंकि अपने मुस्लिम वोट बैंक को देखते हुये सरकार को टिकाये रखने वाले चन्द्र बाबू नायडू और नितीश कुमार इस बिल को समर्थन देने से मुकर सकते हैं। वैसे भी अगर यह बिल पास कराना इतना आसान होता तो सरकार इसे जेपीसी को क्यों भेजती?संसद की संयुक्त समिति की पहली बैठक जल्द ही होने की संभावना है, जो विधेयक की समीक्षा करेगी और आवश्यक संशोधनों पर विचार करेगी। इस प्रक्रिया के बाद, विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पारित कराने के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। कुल मिलाकर, वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 को पारित कराना सरकार के लिए महत्वपूर्ण होगा, लेकिन इसके लिए राजनीतिक सहमति और समर्थन जुटाना आवश्यक होगा।
अम्बेडकर को लेकर विवाद से भी निपटना होगा
संसद में गृह मंत्री अमित शाह द्वारा डॉ. भीमराव आंबेडकर पर की गई टिप्पणी से उत्पन्न विवाद ने भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनीतिक चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं। विपक्ष इस बयान को आंबेडकर का अपमान बताते हुए गृह मंत्री से माफी और इस्तीफे की मांग कर रहा है। इस मुद्दे पर भाजपा को घेरने के लिये दिल्ली में डॉ. भीमराव आंबेडकर के सम्मान और उनके विचारों के प्रचार-प्रसार के लिए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कई महत्वपूर्ण घोषणाएँ की हैं। जबकि कांग्रेस जनवरी पहले सप्ताह से ही अम्बेडकर को लेकर सरकार के खिलाफ अभियान चलाने जा रही है। डॉ. आंबेडकर दलित समुदाय के प्रतीक हैं। उन पर की गई किसी भी नकारात्मक टिप्पणी से इस समुदाय में असंतोष बढ़ सकता है, जिससे भाजपा को आगामी चुनावों में नुकसान हो सकता है।
दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों की चुनौती
2025 में भारत के दो प्रमुख राज्यों, दिल्ली और बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। ये चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए कई कारणों से महत्वपूर्ण हैं। दिल्ली में वर्तमान में आम आदमी पार्टी की सरकार है, जबकि बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेतृत्व में नीतीश कुमार मुख्यमंत्री हैं। इन चुनावों के परिणाम न केवल राज्य स्तर पर बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डालेंगे, जिससे मोदी सरकार की आगामी नीतियों और रणनीतियों की दिशा निर्धारित होगी। दिल्ली विधानसभा के 70 सीटों के लिए चुनाव फरवरी 2025 में संभावित हैं। वर्तमान में, आम आदमी पार्टी सत्ता में है, और मुख्यमंत्री आतिशी मार्लेना हैं। कांग्रेस ने अब तक 47 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। बिहार में 243 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव अक्टूबर-नवंबर 2025 में होने की संभावना है। वर्तमान में, नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार है।
विपक्षी एकता और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव
नये साल मोदी सरकार को विपक्ष से कई महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है, जो राजनीतिक, आर्थिक, और सामाजिक मुद्दों पर आधारित होंगी। सबसे पहले विपक्ष का विरोध एक देश एक चुनाव के मुद्दे पर झेलना होगा। विपक्ष इसे संघवाद के खिलाफ बताते हुए केंद्र सरकार पर राज्यों के अधिकारों को कमजोर करने का आरोप लगा सकता है। विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस, अडानी समूह से जुड़े विवादों को लेकर सरकार की पारदर्शिता और कॉर्पोरेट कनेक्शन पर सवाल उठाता रहेगा। विपक्ष लगातार महंगाई और बेरोजगारी को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश करेगा। मणिपुर जैसी जगहों पर हुई हिंसा और सामाजिक असंतोष को लेकर विपक्ष सरकार पर सवाल उठाता रहेगा। ये मुद्दे सरकार की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता पर सवाल खड़ा कर सकते हैं। विपक्ष सामाजिक न्याय और आरक्षण के विषयों को आक्रामक रूप से उठाते हुए सरकार की नीतियों पर सवाल खड़ा कर सकता है। विशेष रूप से दलित और पिछड़े वर्गों को ध्यान में रखते हुए यह एक बड़ा मुद्दा बनेगा। विपक्ष चीन के साथ चल रहे सीमा विवाद को लेकर सरकार की विदेश नीति पर हमला बोल सकता है, विशेषकर अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख के संदर्भ में।
