कांग्रेस बोली- उत्तराखंड की यूसीसी ना तो सही मायने में यूनिफार्म है और ना ही सिविल
देहरादून, 28 जनवरी। कांग्रेस पार्टी ने उत्तराखंड में लागू की गयी समान नागरिक संहिता को प्रदेश के लिए अहितकर बताते हुए कहा है कि यह संहिता न तो समान है और ना ही सिविल है। इसके विपरीत नागरिकों की निजता और मौलिक आधिकारों का उल्लंघन है।
उत्तराखंड कांग्रेस की मुख्य प्रवक्ता गरिमा दसौनी ने मीडिया को सम्बोधित करते हुए कहा कि समान नागरिक संहिता कभी भी उत्तराखंड की सार्वजनिक मांग नहीं रही है और इसको राज्य में लागू करना सामाजिक आवश्यकता कम एक राजनीतिक पैंतरेबाजी अधिक प्रतीत होती है। दसौनी ने कहा कि संहिता में हिंदू विवाह अधिनियम 1955, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 और भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 के प्रावधानों को शामिल किया गया है लेकिन यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि इसे ईसाई, मुस्लिम, पारसी और सिख जैसे अल्पसंख्यक समुदायों की नागरिक संहिताओं को खत्म करने के लिए ही बनाया गया हो।
गरिमा ने कहा कि इस बिल को बनाते समय समिति द्वारा सिलेक्टिव दृष्टिकोण अपनाया गया है, हिंदू बहुसंख्यकों ने भी कुछ प्रावधानों को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है। एक विवादास्पद प्रावधान यह निर्धारित करता है कि उत्तराखंड में सिर्फ 1 वर्ष तक रहने वाले व्यक्तियों को राज्य का निवासी मान लिया जाएगा,यह धारा सीधे तौर पर उत्तराखंड की मूल निवास की मांगों का खंडन करती है।
गरिमा ने कहा यह कोड ना तो समाज के किसी वर्ग की सेवा करता है और ना ही संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है। यह सीधे तौर पर मौलिक अधिकारों पर चोट करता है। इसके अलावा उत्तराखंड में आदिवासी समुदायों को यूसीसी से बाहर रखना इसकी एकरूपता के दावे को कमजोर करता है।दसौनी ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 44 एक ऐसे यूसीसी की कल्पना करता है जो पूरे देश में लागू हो ना की कुछ राज्यों तक सीमित हो। सीधे शब्दों में कहें तो यह कोड अपने घोषित उद्देश्य को पूरा करने में पूरी तरह विफल साबित हुआ है।
दसौनी ने कहा कि सहमति से लिव इन रिलेशनशिप को भी कोड के तहत प्रभावी रूप से दंडित किया जाता है वह न केवल व्यक्तिगत अधिकारों का उल्लंघन है बल्कि निजता का भी हनन है। यूसीसी लिविंग इन रिलेशनशिप के नियम अच्छा बदलाव करने के बजाय नुकसान अधिक करता है और इस पूरे मसले को और अधिक जटिल और समस्या ग्रस्त बनाता है। इसके प्रावधान व्यक्तिगत मामलों में मोरल पुलिसिंग और सामाजिक हस्तक्षेप को और बढ़ावा देंगे। भाग 3 में लिव इन रिलेशनशिप में आपराधिक प्रावधान पेश किए गए हैं जो 2005 के घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम के बिल्कुल विपरीत है । इस प्रकार यूसीसी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, जिसमें निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार शामिल है। यह अनुच्छेद 14 की तरह सामान्ता के अधिकार और अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धर्म की स्वतंत्रता सहित मौलिक् अधिकारों का उल्लंघन करता है।यूसीसी को अनुच्छेद 254(२) के तहत राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई हो लेकिन इसकी संवैधानिकता अत्यधिक संदिग्ध है। इसलिए इसका अदालत में न्यायिक कसौटी पर टिकना मुश्किल है।
