एनडीएमए का सुझाव -उत्तराखंड के लिए बने व्यापक आपदा प्रबंधन नीति
एनडीएमए सदस्य ने यूएसडीएमए मुख्यालय का निरीक्षण किया, कहा— विकास और आपदा प्रबंधन में बने संतुलन
देहरादून, 13 नवम्बर। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) के सदस्य डॉ. डी.के. असवाल ने बुधवार को उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (यूएसडीएमए) मुख्यालय स्थित राज्य आपातकालीन परिचालन केंद्र का निरीक्षण किया। इस अवसर पर उन्होंने विभागीय अधिकारियों के साथ विस्तृत बैठक कर राज्य में आपदा प्रबंधन से संबंधित गतिविधियों की समीक्षा की।
डॉ. असवाल ने कहा कि उत्तराखंड की भौगोलिक, पर्यावरणीय और आपदाजनित संवेदनशीलता को देखते हुए राज्य के लिए एक समग्र और दूरदर्शी आपदा प्रबंधन नीति तैयार की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि नीति ऐसी होनी चाहिए जो विकास और आपदा जोखिम न्यूनीकरण—दोनों को समान प्राथमिकता दे।
उन्होंने यूएसडीएमए द्वारा आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की सराहना करते हुए कहा कि “उत्तराखंड में आपदा के समय राहत और बचाव कार्य जिस तेजी और कुशलता से किए जाते हैं, वह प्रशंसनीय है।”
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यूएसडीएमए बने सेंटर ऑफ एक्सीलेंस : असवाल
डॉ. असवाल ने कहा कि यूएसडीएमए को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जो आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार और क्षमता निर्माण का अग्रणी संस्थान बने। उन्होंने कहा कि इसके लिए एनडीएमए हर संभव सहयोग देगा।
उन्होंने सुझाव दिया कि यूएसडीएमए को एक सुदृढ़ और व्यापक डाटा सेंटर विकसित करना चाहिए, जहाँ विभिन्न विभागों, एजेंसियों, शैक्षणिक संस्थानों और अनुसंधान संगठनों से प्राप्त सभी आंकड़े एकीकृत रूप में संग्रहीत हों। यह केंद्र न केवल रीयल-टाइम जानकारी प्रदान करे, बल्कि आपदा जोखिमों का विश्लेषण कर वैज्ञानिक नीति निर्माण में भी सहयोग करे।
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प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को और सुदृढ़ किया जाए
एनडीएमए सदस्य ने राज्य में स्थापित सेंसरों और सायरनों की संख्या बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भूकंप, अतिवृष्टि, हिमस्खलन, भूस्खलन और ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) जैसी आपदाओं के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को और मजबूत किया जाना चाहिए।
उन्होंने निर्देश दिया कि सभी सेंसरों की कार्यप्रणाली और अनुरक्षण की एकीकृत व्यवस्था बनाई जाए ताकि डाटा सटीक और समयबद्ध मिले। इसके साथ ही सेंसरों की आवश्यकता का आकलन कर एक विस्तृत प्रस्ताव तैयार कर एनडीएमए को भेजा जाए ताकि पूरे राज्य में तकनीकी निगरानी ढांचा व्यवस्थित रूप से विकसित किया जा सके।
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पारंपरिक ज्ञान और सुरक्षित निर्माण को मिले प्राथमिकता
डॉ. असवाल ने कहा कि आपदा प्रबंधन केवल संकट के समय का कार्य नहीं, बल्कि यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि पारंपरिक वास्तुकला, स्थानीय निर्माण तकनीक और स्वदेशी ज्ञान को संरक्षण और मान्यता दी जानी चाहिए।
उन्होंने कहा, “हमारी पारंपरिक निर्माण शैली पर्यावरण के अनुरूप और भूकंप-रोधी है। इन्हें आधुनिक तकनीक से जोड़कर अधिक सुरक्षित और टिकाऊ ढांचे विकसित किए जा सकते हैं।”
उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य में कुछ मॉडल गाँव विकसित किए जाएँ जो आपदा की दृष्टि से पूर्णतः सुरक्षित हों, ताकि उन्हें अन्य क्षेत्रों के लिए आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।
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अनियंत्रित निर्माण पर रोक और भवन मानकों में सुधार आवश्यक
डॉ. असवाल ने संवेदनशील भू-भागों पर अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगाने की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि राज्य सरकार को भवन निर्माण के लिए दीर्घकालिक नीति तैयार करनी चाहिए। इसमें निर्माण सामग्री, स्थल चयन और डिज़ाइन पूरी तरह आपदा सुरक्षा मानकों के अनुरूप हों।
उन्होंने कहा, “हमारे भवन और संरचनाएं यदि प्रकृति के अनुकूल होंगी, तभी उत्तराखंड का भविष्य सुरक्षित रहेगा।”
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जल-जंगल-जमीन का संरक्षण सामूहिक जिम्मेदारी
उन्होंने कहा कि उत्तराखंड को प्रकृति ने जल, जंगल और जमीन जैसी अनमोल धरोहरें दी हैं, जिनका संरक्षण सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि इन संसाधनों के संरक्षण के लिए दीर्घकालिक रणनीति और ठोस नीति निर्माण समय की आवश्यकता है।
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राज्य सरकार ने मांगा एनडीएमए से सहयोग
बैठक में सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास श्री विनोद कुमार सुमन ने डॉ. असवाल को यूएसडीएमए की विभिन्न गतिविधियों, हालिया आपदाओं और राहत कार्यों की विस्तृत जानकारी दी।
उन्होंने एनडीएमए से निम्न बिंदुओं पर सहयोग मांगा—
राज्य के लिए विशेष आर्थिक सहायता पैकेज।
एसडीआरएफ के मानकों में शिथिलीकरण।
एसडीएमएफ निधि में वृद्धि।
हिमस्खलन एवं भूस्खलन पूर्वानुमान मॉडल की स्थापना।
ग्लेशियल झीलों की सतत निगरानी एवं न्यूनीकरण उपाय हेतु सहयोग।
आपदा से बेघर हुए लोगों के पुनर्वास हेतु वन भूमि हस्तांतरण नियमों में शिथिलीकरण।
इस अवसर पर अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (प्रशासन) श्री आनंद स्वरूप, अपर मुख्य कार्यकारी अधिकारी (क्रियान्वयन) डीआईजी राजकुमार नेगी, संयुक्त मुख्य कार्यकारी अधिकारी मो. ओबैदुल्लाह अंसारी, डॉ. शांतनु सरकार, श्री एस.के. बिरला, डॉ. मोहित पूनिया तथा यूएलएमएमसी और यू-प्रीपेयर के विशेषज्ञ भी उपस्थित थे।
