अर्चना पैन्यूली के उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण दून पुस्तकालय में

देहरादून, 3 जनवरी। समकालीन हिंदी साहित्य की चर्चित प्रवासी लेखिका अर्चना पैन्यूली के नवीन उपन्यास ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण तथा उस पर विचार–विमर्श का कार्यक्रम दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र द्वारा आयोजित किया गया। केंद्र के सभागार में आयोजित इस गरिमामय समारोह में साहित्य, प्रशासन और बौद्धिक जगत की अनेक प्रतिष्ठित हस्तियों ने शिरकत की।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ उपस्थित रहे। प्रमुख वक्ताओं में उत्तराखंड की पूर्व मुख्य सचिव राधा रतूड़ी, पूर्व डीजीपी अनिल रतूड़ी, पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ लेखिका सुधारानी पांडे, प्रतिष्ठित कवि बुद्धिनाथ मिश्र तथा भाषाविद् सरोजिनी नौटियाल शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन साहित्यकार मुकेश नौटियाल ने किया।
वक्ताओं ने कहा कि ‘अलकनंदा सुत’ जैसी कहानियाँ लिखी नहीं जातीं, वे पहाड़ की मिट्टी में जन्म लेती हैं, वहीं की हवा में गूँजती हैं और नदी के शोर में खो जाती हैं। उपन्यास का मुख्य किरदार शिवानंद गैरोला केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक जिजीविषा का प्रतीक है, जो गढ़वाल की घाटियों में राह बनाते हुए कठिनाइयों से टकराता है, थकता है पर हार नहीं मानता।
उत्तराखंड की पृष्ठभूमि पर आधारित इस कृति में लेखिका ने भौगोलिक परिवेश, सांस्कृतिक चेतना, मानवीय संवेदनाओं और जीवन के विविध पक्षों को सशक्त साहित्यिक अभिव्यक्ति दी है। पुस्तक का प्रकाशन प्रतिष्ठित वाणी प्रकाशन द्वारा किया गया है।
अपने विचार व्यक्त करते हुए पूर्व डीजीपी अनिल रतूड़ी ने कहा कि ‘अलकनंदा सुत’ मानव जीवन का एक प्रकार से विश्वकोश है। वरिष्ठ लेखिका सुधारानी पांडे ने इस उपन्यास को पहाड़ के जीवन–संघर्षों की संवेदनशील अभिव्यक्ति बताया और कहा कि प्रवासी जीवन जीते हुए भी अर्चना पैन्यूली ने हिंदी और भारतीयता के साथ उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को सहेज कर रखा है।
पूर्व मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने कहा कि उपन्यास में पहाड़ी ग्रामीण परिवेश और वहां के संघर्षों का सजीव चित्रण है। कवि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कहा कि यूरोप के छोटे से देश डेनमार्क में रहकर भी अर्चना जी हिंदी पाठकों को प्रवासी जीवन का नया अनुभव कराती रही हैं। इससे पूर्व उनका उपन्यास ‘वेयर डू आई बिलांग’ वैश्विक स्तर पर चर्चित रहा है। ‘अलकनंदा सुत’ में गढ़वाल की आंचलिक विरासत का ताना–बाना बहुत ही बारीकी से बुना गया है।
भाषाविद् सरोजिनी नौटियाल ने लेखिका के साहित्यिक योगदान का संक्षिप्त परिचय दिया। अपने वक्तव्य में लेखिका अर्चना पैन्यूली ने कहा, “अपने जन्म–नगर देहरादून में साहित्यकारों, मित्रों और पाठकों की उपस्थिति में ‘अलकनंदा सुत’ का लोकार्पण मेरे लिए अत्यंत भावनात्मक और गौरव का क्षण है।”
उल्लेखनीय है कि अर्चना पैन्यूली 1997 से डेनमार्क में निवास कर रही हैं और नॉर्थ सीलैंड इंटरनेशनल स्कूल में अध्यापन कार्य से जुड़ी हैं। अब तक उनकी नौ पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्होंने डेनिश साहित्य की कई कृतियों का हिंदी में अनुवाद भी किया है। डेनिश समाज पर आधारित उनका उपन्यास ‘वेयर डू आई बिलांग’ अंग्रेजी भाषा में भी प्रकाशित हुआ है, जबकि ‘कैराली मसाज पार्लर’ मराठी, कन्नड़ और अंग्रेजी भाषाओं में भी उपलब्ध है।
कार्यक्रम के आरंभ में दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के निदेशक एन. रवि शंकर और कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी ने अतिथियों और सभी साहित्यप्रेमियों का स्वागत किया। ‘अलकनंदा सुत’ पर हुई सार्थक चर्चा के कारण यह आयोजन साहित्यकारों और पाठकों के लिए विशेष महत्व का रहा।
इस अवसर पर डॉ. योगेश धस्माना, डॉली डबराल, राजीव नयन बहुगुणा, सुंदर सिंह बिष्ट, जगदीश सिंह महर, भारती मिश्रा, सुप्रिया रतूड़ी, हरि चंद निमेश, मदन मोहन कंडवाल, सोमवारी लाल उनियाल, मोहन सिंह, जय भगवान गोयल, डॉ. लालता प्रसाद, डी. के. पांडे, बैचेन कंडवाल, जगदीश बाबला, शिव मोहन सिंह, देवेंद्र कांडपाल, कुलभूषण नैथानी, आलोक सरीन, ललित राणा सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, पाठक और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।
