ब्लॉग

“मकरैणी” एक संस्मरण 

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
प्रयागराज या तीरथपति, इसका मूलस्वरूप क्या है? गोस्वामी तुलसीदास जी, जो राम के अनन्य उपासक थे, ने रामचरितमानस में इस स्थान का नाम *तीरथपति* रखा था।-
“माघ मकरगत रबि जब होई। *तीरथपतिहिं* आव सब कोई॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥”…. फिर कहा कि यहां कौन लोग रहते हैं, क्यों इसका इतना महत्व है ? –
मुद मंगलमय संत समाजू।
जो जग जंगम तीरथराजू॥
जो मनुष्यों को मुसीबतों से पार करा दे उसे ‘तीर्थ’ कहते हैं इसलिए महापुरुषों को भी तीर्थ विशेषण से संबोधित किया जाता था । प्रयागराज तो लोकश्रुति पर आधारित नाम है, जो शायद इसीलिए पड़ा होगा क्योंकि यहां गंगा, जमुना और सरस्वती का संगम हुआ। इससे बड़ा संगम लोगों ने नहीं देखा था …
वैसे इसी स्तर के पांच *प्रयाग* उत्तराखंड में पहले से हैं जिनमें विष्णु प्रयाग (विष्णु गंगा और मंदाकिनी का संगम), नन्दप्रयाग (नन्दाकिनी और अलकनंदा का संगम), कर्णप्रयाग (अलकनंदा और पिण्डर का संगम), रुद्रप्रयाग (अलकनंदा और मन्दाकिनी का संगम ) और फिर देवप्रयाग जहां अलकनंदा और भागीरथी का मिलन होने पर आगे वह *गंगा* ही कहलाई। …
उत्तरकाशी में भी असी गंगा और भागीरथी का एक संगम स्थल है इसलिए इसको *सौम्य काशी* भी कहा गया है।
मकर संक्रान्ति के दिन यहां माघ मेला लगता है जिसे *मकरैणी का थौलु* लोक में प्रसिद्ध नाम से जानते  क्षेत्र के समस्त लोक देवी- देवता अपनी डोलियों पालकियों पर बैठकर ढोल,नगाड़े और रणसिंघा की रोमांचक ध्वनि के साथ मणिकर्णिका घाट में गंगा में स्नान करने के बाद स्थानीय रामलीला मैदान में इकठ्ठा होकर नाचते हैं ….
भटवाड़ी में जूनियर हाईस्कूल में हमारे हेडमास्टर
स्व०चन्द्रशेखर जोशी जी , शास्त्री, काव्य तीर्थ (बनारस) के अलंकरण से विभूषित
बड़े विद्वान पुरुष थे तो सुबह स्कूल की सामूहिक प्रार्थना में सिर्फ गंगा स्तुति गाई जाती थी इसलिए मुझे आज भी यह स्तुति कंठस्थ है –
देवि! सुरेश्वरि! भगवति! गंगे!
त्रिभुवनतारिणि तरलतरंगे।
शंकरमौलिविहारिणि विमले
मम मतिरास्तां तव पदकमले ॥
…भागीरथीसुखदायिनि मातस्तव
जलमहिमा निगमे ख्यातः ।
नाहं जाने तव महिमानं
पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥
स्व चन्द्रशेखर जोशी जी न केवल मेरे प्रारंभिक गुरु जी रहे बल्कि हमारे परिवार में मेरे छोटे चाचा जी स्व०सुन्दरलाल बहुगुणा,मेरे बड़े भाई शान्ति प्रसाद जी और अनुज लोगों के भी वे टीचर रहे हैं । वे उत्तरकाशी जनपद में सुविख्यात श्रीमद्भागवत के कथा व्यास भी थे, वे हमारे परिवार के घनिष्ठ संबंधी और स्नेही सज्जन पुरुष थे। कुछ विद्यार्थी उनके कठोर अनुशासन से डरते थे तो उनके पीठ पीछे कहने लगते -चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहि माम ” लेकिन मेरे तीन क्लासफेलो सर्वश्री विद्या प्रसाद सेमवाल जी और उनके भाई बद्री प्रसाद जी दोनों मुखवा गंगोत्री के रावल और भटवाड़ी के हरिशंकर रतूड़ी जी (अब स्व०) शास्त्री जी को *भाया जी* कहकर ही याद करते थे।…
GPB

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!