व्यंग्य लेख : बढ़ती आबादी घटते मतदाता

-अरुण श्रीवास्तव देहरादून-
है न अज़ीब बात। पर चुनाव आयोग के ताज़ा आंकड़े तो यही बयां करते हैं कि मतदाता घट रहे हैं वो। लेकिन 21वीं सदी के सर्व शक्तिशाली, सर्वमान्य देवता “गुगल बाबा” के अनुसार विश्वगुरु बनने के मुहाने पर खड़े भारत में सबसे अधिक आबादी युवाओं की है। वैसे मैं अंकों के मायाजाल से और आंकड़ों के जंजाल में न उलझना चाहता हूं और न ही “सुधी” पाठकों को उलझाना चाहता हूं पर करूं भी तो क्या करूं? ज़माना आंकड़ों का है। फ़िर जब हस्तरेखाएं भी अंकों का गुलाम हो गईं हैं तो ज्योतिष गणना और क्या जनगणना।
बहरहाल एक जनगणना के अनुसार अपना भारत युवाओं का देश है। भारत में सबसे ज्यादा युवा रहते हैं। जो 15 से 24 आयु के हैं। ये देश की कुल आबादी का 37% है। पर ऐसा क्यों अपने देश भारत की आबादी चीन को धकेलते हुए आगे बढ़ गई पर वयस्क नहीं हो रही है। यानी वयस्कता की दहलीज़ नहीं पार कर पा रही है या तो वहीं पर अटकी हुई है या आगे बढ़ना भूल गई है तभी तो हमारी ये पीढ़ी जिसे हम हाल-फ़िलहाल से “ज़ेन ज़ी” के रूप में जानतें भी हैं वो खा-पी कर बढ़ रही है मोटा रही है पर न तो ख़ुद और न ही उसके परिजन उसे मतदाता सूची में पंजीकृत करा रहे हैं। नतीजा “ढाक के तीन पात”। देश की जनसंख्या तो कुकुरमुत्ते (इस उदाहरण से किसी की आस्था को ठेस पहुंची हो तो क्षमा, क्षमा इसलिए भी क्योंकि इन दिनों आस्था छुई-मुई हो गई है) बढ़ तो रही है लेकिन मतदाता नहीं बढ़ रहे हैं। अब ये बात अलग है कि मतदाता भी “जीएसटी और अर्थव्यवस्था हो गए हैं। मतलब वो बढ़ते तो हैं लेकिन अकेले बढ़ते हैं। अपने साथ न रोज़गार के अवसर को बढ़ने देते हैं और न ही फ़टेहाल जनता की माली हालत को। एकला चलो के सिद्धांत पर अकेले बढ़ते हैं। अब देखिए न अभी अभी हम विश्वगुरु ज़ापान को धकियाते हुए उसके स्थान पर काबिज हो गए पर न ज़ापान जैसी हमारी प्रति व्यक्ति आय हुई और न ही उसके जैसा विकास। जब जापान से पीछे थे तब भी देश की अस्सी करोड़ आबादी पांच किलो मुफ्त राशन पर ज़ीने को मज़बूर थी और आज भी मजबूर है। मतलब “न हींग लगी न फिटकरी, रंग चोखा”।
बात मुद्दे कि, चुनाव आयोग के महानतम कृत्य से 21वीं सदी में विश्वगुरु बनने के मुहाने पर खड़े भारत में करोड़ों की संख्या में मतदाता सूची से गायब हो गए। अब गायब होकर गए कहां ये तो शोध का विषय है पर हो गये। ज़ाहिर सी बात है कि कुछ की मृत्यु हो गई होगी और कुछ पलायन कर गए होंगे, पर पलायन कर कहीं न कहीं तो गए ही होंगे अब रही मृत्यु की बात तो फ़िर अपने देश में मृत्यु से तीन गुना ज्यादा जन्म दर है। यानी सवाल कायम है कि आबादी बढ़ने के बाद भी क्यों नहीं बढ़ रहे मतदाता। अब कहीं ऐसा तो नहीं कि कई देशों की आबादी से कई गुना ज्यादा वाला ज़ेन ज़ी मतदाता रील बनाने और वायरल कराने में इतना मशगूल हो गया कि, खुद को वोटर लिस्ट में शामिल कराना ही भूल गया और चुनाव आयोग अपने महत्वपूर्ण कार्यों में मतदान के प्रति जागरूकता फैला कर उन्हें मतदाता सूची में शामिल कराना भूल गया हो। (लेख में प्रकट विचार लेखक के निजी हैं -एडमिन)
अरुण श्रीवास्तव देहरादून।
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