अदा+ लत दोनों मिलकर बन गये अदालत

-गोविंद प्रसाद बहुगुणा-
यह दिलचस्प संयोग है कि जब जज अपनी खास अदा दिखाते हैं और वकील अपनी बेवजह बहस करने की लत नहीं छोड़ते, तब कोर्टरुम अदालत बन जाता है। ऐसे ही एक किस्सा बहुत चर्चा का विषय बना लीगल सर्किल में –
मशहूर शायर अकबर इलाहाबादी जिला एवं सेशन जज (Sessions Judge) के पद से सेवानिवृत्त हुए थे, अपने सेवाकाल के समय एक दिन
सुनवाई के दौरान किसी वकील को जबाब दिया था कि जिस अदालत के सामने तुम बहस कर रहे हो, वह भी दीवानी है !
“खिंचो न कमानों को न तलवार निकालो, जब आप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालो”
“हुए वकील तो शैतान ने कहा,
लो आज हम भी औलाद हो गए।
खुदा महफूज़ रक्खे हमको इन तीनों बलाओं से,
वकीलों से, हकीमों से, हसीनों की निगाहों से।”….
यह मामला अदालत में प्रयुक्त भाषा से संबंधित एक प्रसंग है ,सुनिए –
“शिष्टभ्य आगमात् सिद्धाःसाधवो धर्मसाधनम्।
अर्थप्रत्यायनाभेदे विपरीतास्त्वसाधकः।। ” वाक्यपदीयम -भर्तृहरि
” शिष्टजनों और शास्त्रों से परम्परया प्राप्त शब्द *साधु* शब्द कहलाते हैं , ये धर्म साधन होते हैं अर्थात साधु शब्द के प्रयोग से धर्म होता है इसके विपरीत अशिष्ट जनों ( अनपढ़ लोग ) से अशास्त्रीय अर्थात् व्याकरणशास्त्र की प्रक्रिया से अनिष्पन्न केवल लौकिक वार्तालाप से प्राप्त शब्द *असाधु* शब्द कहलाते हैं , वे धर्म के साधन नहीं होते अर्थात उनका प्रयोग सामान्यतया वर्जित है । इसके बावजूद अर्थ बोध कराने में इन दोनों में कोई भेद नहीं होता ।-” यह टीका वाक्य पदीयम् में भाषाविद कवि भर्तृहरि की थी ।
अब इस अशिष्ट और असाधु शब्द पर एक किस्सा मैने बिजनौर में अपने पड़ोसी मित्र वकील के मुख से ही सुना था , सुनिए ।
इस *अशिष्ट* शब्द का एक उदाहरण उसी लहजे में प्रस्तुत कर रहा हूं जिसमें यह प्रस्तुत किया गया था अस्तु सुधीजन क्षमा करें ।
पैतृक संपत्ति के उत्तराधिकार के एक मामले में घनघोर देहात के एक व्यक्ति ने अदालत में गवाही देते हुए कहा कि *कलेहड़* जायदाद का मालिक नहीं हो सकता जब तक उसका असली बेटा जिंदा है । यह * कलेहड़ * शब्द जज साहब की समझ में नहीं आया तो उन्होंने उस गवाह से पूछा कि- ये *कलेहड* क्या हुआ ? इसका मतलब समझाओ मुझे ।
गवाह ने कहा –
हुजूर अगर थारी मां मेरे बाप के पास गई हो और उससे तुम पैदा हुए तो थारा और मेरा नाता कलेहड़ भाई वाला हुआ I (YOU ARE AN ILLIGITIMATE SON OF MY FATHER, HENCE YOU ARE MY HALF BROTHER ) ।
जज साहब के दिमाग में भी इस शब्द का अर्थ स्थाई रूप से दर्ज हो गया होगा, वे उसको कभी भूल नहीं सकते लेकिन विद्वान जज ने इसको न्यायालय की अवमानना नहीं माना यद्यपि विपक्ष के वकील ने दलील दी थी कि इस गवाह को सजा दी जाए और इसकी गवाही को दर्ज न किया जाय। इस तरह के अनेकों देशज शब्द होंगे जो सुनने में अटपटे लगते होंगे लेकिन उनको सामान्य बोलचाल में भी प्रयोग किया जाता है कोई बुरा नहीं मानता ।
