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आखिर उत्तराखण्ड की राजधानी है कहां ?

Twenty-five years post-formation, Uttarakhand remains the only Indian state without a permanent capital, trapped in a cycle of political indecision and regional friction. While Bhararisain (Gairsain) was declared the “summer capital” to appease hill-state activists, it remains a symbolic shell hosting only fleeting legislative sessions rather than actual governance.The Dixit Commission’s delayed findings exposed a divide between public sentiment—favoring the hills—and political preference for Dehradun’s infrastructure. This “administrative tourism” wastes immense resources without providing stability. Ultimately, the state’s dual-capital rhetoric insults its founding martyrs; Uttarakhand needs a functional policy hub, not perpetual “temporary” status.-JSRawat

-जयसिंह रावत-

चमोली जिले में स्थित भराड़ीसैण (गैरसैण) में जब भी दो – तीन दिनों के लिये उत्तराखण्ड विधानसभा का सत्र चलता है तो सीमान्त हिमालयी प्रदेश उत्तराखण्ड की स्थाई राजधानी का मुद्दा फिर गरमा जाता है। नवम्बर 2000 से लेकर अब तक राज्य गठन के 25 साल हो गये लेकिन राज्य की राजधानी का मुद्दा अभी तक न तो सुलझ पाया और ना ही निकट भविष्य में सुलझने के आसार नजर आ रहे हैं। भाजपा की सरकार ने राजधानी के विवाद को सुलझाने के लिये भराड़ीसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित तो कर दिया मगर विपक्षी राजनीतिक दल तो रहे दूर यह घेषणा राज्य की मांग को लेकर एक अभूतपूर्व आन्दोलन चलाने वाले लागों के गले भी नहीं उतरी। उतरती भी कैसे ? किसी एक स्थान पर महज कुछ दिन विधानसभा सत्र आहूत करने से वह स्थान राजधानी नहीं हो जाता! अगर लोग भराड़ीसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी मान भी लें तो शीतकालीन या स्थाई राजधानी का जवाब अनुत्तरित है। जिस भराड़ीसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया है वहां छह साल में केवल एक बार ग्रीष्मकालीन सत्र हुआ और वह भी बहुत संक्षिप्त।

नवम्बर 2000 में बने तीन नये राज्यों में से उत्तराखण्ड अकेला राज्य है जिसकी राजधानी आज तक तय नहीं हो पायी। इसके लिये कोई और नहीं बल्कि उत्तराखण्ड का अपना राजनीतिक तंत्र जिम्मेदार रहा है जो कि राज्य गठन से लेकर अब तक राजधानी को लेकर एक राय नहीं हो सका। जब संसद में उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पास हो गया था तो उसी समय से राजधानी की तलाश शुरू हो गयी थी। लेकिन उस समय जब विधायकों और सांसदों में राजधानी को लेकर गढ़वाल और कुमाऊं के बीच रस्साकस्सी होने लगी तो तत्कालीन बाजपेयी सरकार ने यह मुद्दा उत्तराखण्ड के लागों पर ही छोड़ दिया और तात्कालिक ढांचागत सुविधाओं को देखते हुये देहरादून को अस्थाई राजधानी घोषित करने के साथ ही कुमाऊं के लोगों को संतुष्ट करने के लिये नैन्ीताल को हाइकोर्ट दे दिया। आज ये दोनों शहर अपनी सीमित धारण क्षमता के कारण राजधानी और हाइकोर्ट के बोझ तले कुचले जा रहे हैं। दोनों ही भूगर्भीय दृष्टि से अति संवेदनशील है। नैनीताल की विकट स्थिति को देखते हुये स्वयं हाइकोर्ट को अपने लिये कोई नयी जगह तलाशने के आदेश देने पड़े।

चूंकि केन्द्र सरकार ने राजधानी के चयन की जिम्मेदारी स्वयं उत्तराखण्ड (उत्तरांचल) सरकार पर छोड़ी हुयी थी इसलिये पहली नित्यानन्द स्वामी सरकार ने इसके लिये दीक्षित आयोग का गठन कर डाला, जिसे 6 माह के अन्दर अपनी सिफारिश देनी थी। लेकिन आयोग उत्तराखण्ड की राजनीति से अपरिचित नहीं था, इसलिये उसने मामला 8 साल तक लटकाये रखा। सरकारें आती रहीं-जाती भी रहीं मगर दक्षित आयोग कायम रहा। 11 जनवरी 2001 को गठित इस आयोग ने भारी जन दबाव के बाद 17 अगस्त 2008 को अपनी रिपोर्ट दाखिल की जो कि दिसम्बर 2008 में विधानसभा में रखी गयी। रिपोर्ट भी खोदा पहाड़ निली चुहिया जैसी ही थी। दीक्षित आयोग की यह रिपोर्ट भी उत्तराखण्ड की क्षेत्रवादी राजनीति की पोल खोलने के लिये काफी है। आयोग के समक्ष 70 विधायकों में से एक और पांच सांसदों में से भी एक ने अपनी राय दी। दिलचस्प बात यह है कि सर्वेक्षणों में जनता का भारी बहुमत गैरसैण के पक्ष में था, लेकिन आयोग के समक्ष लिखित राय देने वाले मात्र 4-5 लोग ही इसके पक्ष में खड़े दिखे। आयोग में राय देने वाले अधिकांश लोगों ने राज्य हित के बजाय अपने क्षेत्रीय हित को प्राथमिकता दी। गढ़वाल के लोगों ने ऋषिकेश या देहरादून और कुमाऊं के लोगों ने रामनगर या काशीपुर को वरीयता दी। ऐसी स्थिति में आयोग ने देहरादून के रायपुर क्षेत्र को ही अपनी वरीयता दे डाली।

राजधानी को लेकर सबसे बड़ा मजाक तो तब हुआ जब भराड़ीसैण में आयोजित बजट सत्र के दौरान 4 मार्च 2020 को ग्रीष्मकालीन राजधानी की घोषण हो गयी। इस घोषणा की पुष्टि के लिये 8 जून 2020 को अधिकारिक अधिसूचना भी जारी हो गयी।़ इसकी वास्तविकता भी जानिये ! भराड़ीसैण के ‘ग्रीष्मकालीन राजधानी’ बनने के बाद पिछले छह वर्षों में केवल जून 2022 में ही वहां वास्तविक ग्रीष्मकालीन सत्र हुआ। शेष वर्षों में कोरोना, चुनाव, चारधाम यात्रा या ठंड के बहानों के बीच ग्रीष्मकालीन राजधानी में गर्मियों के सत्र सिरे ही नहीं चढ़े। एक दो सत्र शीतकाल में चले भी तो आधे अधूरे! राजधानी वह होती है जहां से शासन प्रशासन चलता है। जहां मंत्रियों से लेकर सचिवों के कार्यालय चलते हैं ताकि लोगों को देहरादून आने के बजाय भराड़ीसैण में ही अपनी समस्याओं का निदान और विकास की मांग पूरी हो जाय। एक सप्ताह तक विधानसभा चलाना राजधानी चलाना नहीं होता। संक्षिप्त सत्र पर ही करोड़ों रुपये खर्च हो जाते हैं और जनता से लेकर कर्मचारियों तक को होने वाली असुविधा अलग होती है। अब तों जम्मू कश्मीर की दो राजधानियों को भी एक बना दिया, जबकि वह डेढ सौ साल से भी पुरानी व्यवस्था थी। ताजा आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार उत्तराखण्ड में 25 वर्षों के दौरान 80 हजार करोड़ का कर्ज चढ़ चुका है। इस बार एक लाख करोड़ से अधिक का बजट प्रस्तावित है, जिसमें राज्य का अपना राजस्व बहुत कम है।

देखा जाय तो यह केवल एक प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक इतिहास का संभवतः सबसे लंबा ‘राजनीतिक छलावा है। चलो भराड़ीसैण को ग्रीष्मकालीन राजधानी मान लिया तो शीतकालीन राजधानी कहां है? इसका उत्तर भी इसलिये गुम हो जाता है, क्योंकि कांग्रेस और उत्तराखण्ड क्रांति दल जैसे दल भराड़ीसैण को राजधानी बनाने की घोषणा कर चुके हैं। हालांकि कांग्रेस दो बार सत्ता में रह चुकी है और उत्तराखण्ड क्रांति दल भी सरकारों में शामिल रहा है। ऐसी स्थिति में देहरादून को स्थाई या शीतकालीन राजधानी घोषित करना राजनीतिक दृष्टि से जोखिम से खाली नहीं है।

देखा जाय तो राजधानी केवल ईंट-पत्थर की इमारतों या विधानसभा की सीढ़ियों का नाम नहीं है। यह राज्य के ‘विजन’ और उसकी ‘आत्मा’ का प्रतिबिंब होती है। 25 साल बाद भी यदि उत्तराखंड की सरकारें ‘ग्रीष्मकालीन’ और ‘शीतकालीन’ के जुमलों में उलझी हैं, तो यह उन शहीदों के बलिदान का अपमान है जिन्होंने एक समृद्ध और स्वाभिमानी पहाड़ के लिए अपना रक्त दिया था। नये राज्य की मांग और उसके गठन का आधार भौगालिक स्थिति और सांस्कृतिक पहचान थी। लेकिन राजधानी के कारण यह हिमालयी राज्य अपनी सांस्कृतिक पहचान भी खोता जा रहा है। यदि भराड़ीसैण को राजधानी बनाना है, तो वहां केवल सत्र नहीं, बल्कि ‘शासन’ होना चाहिए। और यदि देहरादून ही स्थायी ठिकाना है, तो फिर ‘अस्थायी’ का ढोंग बंद कर पहाड़ों के विकास के लिए कोई वैकल्पिक मॉडल पेश किया जाना चाहिए। उत्तराखंड को आज ‘प्रशासनिक पर्यटन’ की नहीं, बल्कि एक ‘स्थायी नीतिगत केंद्र’ की आवश्यकता है।

(लेख में प्रकट विचार लेखक के हैं, जिनसे एडमिन का सहमत होना आवश्यक नहीं है –एडमिन)

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