नई एआई तकनीक से 18 महीने पहले मिल सकेगा मानसून का पूर्वानुमान

With the newly discovered basis of long-lead ISMR predictability in place, Devabrat Sharma (IASST), Dr. Santu Das (IASST), Dr. Subodh K. Saha (IITM), and Prof. B. N. Goswami (Cotton University) were able to make 18-months lead forecast of ISMR between 1980 to 2011 with an actual skill of 0.65 using a machine learning based ISMR prediction model. The success of the model was based on the ability of artificial intelligence (AI) to learn the relationship between ISMR and tropical thermocline patterns from 150 years of simulations by 45 physical climate models and transferring that learning to actual observations between 1871 and 1974. As the potential skill of ISMR at 18-months lead is 0.87, there is still considerable scope in improving the model.
By- Jyoti Rawat-
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) आधारित एक नई गणना पद्धति भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून (आईएसएमआर) के पूर्वानुमान को नई दिशा दे सकती है। वैज्ञानिकों ने “प्रेडिक्टर डिस्कवरी एल्गोरिद्म (पीडीए)” नामक एक नई तकनीक विकसित की है, जिसकी मदद से मानसून का 18 महीने पहले तक प्रभावी पूर्वानुमान संभव हो सकता है। यह उपलब्धि कृषि, जल प्रबंधन और आर्थिक योजना निर्माण के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
नई तकनीक से खुली दीर्घकालिक पूर्वानुमान की राह
अब तक भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून की सटीक और दीर्घकालिक भविष्यवाणी मौसम विज्ञान के लिए बड़ी चुनौती रही है। वैज्ञानिकों ने पिछले कई दशकों में मानसून की परिवर्तनशीलता और उसके वैज्ञानिक आधार को काफी हद तक समझा है, लेकिन एक महीने पहले भी कुशल पूर्वानुमान करना कठिन बना हुआ है। ऐसे में 6, 12 या 18 महीने पहले विश्वसनीय संकेत मिलना मौसम विज्ञान के क्षेत्र में बड़ी प्रगति माना जा रहा है।
पारंपरिक पद्धति की सीमाएं
परंपरागत रूप से शोधकर्ता मानसून के पूर्वानुमान के लिए किसी एक महासागरीय या वायुमंडलीय कारक के साथ अधिकतम सहसंबंध के आधार पर संकेतक चुनते रहे हैं। लेकिन यह तरीका सीमित माना गया, क्योंकि यह किसी एक समय में किसी एक क्षेत्र विशेष के प्रभाव को ही प्रमुखता देता है। इससे मानसून को प्रभावित करने वाले अनेक वैश्विक कारकों की संयुक्त भूमिका पूरी तरह सामने नहीं आ पाती।
आईएएसएसटी, आईआईटीएम और कॉटन विश्वविद्यालय की संयुक्त पहल
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के गुवाहाटी स्थित स्वायत्त संस्थान विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी उच्च अध्ययन संस्थान (आईएएसएसटी) के वैज्ञानिकों ने भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (आईआईटीएम), पुणे और कॉटन विश्वविद्यालय, गुवाहाटी के शोधकर्ताओं के साथ मिलकर यह नई तकनीक विकसित की है। अध्ययन में पाया गया कि लंबे समय से व्यापक रूप से उपयोग किया जा रहा समुद्री सतह तापमान (एसएसटी) अकेले दीर्घकालिक मानसून पूर्वानुमान के लिए पर्याप्त नहीं है। इसके बजाय वैज्ञानिकों ने महासागर की थर्मोक्लाइन गहराई (D20) को अधिक प्रभावी संकेतक पाया। यह कारक वायुमंडलीय शोर से अपेक्षाकृत कम प्रभावित होता है और मानसून की दीर्घकालिक प्रवृत्तियों को बेहतर ढंग से दर्शाता है।
18 महीने पहले तक संकेत, किसानों को बड़ा लाभ
शोधकर्ताओं के अनुसार, नया एल्गोरिद्म मानसून मौसम से 18 महीने पहले तक 0.87 का संभावित कौशल दर्शाता है, जबकि मशीन लर्निंग आधारित मॉडल ने 1980 से 2011 के बीच 0.65 के वास्तविक कौशल के साथ पूर्वानुमान देने में सफलता हासिल की। यह उपलब्धि 45 जलवायु मॉडलों के 150 वर्षों के सिमुलेशन और ऐतिहासिक अवलोकनों के विश्लेषण पर आधारित है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे किसानों, नीति-निर्माताओं और खाद्य सुरक्षा योजनाओं को समय रहते ठोस आधार मिल सकेगा।
भविष्य के लिए नई उम्मीद
रॉयल मेट्रोलॉजिकल सोसाइटी की त्रैमासिक पत्रिका में प्रकाशित यह अध्ययन संकेत देता है कि भविष्य में उन्नत मशीन लर्निंग और बेहतर जलवायु मॉडलों के सहारे मानसून के दीर्घकालिक पूर्वानुमान और अधिक सटीक हो सकते हैं। इससे ग्लोबल वार्मिंग के दौर में बढ़ती मौसमीय अनिश्चितताओं से निपटने की रणनीतियां अधिक मजबूत बन सकेंगी।
