पर्वतीय बसावटों पर मंडराता खतरा: आपदा प्रबंधन में ठोस नीति की आवश्यकता

-प्रकाश कपरूवाण –
उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में गाड़-गधेरों और नदी-नालों के समीप बसी बस्तियां अब गंभीर खतरे के दायरे में आ चुकी हैं। धराली (उत्तरकाशी) और चेपड़ो (चमोली) जैसी बसावटों की त्रासदी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि इन क्षेत्रों की सुरक्षा व्यवस्था और आपदा प्रबंधन को लेकर ठोस नीतियां बनाने का समय आ गया है। हाल के वर्षों में लगातार हो रही प्राकृतिक आपदाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि ऐसी संवेदनशील बसावटों को सुरक्षित रखने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाएं।
धराली के ऊपर खीर गंगा क्षेत्र में बादल फटने की घटना से हुई तबाही के कुछ ही दिनों बाद, समान भौगोलिक संरचना वाले चेपड़ो गांव में भीषण तबाही का मंजर देखने को मिला। यह घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि उत्तराखंड में ऐसे अनेक गांव और कस्बे हैं, जो समान जोखिम के दायरे में हैं। ऐसे में सवाल यह है कि इन क्षेत्रों में भविष्य में संभावित आपदाओं से जन-धन की क्षति को कैसे रोका जाए।
हिमालयी राज्यों में बढ़ती भूस्खलन और बादल फटने की घटनाएं, गाड़-गधेरों और नदी-नालों के किनारे विकसित हो रही बस्तियों के लिए गंभीर खतरा बन चुकी हैं। समय रहते व्यापक भूगर्भीय सर्वेक्षण और वैज्ञानिक रिपोर्ट के आधार पर ठोस सुरक्षा उपाय न किए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और गहराता जाएगा। आपदाएं घटित होंगी, जनधन का नुकसान बढ़ेगा, और राहत एवं पुनर्वास पर अरबों रुपये खर्च होने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा।
उत्तराखंड में कई गांव और नगर आज भी खतरे के मुहाने पर खड़े हैं। जरूरत है कि वैज्ञानिक सर्वेक्षण के जरिए इन क्षेत्रों की भारवहन क्षमता का आकलन किया जाए और उसी के अनुरूप निर्माण कार्यों की अनुमति दी जाए। हालांकि यह तभी संभव है जब राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ वैज्ञानिक रिपोर्टों के आधार पर कठोर निर्णय लिए जाएं। अन्यथा सर्वेक्षण और रिपोर्टें महज दस्तावेज़ बनकर रह जाएंगी, और आपदाएं यूं ही घटित होती रहेंगी।
जोशीमठ का भूगर्भीय सर्वेक्षण आपदा के घटित होने के बाद हुआ। अब थराली में भी इसी प्रकार का सर्वेक्षण किया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्यों हर बार आपदा के बाद ही सक्रियता दिखाई जाती है? यदि समय रहते पहाड़ी क्षेत्रों की संवेदनशील बसावटों का चयन कर उनका वैज्ञानिक अध्ययन किया जाए, तो जनहानि और आर्थिक नुकसान को काफी हद तक टाला जा सकता है।
वर्तमान में केंद्र और राज्य सरकार की राहत और पुनर्वास संबंधी नीतियां इन आपदाओं के पैमाने के मुकाबले अपर्याप्त हैं। अब समय आ गया है कि उत्तराखंड के लिए अलग से राहत और पुनर्वास नीति बनाई जाए। अन्यथा पलायन ही स्थानीय लोगों के लिए एकमात्र विकल्प बनकर रह जाएगा।
धराली, थराली और अब देवाल व जखोली ब्लॉक के छेना गाड़-पश्चिमी बांगर पट्टी में आई तबाही ने इस बहस को और प्रासंगिक बना दिया है। आपदा पीड़ितों को उम्मीद है कि सरकार पुनर्वास और राहत के मौजूदा मानकों पर पुनर्विचार करेगी, ताकि उनका जीवन सुरक्षित और स्थिर हो सके।
